Sunday, May 20, 2012

ग्रहों के अनुसार करें ये उपाय, जल्दी होगा प्रमोशन

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा अपने काम के प्रति समर्पित रहते हैं। वे दिन-रात अपने काम में निखार लाने का प्रयत्न करते रहते हैं और उसमें सफल भी होते हैं लेकिन इसके बाद भी उन्हें प्रमोशन नहीं मिल पाता। जबकि कुछ लोग बिना कुछ किए ही प्रमोशन पा लेते हैं। कुछ ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कारण ऐसा हो सकता है। यदि आप प्रमोशन चाहते हैं तो नीचे लिखे उपाय कर उन ग्रहों को शांत करें, आपका भी प्रमोशन जल्दी होगा।

उपाय

- यदि शनि आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न कर रहा है, तो एक बर्तन में तिल्ली का तेल लेकर उसमें अपनी परछाई देखकर भिखारी को दान कर दें।

- यदि सूर्य के कारण बाधा हो तो प्रतिदिन पहली रोटी गाय को दें यदि गाय काली या पीली हो तो और भी शुभ रहता है।

- चन्द्र के कारण बाधा हो तो पिता को स्वयं जाकर दूध पिलाएं और उनकी सेवा करें।

- मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण बाधा हो तो घर में बुजुर्ग, महिलाओं का सम्मान करें और चांदी की अंगूठी या कड़ा पहनें।

- बुध ग्रह के कारण आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो किसी चांदी के आभूषण का दान करें।

- गुरु के प्रभाव के कारण तरक्की में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन पीली गाय को गुड़-चने खिलाएं।

- यदि शुक्रग्रह के कारण आपको बाधा हो तो रोज घर की बुजुर्ग स्त्रियों के चरण स्पर्श करें।

- राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ  को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

- केतु का अशुभ प्रभाव हो तो रोज कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं।

पहनें इस रंग के कपड़े, हो जाएगी चट मंगनी-पट ब्याह



यदि काफी उम्र होने के बाद भी आपकी बिटिया की शादी नहीं हो पा रही है और अब रिश्ते आना भी बंद हो गए हैं तो भी आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि नीचे हम आपको बता रहे हैं इस समस्या का निदान कैसे संभव है।

उपाय

ज्योतिष के अनुसार हर रंग का व्यक्ति पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हर रंग एक विशेष देवता को प्रिय होता है। पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को अधिक प्रिय माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार जब तक देवगुरु बृहस्पति अनुकूल न हो,विवाह नहीं हो पाता है। जिस कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो उसे गुरुवार को पीले तथा शुक्रवार को सफेद वस्त्र पहनना चाहिए। ऐसा करने से उस कन्या के लिए विवाह प्रस्ताव आने लगते हैं और जल्दी ही उसका विवाह भी हो जाता है। यह उपाय करते समय मन में देवगुरु बृहस्पति के लिए श्रृद्धा भाव होना आवश्यक है।

करें इस मंत्र का जप, नहीं सताएगा दुश्मनों का डर

क्या आपके कई दुश्मन हैं जो हमेशा आपका अहित करने की सोचते रहते हैं। आपको हर समय यही डर सताता रहता है कि कहीं आपका कोई दुश्मन आपको नुकसान तो नहीं पहुंचा रहा। यदि ऐसा है तो नीचे लिखे मंत्र का विधिवत जप करने से आपको कभी भी दुश्मनों का भय नहीं सताएगा। यदि आपका कोई शत्रु आपका अहित करने का प्रयास करेगा भी तो वह सफल नहीं हो पाएगा।

मंत्र

मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशन।

शत्रून संहर मां रक्ष श्रियं दापय मे प्रभो।।


जप विधि-

- सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्म कर, नहाकर, साफ वस्त्र धारण करें।

- भगवान हनुमान का चित्र और हनुमान यंत्र सामने रख कर पूर्व दिशा में मुख करके आसन पर बैठ जाएं।

- शत्रु निवारण के लिए हनुमान यंत्र के सामने यह मंत्र पढ़ते हुए सिंदूर चढ़ाएं साथ ही गुड़ का भोग भी लगाएं।

- मंत्र जप के समय मूंगे की माला या लाल हकीक की माला का प्रयोग करें।

जानिए, पीपल का पेड़ आपको कैसे बना सकता है धनवान

हिंदू धर्म में पीपल के वृक्ष को बहुत ही पवित्र माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जिसके घर में पीपल का वृक्ष होता है, उसके घर कभी दरिद्रता नहीं आती और सुख-शांति बनी रहती है। विज्ञान ने भी पीपल के वृक्ष के महत्व को माना है। यहां हम आपको बता रहे हैं पीपल के वृक्ष से जुड़े कुछ तंत्र उपाय, जिससे आपकी कई समस्याओं का निदान हो जाएगा।

उपाय

शनि दोष से बचने के लिए

शनि दोष निवारण के लिए भी पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। यदि रोज पीपल पर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है। शनिवार की शाम पीपल के नीचे दीपक लगाएं और पश्चिममुखी होकर शनिदेव की पूजा करना और भी लाभकारी होता है।

धन प्राप्ति के लिए

पीपल के पेड़ के नीचे शिव प्रतिमा स्थापित करके उस पर प्रतिदिन जल चढ़ाएं और पूजन-अर्चन करें। कम से कम 5 या 11 माला मंत्र का जप(ऊँ नम: शिवाय) करें। कुछ दिन नियमित साधना के बाद परिणाम आप स्वयं अनुभव करेंगे। प्रतिमा को धूप-दीप से शाम को भी पूजना चाहिए।

हनुमानजी की कृपा पाने के लिए

हनुमानजी की कृपा पाने के लिए भी पीपल के वृक्ष की पूजा करना शुभ होता है। पीपल के वृक्ष के नीचे नियमित रूप से बैठकर हनुमानजी का पूजन, स्तवन करने से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और साधक की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

बहुत तेज होता है गुस्सा इन लोगों का, नाम के पहले अक्षर से पहचानिए..


जिन लोगों के नाम का पहला अक्षर ई, उ, ए, ओ, वा, वि, वू, वे, वो से शुरू होता है वे वृष राशि वाले माने जाते हैं। इस राशि का चिन्ह बैल है। बैल स्वभाव से ही अधिक परिश्रमी और अधिक वीर्यवान होता है। साधारणत: वह शांत रहता है किन्तु क्रोध आने पर वह उग्र रूप धारण कर लेता है। यह स्वभाव वृष राशि के जातक में भी पाया जाता है। वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। इसके अन्तर्गत कृत्तिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चारों चरण और मृगशिरा के प्रथम दो चरण आते हैं।

इस राशि के लोगों को पिता-पुत्र का कलह सहन करना पड़ता है। जातक का मन सरकारी कार्यों की ओर रहता है। सरकारी ठेकेदारी का कार्य करवाने की योग्यता रहती है। पिता के पास जमीनी काम या जमीन के द्वारा जीविकोपार्जन का साधन होता है। वृष राशि के अधिकतर लोग शराब और मांसाहार  भोजन में अपनी रूचि को प्रदर्शित करता है।

गुरु का प्रभाव जातक में ज्ञान के प्रति अहम भाव को पैदा करने वाला होता है, वह जब भी कोई बात करता है तो गर्व की बात करता है। सरकारी क्षेत्रों की शिक्षाएं और उनके काम व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यदि इनकी कुंडली में किसी प्रकार से केतु का बल भी मिल जाता है तो व्यक्ति सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखता है। मंगल के प्रभाव से व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का हो सकता है। कल-कारखानों का संचालन, स्वास्थ्य कार्यों और जनता के झगड़े सुलझाने का कार्य जातक कर सकता है। इनकी माता को कई प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। ये अधिक सौन्दर्य बोधी और कला प्रिय होते हैं। जातक कला के क्षेत्र में नाम करता है। वृष राशि के लोग अपने जीवन साथी के अधीन रहना पसंद करता है। ये उत्तम श्रेणी के प्रेमी होते हैं।

इन लोगों को चन्द्र-बुध के प्रभाव से संतान के रूप में कन्या प्राप्त होने के अधिक योग रहते हैं। जीवन में व्यापारिक यात्राएं काफी होती हैं। कभी-कभी व्यक्ति अपने ही बनाए हुए उसूलों पर जीवन चलाता है, वह मकड़ी जैसा जाल बुनता रहता है और अपने ही बुने जाल में फंस जाता है। रोहिणी के चौथे चरण के मालिक चन्द्र-चन्द्र है, जातक के अन्दर हमेशा उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है, वह अपने ही मन का राजा होता है।

यदि इन लोगों की कुंडली में मंगल-सूर्य की युति हो तो व्यक्ति अपने शरीर से दुबले-पतले और गुस्सेवाले हो सकते हैं। इन लोगों में आदेश देने की प्रवृत्ति होती है। जातक अगर राज्य में किसी भी विभाग में काम करते हैं तो सरकारी सम्पत्ति को किसी भी तरह से क्षति नहीं होने देते। मंगल-बुध जातक के अन्दर कभी कठोर और कभी नर्म भावनाएं पैदा करते हैं। इनका मन कम्प्यूटर और इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र की ओर होता है। वृष राशि वाले जातक शांति पूर्वक रहना पसंद करते हैं।

Thursday, April 26, 2012

इस दिशा में वास्तु दोष हो तो संभव है अकाल मृत्यु

भूखण्ड के नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) दिशा में मार्ग हो तो भवन नैऋत्य मुखी होता है। नैऋत्य दिशा का स्वामी राक्षस तथा प्रतिनिधि गृह राहु है। नैऋत्य दिशा स्वयं के व्यवहार व आचार-विचार के लिए उत्तरदायी है। इसमें वास्तु दोष रखना अकाल मृत्यु को बुलावा देना है। ऐसे भूखण्ड पर निर्माण करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए-

1- नैऋत्य दिशा सदैव ऊंची एवं भारी बनाएं, इस दिशा में भवन का भाग ऊंचा व भारी रखें जिससे अन्य दिशाओं का जल इस ओर न आए।

2- नैऋत्य दिशा शुद्ध रखने पर ही भाग्य वृद्धि होगी।

3- यदि भवन के स्वामी ने ईशान व नैऋत्य दिशा को शुद्ध कर लिया तो समझ लें उसने भाग्य व भोग के सभी साधन जुटा लिए हैं।

4- ऐसा नैऋत्य मुखी भूखण्ड कभी न खरीदें जिसमें खाई, गड्ढा या भराव की आवश्यकता हो।

5- नैऋत्य दिशा में भूखण्ड के आसपास ऊंचे वृक्ष हों तो उन्हें कटवाना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर धन हानि होगी।

6- नैऋत्य दिशा में ऊंचा चबूतरा बनाना उन्नतिकारक है।

7- नैऋत्य दिशा का भाग ऊंचा रखना यश, समृद्धि व धन कारक है।

8- मुख्य द्वार पश्चिम में और कुआं ईशान दिशा में बनाना शुभ है।

9- नैऋत्य दिशा में स्नानागार व शौचालय न बनवाएं।

Sunday, April 1, 2012

बगलामुखी महामंत्रम

बगलामुखी महामंत्रम
     बगलमुखी की पूजा पीतांबरा विध्या के रूप में प्रसिध्द् हैं|(इनकी पूजा में प्रमुखता से पीले रंग का उपयोग किया जाता है)|इनकी पूजा से शत्रुओं से रक्षा तथा उन्हें परास्त करने,कोर्ट केश मे विजयी दिलाने,धनार्जन,ऋण से मुक्ति तथा वाक्-चातुर्य की शक्ति का प्राप्ति होता है|
     इनकी पूजा पीले वस्त्र,हल्दी से बने माला,पीले आसन और पीले पुष्प का उपयोग किया जाता है|यह पीठासीन देवी हैं जो अपनी दिव्य शक्तिओं से असुरों को विनाश करतीं हैं|उनका निवास अमृत की सागर के मध्य है,जहॉ उनके निवास स्थान को हीरों से सजाया गया है तथा उनका सिंहासन् गहनों से जड़ित है|
     उनके आकृति से स्वर्ण आभा आती है|वह पीले परिधान,स्वर्ण आभूषण तथा पीला माला धारण करतीं हैं|उनके वाएँ हाथ मे शत्रु के जीभ और दाहिने हाथ मे गदा है|इनकी उत्पत्ति के बारे मे एक कहानी का वर्णन किया गया है|सतयुग मे एक् बार पूरी सृष्टि भयानक चक्रवात मे फँसी थी,तब भगवान विष्णु संपूर्ण मानव जगत के सुरक्षा हेतु सॉराष्ट् मे स्थित हरिद्रा सरोवर के पास देवी भगवती को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगें|
     श्रीविधा उनके सम्मुख हरिद्रा सरोवर के जल से स्वर्ण आभा लिए प्रकट हुई|उन्होनें सृष्टि विनाशक तूफान को नियंत्रित कीं तथा सृष्टि को बर्वाद होने से बचाई|
     देवी बगलामुखी प्रकृति में अतिचार करने वाली बुरी शक्तियों को नियंत्रित करने मे सहायता करती हैं|वह हमारी वाक् ज्ञान और गति को नियंत्रित करने मे मदद करती हैं|वह अपने भक्तों को शक्ति और सिद्दि देती हैं तथा सभी ईच्छाओं की पूर्ति करती हैं,जैसा-कि उन्होने अपने भक्त 'कल्पतरू' को दिए|
!!ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं
स्तम्भय जिह्वां किलय बुध्दिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा!!
बगलामुखी महामंत्र का अर्थ इस प्रकार हैं-
हे देवी मेरे सारे दुश्मनों को बेवस और लाचार कीजिए.उनके बुध्दि और गति को नष्ट कीजिए.
ध्यान देः- बिना सही निर्देश और सहायता के बगलामुखी मंत्र का उच्चारण ना करें.इस साधना के पहले बगलामुखी दीक्षा ले लें.

Thursday, March 22, 2012

इसे पहनने से हो सकता है आपका प्रमोशन

अगर लंबे समय से किसी कंपनी में काम रह हैं और आपका प्रमोशन नहीं हो रहा है तो आप बिल्कुल भी निराश न हों क्योंकि हम आपको एक ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसके करते ही धीरे-धीरे आपके प्रमोशन के योग बनने लगेंगे।

ज्योतिष के अनुसार प्रमोशन के लिए गणेश रुद्राक्ष धारण करना एक बहुत ही सरल उपाय है। जिन लोगों को लगातार करियर में रुकावटें आ रही है या व्यापार में घाटा हो रहा है, तो ऐसे लोगों के लिए गणेश रुद्राक्ष धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। स्मरण शक्ति में वृद्धि , प्रमोशन व व्यवसायिक योजनाओं में सफलता के लिए गणेश रुद्राक्ष बहुत लाभदायक होता है। इस रुद्राक्ष के बीच से तार निकालकर और दोनों और चांदी का आवरण चढ़ाकर इसे लाल धागे में पहनने से प्रमोशन व व्यापार में आ रही रुकावटें शीघ्र ही दूर हो जाती हैं।

Monday, February 27, 2012

सुखी होगा दांपत्य जीवन

पति-पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। यानी एक-दूसरे के बिना वे अधूरे हैं। इसके बाद भी पति-पत्नी में विवाद होते रहते हैं। कई बार विवाद काफी बड़ भी जाते हैं। गुप्त नवरात्रि में कुछ साधारण उपाय करने से दाम्पत्य जीवन में आ रही परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

उपाय



- यदि जीवनसाथी से अनबन होती रहती है तो गुप्त नवरात्रि में नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार अग्नि में घी से आहुतियां दें। इससे यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। अब नित्य सुबह उठकर पूजा के समय इस मंत्र को 21 बार पढ़ें। यदि संभव हो तो अपने जीवनसाथी से भी इस मंत्र का जप करने के लिए कहें-

सब नर करहिं परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

- गुप्त नवरात्रि के दौरान यदि रोज सुबह-शाम यदि घर में शंख बजाया जाए अथवा गायत्री मंत्र का जप करें गृहक्लेश समाप्त हो जाता है।

चाहिए मनचाही दुल्हन तो आज ये उपाय करें

गुप्त नवरात्रि में की गई पूजा विशेष फलदाई रहती है। यदि आप चाहते हैं कि आपका विवाह आपकी मनचाही लड़की से हो तो नीचे लिखा उपाय करें। आपकी मनोकामना जरुर पूरी होगी।

उपाय

नवरात्रि के दौरान जो भी सोमवार (30 जनवरी) आए। उस दिन सुबह किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर चढ़ाते हुए उसे अच्छी तरह से साफ करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं और पूरे मंदिर में झाड़ू लगाकर उसे साफ करें। अब भगवान शिव की चंदन, पुष्प एवं धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करें। रात्रि 10 बजे के पश्चात अग्नि प्रज्वलित कर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए घी से 108 आहुति दें। अब 40 दिनों तक नित्य इसी मंत्र का पांच माला जप भगवान शिव के सम्मुख करें। इससे शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी और आपको मनचाही दुल्हन मिलेगी।

चाहते हैं कोर्ट केस जीतना तो यह टोटका करें

क्या आपका कोई कोर्ट केस लंबे समय से चल रहा है जिसके कारण आप अक्सर परेशान रहते हैं तो अब आपको कोर्ट केस को लेकर परेशान होने की जरुरत बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि नीचे लिखे एक साधारण उपाय करने से कोर्ट केस का फैसला आपके पक्ष में हो सकता है। यह उपाय करते समय मन में पूर्ण श्रृद्धा का होना बहुत जरुरी है।

टोटका

मंगलवार के दिन से शुरु करके हर रोज शाम को चार-पांच बजे के करीब गेहूं की रोटी के चूरे में देशी घी और चीनी मिलाकर कौओं को खिलाएं। ऐसा तबतक करते रहें जब तक कि मुकद्मा चलता रहे। तारीख वाले दिन उन्हीं कौओं में से किसी का एक पंख अपनी दाईं तरफ की जेब में डालकर अदालत में हाजिर हों। इसके प्रभाव से केस का फैसला आपके पक्ष में हो जाएगा। जब मुकद्मा जीत जाएं तो कौओं को रोटी खिलाने का प्रयोग कम से कम एक हफ्ते तक और करते रहें।

जल्दी हो जाएगी शादी

वर्तमान समय में समय पर विवाह न हो पाना एक आम समस्या बन चुकी है। इसके कई कारण हो सकते हैं। जैसे-जैसे विवाह योग्य युवक-युवती की उम्र बढ़ती जाती है। माता-पिता की चिंता भी बढ़ती जाती है। इस समस्या के निदान के लिए यदि नीचे लिखा छोटा सा उपाय किया जाए तो अतिशीघ्र विवाह हो जाता है। उपाय इस प्रकार है-

उपाय

विवाह योग्य युवक-युवती शुक्रवार के दिन भगवान शंकर के मंदिर में जाकर जलाभिषेक करें यानी जल चढ़ाएं। इसके बाद 108 आंकड़े के फूल चढ़ाते हुए ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप मन ही मन में करें। इसके बाद 21 बेलपत्र चढ़ा कर शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करें। यह उपाय कम से कम 7 शुक्रवार तक नियमित रूप से करें तो जल्दी ही विवाह संपन्न हो जाता है।




यदि आप चाहती हैं कि आपको मनचाहा पति मिले तो इसके लिए आपको रामचरित मानस की नीचे लिखी चौपाई का विधि-विधान से जप करना होगा। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने ऐसी कई चौपाइयां लिखी हैं जिनका जप करने से मनुष्य की कई परेशानियां समाप्त हो जाती हैं। उन्हीं में से एक चौपाई यह भी है, जिसका जप करने से मनचाहा वर प्राप्त होता है। यह चौपाई बालकाण्ड में सीताजी के गौरी पूजन प्रसंग की है।



चौपाई

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।

जप विधि

- सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन करें।

- इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें।

- तत्पश्चात रुद्राक्ष की माला से ऊपर लिखी चौपाई का जप करें। कम से कम 5 माला जप अवश्य करें।

- इस प्रकार प्रतिदिन इस चौपाई का जप करने से मनचाहा वर प्राप्त होता है।




जानिए, कैसे लोगों को दिखाई देते हैं भूत-प्रेत

हमारे आस-पास कई ऐसी अदृश्य शक्तियां उपस्थित रहती है जिन्हें हम देख नहीं पाते। यह शक्तियां नकारात्मक भी होती है और सकारात्मक भी। सिर्फ कुछ लोग ही इन्हें देख या महसूस कर पाते हैं। राक्षस गण वाले लोगों को भी इन शक्तियों का अहसास तुरंत हो जाता है। ऐसे लोग भूत-प्रेत व आत्मा आदि शक्तियों को तुरंत ही भांप जाते हैं।

क्या हैं राक्षस गण?

राक्षस गण, यह शब्द जीवन में कई बार सुनने में आता है लेकिन कुछ ही लोग इसका मतलब जानते हैं। यह शब्द सुनते ही मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा भय भी उत्पन्न होने लगता है और हमारा मन राक्षस गण वाले लोगों के बारे में कई  कल्पनाएं भी करने लगता है। जबकि सच्चाई काफी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रत्येक मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है। मनुष्य गण, देव गण व राक्षस गण।

कैसे पहचाने गण को?

कौन सा व्यक्ति किस गण का है यह कुंडली के माध्यम से जाना जा सकता है। मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।

इन छोटे उपायों से भी दूर हो सकता है वास्तु दोष

वास्तु न सिर्फ आपके घर को बल्कि आपके जीवन को भी प्रभावित करता है। जीवन में आने वाली परेशानियों का कारण घर का वास्तु दोष भी हो सकता है। नीचे लिखे कुछ सरल उपाय कर इन वास्तु दोषों को दूर किया जा सकता है-

1- डाइनिंग हॉल की दीवारों पर फल-फूलों व प्राकृतिक दृश्यों के अच्छे चित्र लगाए जा सकते हैं।

2- अनुपयोगी वस्तुएं घर में न रखें। उन्हें घर से निकालते रहें।

3- यदि जनरेटर सेट अथवा इन्वर्टर ईशान में हो तो उसे वहां से हटाकर आग्नेय कोण में स्थापित करें।

4- स्वस्तिक, मंगल कलश, ओम, 786 आदि मंगल चिन्हों की तस्वीरें घर  में अवश्य लगाएं। इनसे घर में सुख-शांति बढ़ती है।

5- पूर्वजों के चित्र, देवी-देवताओं के साथ कभी न लगाएं।

6- शयन कक्ष में सदैव सुंदर, कलात्मक फूलों या हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें लगाने से नींद भी बेहतर आती है।

7- डाइनिंग हॉल की दीवारों का रंग हल्का व शांत व शीतलता प्रदान करने वाला हो। भारी सजावट से भी बचें।

Sunday, February 26, 2012

राशि अनुसार करें यह उपाय, बिजनेस में मिलेगी सक्सेस

क्या आपका बिजनेस ठीक से नहीं चल रहा या फिर आपको बिजनेस में सक्सेस नहीं मिल पा रही है। यदि आप चाहते हैं कि आपको बिजनेस में जबर्दस्त सक्सेस मिले तो आपको नीचे लिखे उपाय करने होंगे। ये उपाय राशि के अनुसार हैं यानी अपनी राशि के अनुसार ही आपको उपाय करना है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

मेष- इस राशि के लोग लाल कपड़े में सवा किलो मसूर की दाल बांधकर घर या अपनी दुकान में रखें। दुकान ठीक से चलने लगेगी।

वृषभ- वृषभ राशि के लोग गंगा या अन्य पवित्र नदी का जल मटके में लेकर उसे सफेद कपड़े से ढंककर अपने घर, दुकान या कारखाने में रखें।

मिथुन- मिथुन राशि के लोग एक कांसे का बर्तन हरे कपड़े में बांधकर घर और दुकान में पूर्व दिशा की ओर रखें। तरक्की अवश्य होगी।

कर्क- इस राशि के लोग चांदी का एक सिक्का किसी डिब्बी या बर्तन में भरे पानी में डालकर घर या दुकान में पूर्व दिशा में रखें।

सिंह- सिंह राशि वाले लोग एक कटोरी में सैंधा नमक भरें और उसे घर एवं व्यापार स्थर पर पूर्व दिशा में रखें।

कन्या- इस राशि के जातक कटोरी में कर्पूर डूबोकर दुकान या घर में पूर्व दिशा की ओर रखें।

तुला- कोई भी सफेद रंग की मूर्ति घर या व्यापार स्थल पर रखें। यह जरुरी नहीं कि मूर्ति किसी देवी-देवता की ही हो।

वृश्चिक- इस राशि वालों को शहद की शीशी लाल कपड़े में लपेट कर घर या दुकान के दक्षिणी कोने में रखनी चाहिए।

धनु- धनु राशि के  लोगों को पीले कपड़े में कोई भी धार्मिक पुस्तक लपेट कर निवास, दुकान या फैक्ट्री के पूर्वी कोने में रखें।

मकर- मकर राशि के लोगों के लिए नारियल के तेल में काले तिल एवं नारियल पर काला धागा बांध कर दोनों वस्तुएं घर या दुकान के पूर्वी कोने में रखना शुभ होता है।

कुंभ- नारियल के दो सूखे गोलों में अनाज भरकर एक का दान कर दें और दूसरा घर या दुकान में रखें।

मीन- मीन राशि के जातक 21 सिक्के पीले कपड़े में बांध कर घर या दुकान के ईशान कोण में रखें

कुंडली से जानिए, कितने मकानों के मालिक बनेंगे आप

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखकर यह बताया जा सकता है कि उसके पास स्वयं का घर होगा या नहीं या फिर वह कितने मकानों का मालिक होगा। नीचे कुछ ऐसे ही योग दिए गए हैं जिनसे आप जान सकते हैं कि आपके भाग्य में कितने मकान हैं-

1- जन्म कुण्डली के चौथे भाव में या चौथे भाव का स्वामी चर राशि(मेष, कर्क, तुला, मकर) में हो और चौथे भाव का स्वामी शुभ ग्रहों से युत हो तो ऐसा व्यक्ति अनेक भवनों में रहता है और उसे अनेक भवन बदलने पड़ते हैं। यदि चर की जगह स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) हो तो व्यक्ति के पास स्थाई भवन होते हैं।

2- जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी (चतुर्थेश) बली हो तथा लग्न का स्वामी, चौथे भाव का स्वामी, दूसरे भाव का स्वामी इन तीनों में से जितने ग्रह केंद्र-त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 10) भाव में हो उतने भवन होते हैं।

3- जन्मकुण्डली में नौंवे भाव का स्वामी दूसरे भाव में और दूसरे भाव का स्वामी नौवें भाव में स्थित हो अर्थात परिवर्तन योग हो तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय बारहवें वर्ष में होता है और 32 वें वर्ष के उपरांत उसे वाहन, भवन और नौकर का सुख मिलता है।

Wednesday, January 18, 2012

अपनी राशि के अनुसार जानिए की किस दिशा में हो आपका स्टडी रूम/अध्ययन कक्ष

अपनी राशि के अनुसार जानिए की किस दिशा में हो आपका स्टडी रूम/अध्ययन कक्ष---


पढ़ाई में अव्वल हो, अच्छे नंबर आएं, परीक्षा में सफलता मिले वगैरह-वगैरह, ऐसी चाहत हर विद्यार्थी की होती हैं। लेकिन कभी-कभी मेहनत के बावजूद कुछ छात्र असफल भी हो जाते हैं। अगर आप भी परीक्षा में सफल होना चाहते हैं, तो मेहनत के साथ-साथ कुछ सामान्य उपाय करके शिक्षा के क्षेत्र में अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं। अक्सर ये देखा गया है कि स्टूडेन्ट्स घंटो बैठ कर पढ़ाई करते हैं लेकिन उनका रिजल्ट संतोषजनक नही होता।अगर आपके बच्चों के साथ भी ऐसा होता है, तो हो सकता है इसमें बच्चों की कोई गलती न हों, क्योंकि वास्तु के अनुसार बच्चों के लिए उनकी राशि के अनुसार पढ़ाई करने की दिशा बताई गई हैं। अगर स्टूडेन्ट्स अपनी राशि के अनुसार स्टडी रूम में बैठकर पढ़ाई करें तो उनको अपनी मेहनत के पूरे परिणाम मिलने लगेंगे।
हर छात्र की कामना होती है, कि वह परीक्षा में न केवल उत्तीर्ण हो, बल्कि उसे अच्छी सफलता भी मिले। प्रयास तो सभी करते हैं मगर इनमें से कुछ लोग ही सफल होते हैं। कई छात्रों की समस्या होती है कि कड़ी म्हणत करने के बावजूद आपेक्षित परिणाम नहीं मिल पते हें...आइये जाने की इस समस्या से केसे पायें छुटकारा---

किस दिशा में बैठकर करें पढाई--
विद्यार्थियों को अध्ययन करते समय अपना मुंह हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और पढ़ाई में ध्यान लगा रहता है। विद्यार्थियों को ऐसे स्थान पर पढ़ाई नहीं करनी चाहिए, जहां पर बाहर की वायु का प्रवाह सीधे आप पर पड़ता हो, अर्थात् द्वार या खिड़की के समीप बैठकर नहीं पढ़ना चाहिए। क्योंकि खुले द्वार और खिड़की पढ़ाई में एकाग्रता प्रदान नहीं करते।

मेष- इस राशि के विद्यार्थियों को अपनी राशि के अनुसार पूर्व दिशा में अपना स्टडी रूम रखना चाहिए।

वृष- पूर्व-दक्षिण (आग्रनेय कोण) में बना स्टडी रूम, वृष राशि वालों के लिए लाभदायक रहेगा।

मिथुन- बुध देव की राशि के छात्रों को उत्तर-पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) में अपना स्टडी रूम रखना चाहिए।

कर्क- उत्तर दिशा इस राशि वालों के लिए लाभदायक रहेगी।

सिंह- पूर्व-दक्षिण दिशा (आग्रनेय कोण) में पढ़ाई करने से इस राशि वालों को अच्छे परिणाम मिलेंगे।

कन्या- दक्षिण दिशा कन्या राशि वालों के लिए उपयुक्त रहेगी।

तुला- पश्चिम दिशा में पढ़ाई करने से तुला राशि वालों को हमेशा लाभ मिलेगा।

वृश्चिक- उत्तर-पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) वृश्चिक राशि वालों के लिए अनुकूल परिणाम देने वाली रहेगी।

धनु- इस राशि वालों को उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान्य कोण) में अपना स्टडी रूम रखना चाहिए।

मकर- शनि की राशि वालों को अपनी राशि के अनुसार दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) में पढ़ाई करना चाहिए।

कुंभ- कुंभ राशि वालों के लिए पश्चिम दिशा पढऩे के लिए अनुकूल रहेगी।

मीन- इस राशि वालों के लिए उत्तर दिशा अच्छा फल देने वाली रहेगी।

ब्रह्म मुहूर्त में करें पढ़ाई--------------
ब्रह्म मुहूर्त पढ़ाई के लिए बेहतर माना जाता है। कहते हैं, इस समय में उठकर अध्ययन करने से विषय का ध्यान लंबे समय तक विद्यार्थियों के जेहन में ताजा रहता है। इसलिए संभव हो तो देर रात तक पढ़ाई करने के बजाय ब्रह्म मुहूर्त में ही पढ़ाई करें। ब्राह्मी बूटी को गले में धारण करने या सेवन करने से भी स्मरण शक्ति बढ़ती है। इसके सेवन से एकाग्रता भी आती है। जब आपका सूर्य स्वर (दायां स्वर) नासिका चल रहा हो, तब कठिन विषय का अध्ययन करें, तो वह शीघ्र याद हो जाएगा। ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
कमरे में हरे परदे लगाएं------------
जहां आप पढ़ते हों, उस कमरे में हरे रंग के परदे का इस्तेमाल करें, इससे मन को शांति मिलती है। साथ ही एकाग्रता भी आती है। जिन विद्यार्थियों को परीक्षा में उत्तर भूल जाने की आदत हो, उन्हें परीक्षा में अपने पास कपूर और फिटकरी रखनी चाहिए। यह नकारात्मक ऊर्जा को हटाते हैं।
किताब में रखें मोरपंख-------------
कठिन विषय की पाठ्य पुस्तकों में गुरु वार के दिन मोरपंख रखें। इससे पाठ जल्द याद होते हैं। स्वर शास्त्र के अनुसार, जो स्वर चल रहा हो, परीक्षा के लिए जाते हुए वही पैर घर से निकालें। इसी प्रकार परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते समय भी चल रहे स्वर का ध्यान रखकर प्रवेश करें। इससे अनुकूलता सिद्ध होगी और सफलता मिलेगी। खाते पीते हुए अध्ययन नहीं करना चाहिए। इससे न तो आप सही ढंग से खा पाएंगे और न पढ़ पाएंगे। अगर अध्ययन कक्ष अलग नहीं हो, तो सामूहिक कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस प्रकार बैठना चाहिए कि मुख सामने पूर्व दीवार की ओर रहे।
कोने में बैठने से बचें--------------
कोने में विद्यार्थी को बैठने से बचना चाहिए। विशेष रूप से दीवार की ओर मुख करकेबैठने से विद्यार्थी की प्रतिभा प्रकट नहीं होती। विद्यार्थियों को अपने कानों को बालों से नहीं ढकना चाहिए। ऐसी स्थिति में विद्यार्थी भ्रमित हो सकते हैं और पढ़ाई से मन भटक जाता है।
बुधवार को कमरे में रखें हकीक---------------
अगर अध्ययन के प्रति एकाग्रता कम हो रही हो, तो नवग्रहों के रंग के अनुसार नौ सुलेमानी हकीक हरे रंग के कपड़े में बांधकर विद्यार्थी को अपने अध्ययन कक्ष में रखना चाहिए तथा प्रत्येक बुधवार उन्हें देखकर पुनः बांध देना चाहिए। इससे पढ़ने में मन लगने लगता है। विद्यार्थी को अपने अध्ययन कक्ष के पूर्व की दिशा में सरस्वती देवी का चित्र अवश्य लगाना चाहिए। इसके अलावा अध्ययन कक्ष की मेज पर खेलने का समान मसलन, शतरंज, ताश आदि नहीं रखने चाहिए।
कमरे के द्वार पर नीम की डाली-----------
इसके अलावा विद्यार्थियों को सफलता पाने के लिए अपने कक्ष के द्वार पर नीम की डाली लगानी चाहिए। इससे घर में शुद्ध हवा आती है और सकारात्मक उर्जा का प्रवाह होता है। उपर्युक्त उपाय छात्रों के लिए हैं। इनको आजमाकर वे परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। हां, इसके साथ-साथ आपको अपनी परीक्षा में सफल होने के लिए मेहनत भी करनी होगी।
पढ़ाई में मन न लगे तो करें यह उपाय---
पढ़ाई की ओर मन नहीं जाता है। मन मारकर पढ़ने बैठते हैं तो मन में दस तरह की बातें आने लगती और पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति व्यक्ति के साथ तब होती है जब जन्मपत्री में ग्रहों की स्थिति खराब चल रही होती है। इस स्थिति में मन को केन्द्रित करके पढ़ाई की ओर ध्यान लगाने के लिए रिडिंग टेबल पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर श्री यंत्र स्थापित करें।
जब भी पढ़ने बैठे तब श्री यंत्र पर ध्यान केन्द्रित करके 'ओम भवाय विद्यां देहि देहि ओम नमः' इस मंत्र का 21 बार जप करें। कुछ ही दिनों में पढ़ाई के प्रति रूचि बढ़ने लगेगी और जो भी पढ़ेंगे उसे लम्बे समय तक याद रख पाएंगे।
पूर्व दिशा की ओर मुख----
अगर अध्ययन कक्ष अलग नहीं हो, तो सामूहिक कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस प्रकार बैठना चाहिए कि मुख सामने पूर्व दीवार की ओर रहे। कोने में विद्यार्थी को बैठने से बचना चाहिए।
विशेष रूप से दीवार की ओर मुख करकेबैठने से विद्यार्थी की प्रतिभा प्रकट नहीं होती।
विद्यार्थियों को अपने कानों को बालों से नहीं ढकना चाहिए। ऐसी स्थिति में विद्यार्थी भ्रमित हो सकते हैं और पढ़ाई से मन भटक जाता है।
ध्यान रखें की खाते पीते हुए अध्ययन नहीं करें ---
इससे न तो आप सही ढंग से खा पाएंगे और न पढ़ पाएंगे। अगर आप खाना खाते हुए पढ़ाई करते हैं तो समझ लीजिए आपका ज्ञान बढ़ नहीं रहा है बल्कि आप ज्ञान और आयु दोनों को नष्ट कर रहे हैं। यही कारण है कि बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि खाना और पढ़ना दोनों साथ-साथ नहीं करना चाहिए। इस विषय में महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा हुआ है कि 'जो मनुष्य जूठे मुंह खाना पढ़ता है अथवा जूठे मुंह उठकर इधर-उधर जाता है यमराज उसकी आयु कम कर देते हैं तथा उसके बच्चों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। इस तरह से पढ़ाई करने से जो भी पढ़ते हैं वह लम्बे समय तक याद नहीं रह पाता है और जरूरत के समय ऐसी शिक्षा काम नहीं आती है।

Monday, January 16, 2012

किस ग्रह के लिए कोनसा दान लाभकारी एवं कोनसा हानिकारक


दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.
जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.

सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है. अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-
* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.
* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.
* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.

चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-
* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.
* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव, अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.
* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.

मंगल मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--
* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.
* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.
* किसी भी प्रकार का बासी भोजन( अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.

बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :--
* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.
* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.
* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.

बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :--
* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.
* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा "घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध" जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.
* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.

शुक्र जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:--
* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.
* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.

शनि यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :--
* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.
* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.
* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.

राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन(क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:--
* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.
* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.
* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.

केतु यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :--
* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.
* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.
* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा.

विवाह एवं वैवाहिक जीवन...आइये जाने तलाक के योग,कारण और उपचार

विवाह एवं वैवाहिक जीवन...आइये जाने तलाक के योग,कारण और उपचार---

कुंडली और जीवनसाथी---
युवक/वर की कुंडली---
यदि वर की कुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो उसे सुंदर पत्नी मिलती है। यदि कन्या की कुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई भी हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा धनवान होता है।
जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होता है तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही उपस्थित होता है तो जातक को सुंदर, आकर्षक, प्रभामंडल से युक्त एवं सौभाग्यशाली पत्नी प्राप्त होती है। जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होकर भाग्य भाव में उपस्थित होता है तो जातक को शीलयुक्त, रमणी एवं सुंदर पत्नी प्राप्त होती है तथा विवाह के पश्चात जातक का निश्चित भाग्योदय होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो जातक को चतुर, मृदुभाषी, सुंदर, सुशिक्षित, संस्कारवान, तीखे नाक-नक्श वाली, गौरवर्ण, संगीत, कला आदि में दक्ष, भावुक एवं चुंबकीय आकर्षण वाली, कामकला में प्रवीण पत्नी प्राप्त होती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में मिथुन या कन्या राशि उपस्थित हो तो जातक को कोमलाङ्गी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली, सौभाग्यशाली, मृदुभाषी, सत्य बोलने वाली, नीति एवं मर्यादाओं से युक्त बात करने वाली, श्रृंगारप्रिय, कठिन समय में पति का साथ देने वाली तथा सदैव मुस्कुराती रहने वाली पत्नी प्राप्त होती है। उन्हें वस्त्र एवं आभूषण बहुत प्रिय होते हैं।
जिस जातक के सप्तम भाव में कर्क राशि स्थित होती है, उसे अत्यंत सुंदर, भावुक, कल्पनाप्रिय, मधुरभाषी, लंबे कद वाली, छरहरी तथा तीखे नाक-नक्श वाली, सौभाग्यशाली तथा वस्त्र एवं आभूषणों से प्रेम करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में कुंभ राशि स्थित हो तो ऐसे जातक की पत्नी गुणों से युक्त धार्मिक, आध्यात्मिक कार्यो में गहरी अभिरुचि रखने वाली एवं दूसरों की सेवा और सहयोग करने वाली होती है।
सप्तम भाव में धनु या मीन राशि होने पर जातक को धार्मिक, आध्यात्मिक एवं पुण्य के कार्यो में रुचि रखने वाली, सुंदर, न्याय एवं नीति से युक्त बातें करने वाली, वाक्पटु, पति के भाग्य में वृद्धि करने वाली, सत्य का आचरण करने वाली और शास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
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कन्या/युवती की कुंडली-जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में गुरु उपस्थित हो तो उसे सुंदर, धनवान, बुद्धिमान पति व श्रेष्ठ संतान मिलती है।भाग्य भाव में या सप्तम, अष्टम और नवम भाव में शुभ ग्रह होने से ससुराल धनाढच्य एवं वैभवपूर्ण होती है।
कन्या की जन्मकुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र आदि में से कोई उपस्थित हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा उसे सुख व वैभव प्राप्त होता है। कुंडली के लग्न में चंद्र हो तो ऐसी कन्या पति को प्रिय होती है और चंद्र व शुक्र की युति हो तो कन्या ससुराल में अपार संपत्ति एवं समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में वृषभ, कन्या, तुला लग्न हो तो वह प्रशंसा पाकर पति एवं धनवान ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।कन्या की कुंडली में जितने अधिक शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र लग्न को देखते हैं या सप्तम भाव को देखते हैं, उसे उतना धनवान एवं प्रतिष्ठित परिवार एवं पति प्राप्त होता है।
कन्या की जन्मकुंडली में लग्न एवं ग्रहों की स्थिति की गणनानुसार त्रिशांश कुंडली का निर्माण करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि यदि कन्या का जन्म मिथुन या कन्या लग्न में हुआ है तथा लग्नेश गुरु या शुक्र के त्रिशांश में है तो उसके पति के पास अटूट संपत्ति होती है तथा कन्या सदैव ही सुंदर वस्त्र एवं आभूषण धारण करने वाली होती है।
कुंडली के सप्तम भाव में शुक्र उपस्थित होकर अपने नवांश अर्थात वृषभ या तुला के नवांश में हो तो पति धनाढच्य होता है।सप्तम भाव में बुध होने से पति विद्वान, गुणवान, धनवान होता है, गुरु होने से दीर्घायु, राजा के संपत्ति वाला एवं गुणी तथा शुक्र या चंद्र हो तो ससुराल धनवान एवं वैभवशाली होता है। एकादश भाव में वृष, तुला राशि हो या इस भाव में चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो ससुराल धनाढच्य और पति सौम्य व विद्वान होता है।हर पुरुष सुंदर पत्नी और स्त्री धनवान पति की कामना करती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसकी पत्नी शिक्षित, सुशील, सुंदर एवं कार्यो में दक्ष होती है, किंतु ऐसी स्थिति में सप्तम भाव पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो दाम्पत्य जीवन में कलह और सुखों का अभाव होता है।
जातक की जन्मकुंडली में स्वग्रही, उच्च या मित्र क्षेत्री चंद्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है तथा उसे सुंदर, सुशील, भावुक, गौरवर्ण एवं सघन केश राशि वाली रमणी पत्नी प्राप्त होती है। सप्तम भाव में क्षीण चंद्र दाम्पत्य जीवन में न्यूनता उत्पन्न करता है।
जातक की कुंडली में सप्तमेश केंद्र में उपस्थित हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होती है, तभी जातक को गुणवान, सुंदर एवं सुशील पत्नी प्राप्त होती है।पुरुष जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित हो तो ऐसा जातक सौभाग्यशाली होता है तथा उसकी पत्नी सुंदर, सुशिक्षित होती है और कला, नाटच्य, संगीत, लेखन, संपादन में प्रसिद्धि प्राप्त करती है। ऐसी पत्नी सलाहकार, दयालु, धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में रुचि रखती है।
दाम्पत्य सुख के उपाय----

१॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें।
२॰ सप्तम गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें।
३॰ राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र “ॐ कें केतवे नमः” का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें।
४॰ सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें।
५॰ जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें।
“ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।”
६॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
७॰ किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं।
“कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।”
८॰ जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है।
“ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।”
९॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।
१०॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।
११॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।
१२॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।
१३॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।
१४॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”
१५॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१६॰ तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें- “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।”
फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें-
“ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।”
१७॰ गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें।
१८॰ कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
१९॰ जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें।
२०॰ विवाह में बाधाएँ आ रही हो तो गुरुवार से प्रारम्भ कर २१ दिन तक प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जप १०८ बार करें-
“मरवानो हाथी जर्द अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खां की सवारी। कमाल खां मुगल पठान। बैठ चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर। न करे तो तीन लाख पैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।”
२१॰ किसी भी शुक्रवार की रात्रि में स्नान के बाद १०८ बार स्फटिक माला से निम्न मन्त्र का जप करें-
“ॐ ऐं ऐ विवाह बाधा निवारणाय क्रीं क्रीं ॐ फट्।”
२२॰ लड़के के शीघ्र विवाह के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को ७० ग्राम अरवा चावल, ७० सेमी॰ सफेद वस्त्र, ७ मिश्री के टुकड़े, ७ सफेद फूल, ७ छोटी इलायची, ७ सिक्के, ७ श्रीखंड चंदन की टुकड़ी, ७ जनेऊ। इन सबको सफेद वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु व्यक्ति घर के किसी सुरक्षित स्थान में शुक्रवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२३॰ लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।

मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार (Astrological analysis of Manglik Dosha)----

मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है. मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है

जैसे: लग्न भाव में मंगल (Mangal in Ascendant ) लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.
द्वितीय भाव में मंगल (Mangal in Second Bhava) भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.

चतुर्थ भाव में मंगल (Mangal in Fourth Bhava) चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.

सप्तम भाव में मंगल (Mangal in Seventh Bhava) सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.

अष्टम भाव में मंगल (Mangal in Eigth Bhava) अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।

द्वादश भाव में मंगल (Mangal in Twelth Bhava) कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..

भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है.

जब दो कुंडली के मिलान में ग्रहों का माकूल साथ हो तो प्रेम भी होगा और प्रेम विवाह भी। ज्योतिष की मानें तो चंद्र और शुक्र का साथ किसी भी व्यक्ति को प्रेमी बना सकता है और यही ग्रह अगर विवाह के घर से संबंध रखते हों तो इस प्रेम की परिणति विवाह के रूप में तय है। ऐसा नहीं कि प्रारब्ध को मानने से कर्म की महत्ता कम हो जाती है लेकिन इतना तय है कि ग्रहों का संयोग आपके जीवन में विरह और मिलन का योग रचता है। किसी भी व्यक्ति के प्रेम करने के पीछे ज्योतिषीय कारण भी होते हैं। कुंडली में शुक्र और चंद्र की प्रबलता है तो किसी भी जातक का प्रेम में पड़ना स्वाभाविक है। कुंडली में पाँचवाँ घर प्रेम का होता है और सातवाँ घर दाम्पत्य का माना जाता है। लग्न, पंचम, सप्तम या एकादश भाव में शुक्र का संबंध होने से प्रेम होता है। जब पाँचवें और सातवें घर में संबंध बनता है तो प्रेम विवाह में तब्दील हो जाता है।शुक्र या चंद्र के अलावा वृषभ, तुला और कर्क राशि के जातक भी प्रेम करते हैं। शुक्र और चंद्र प्रेम विवाह करवाते हैं तो सूर्य की मौजूदगी संबंधों में विच्छेद का कारण भी बनती है। सूर्य और शुक्र या शनि का आपसी संबंध जोड़े को अलग करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सप्तम भाव का संबंध यदि सूर्य से हो जाए तो भी युवा प्रेमी युगल का नाता लंबे समय तक नहीं चलता। इनकी युति तलाक तक ले जाती है। अब आँखें चार हों तो कुंडली देख लें, संभव है शुक्र और चंद्र का साथ आपको प्रेमी बना रहा हो।
प्राय: सभी माता-पिता यह चाहते हैं कि उनकी बेटी या बेटे की शादी होने के बाद उनका जीवन सुखमय और सौहार्दपूर्ण रहे। दोनों में वैचारिक मतभेद नहीं हों और वे तरक्की करें। लेकिन शादी होने के बाद यदि पति-पत्नी के बीच क्लेश और विवाद होने लगें और नौबत तलाक तक आ जाए, तो यह विचारणीय विषय है।
विवाह के बाद यदि दांपत्य सुख न मिले या पति-पत्नी के बीच मतभेद जीवनपर्यन्त चलते रहें, आपसी सामंजस का अभाव हो, तो इसका ज्योतिषीय कारण कुंडली में कुछ बाधक योगों का होना हो सकता है। क्योंकि बाधक योग होने पर ही पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद होते हैं और उनमें एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव कम होने लगता है। यदि ऎसी स्थिति किसी के साथ हो तो भयभीत नहीं हों, इन बाधक योगों के उपचार कर लेने से प्रतिकूल प्रभावों में कमी आती है। दांपत्य सुख में बाधक योग कौन से संभव हैं और उनका परिहार ज्योतिष में क्या बताया गया है इसे समझें।
विवाह भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण संस्कार है। कहते हैं कि जोड़ियां संयोग से बनती हैं जो कि परमात्मा द्वारा पहले से ही तय होती हैं। यह भी सत्य है कि अच्छी पत्नी व अच्छी सन्तान भाग्य से ही मिलती है। पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है, यदि सुकर्म अधिक हैं तो वैवाहिक जीवन सुखमय और कुकर्म अधिक हैं तो वैवाहिक जीवन दुखमय होता है।
जन्मकुंडली में विवाह का विचार सातवें भाव से होता है। इस भाव से पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार मुख्य रूप से किया जाता है।
फलित ज्योतिष में योग की महत्ता---
सप्तम यानी केन्द्र स्थान विवाह और जीवनसाथी का घर होता है. इस घर पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर या तो विवाह विलम्ब से होता है या फिर विवाह के पश्चात वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य की कमी रहती है.
जिनकी कुण्डली में ग्रह स्थिति कमज़ोर हो और मंगल एवं शुक्र एक साथ बैठे हों उनके वैवाहिक जीवन में अशांति और परेशानी बनी रहती है. ग्रहों के इस योग के कारण पति पत्नी में अनबन रहती है.
शनि और राहु का सप्तम भाव होना भी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है क्योंकि दोनों ही पाप ग्रह दूसरे विवाह की संभावना पैदा करते हैं.
राहु, सूर्य, शनि व द्वादशेश पृथकतावादी ग्रह हैं, जो सप्तम (दाम्पत्य)और द्वितीय (कुटुंब) भावों पर विपरीत प्रभाव डालकर वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देते हैं। दृष्टि या युति संबंध से जितना ही विपरीत या शुभ प्रभाव होगा उसी के अनुरूप वैवाहिक जीवन सुखमय या दुखमय होगा।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।
अष्टकूट मिलान(वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी) आवश्यक है और ठीक न हो तो भी वैचारिक मतभेद रहता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
क्यों हे आजकल मेलापक की जरुरत/आवश्यकता---विवाह योग्य वर वधु का भली-भांति विचार कर इन दोनों का मेलापक मिलान करना चाहिए| दम्पति की प्रकृति, मनोवृति एंव अभिरुचि तथा स्वाभावगत अन्य विशेषताओं में कितनी समानता है| यह हम नक्षत्र मेलापक से जान सकते है प्रणय या दांम्पत्य संबधों के लिए वर वधु का मेलापक अनिवार्य रूप से विचारणीय है|
कुछ लोग यह कह सकते है कि ज्योतिषियों द्धारा मेलापक के बाद किए गये विवाह भी बहुधा असफल होते देखें गये है| अनेक दांम्पत्यो में वैचारिक मतभेद या वैमनस्य रहता है| अनेक युगल गृह-क्लेश से परेशान होकर तलाक ले लेते है तथा अनेक लोग धनहीन, सन्तानहीन या प्रेमहीन होकर बुझे मन से गाड़ी ढकेलते देखें जाते है| मेलापक का विचार करने के बाद विवाह करना सुखमय दांमपत्य जीवन की क्या गारंटी है| यह कैसे कहां जा सकता है इस प्रकार की शंकाएं अनेकलोगों के मन में रहती है ज्योतिषी द्धारा मेलापक मिलवाने के बाद विवाह करने पर भी काफी लोगों का दांमपत्य जीवन आज सुखमय नहीं है इसके कुछ कारण है |
1 बिना जन्मपत्री मिलाएं विवाह करना 2 नकली जन्मपत्री बनवाकर मिलान करवाना 3 प्रचलित नाम से मिलान करवाना 4 जन्मकुंडली का ठीक न होना 5 जिस किसी व्यक्ति से जन्मपत्रियों का मिलान का निणर्य करा लेना|
जिस किसी से मिलवान करा लेना आज ज्योतिष कुछ ऐसे लोगों के हाथों में फंस गया है जिनको ज्योतिष शास्त्र की यथार्थ जानकारी तो क्या प्रारंभिक बातें भी ठीक-ठीक रूप से पता नहीं है ज्योतिष शास्त्र से अनभिज्ञ ज्योतिषीयो की संख्या हमारे देश में ज्यादा है यधपि तो पांच प्रतिशत व्यक्ति ज्योतिष शास्त्र के अधिकारी विदा्न भी है किन्तु मेलापक का कार्य करने वाले लोगों में अधिकांश लोग इस शास्त्र की पुरी जानकारी नही रखते| जो लोग इस शास्त्र के अच्छे ज्ञाता या विद्वान है सामान्य लोग उनके पास पहुंच नहीं पाते तथा ये विद्वान अपने स्तर से उतर कर कार्य नहीं करते| इन्ही कारणों से मेलापक का कार्य अनेक नीम-हकीम ज्योतिषीयो द्दारा हो जाता है|
कुडंलीयो का मेलापक करना या विधी मिलाना एक जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है| जिसमें सुझबुझ की आवश्यकता है| बोलते नाम से नक्षत्र व राशियां ज्ञात कर उनके आधार पर रेडीमेड मेलापक सारणी से गुण संख्या निकाल लेते है यदि 18 से गुण कम हो तो विवाह को अस्वीकृत कर देते है| यदि 18 से ज्यादा गुण हो तो विवाह की स्वीकृति दे देते है यदि जन्मपत्री उपलब्ध हो तो यह देखते हैं कि वर कि कुडंली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्धादश, में मंगल तो नहीं है| अगर मंगल इन्ही भावों में हो तो कन्या की कुडंली में इन्ही भावों में मंगल ढुढते है| यदि कन्या कि कुडंली में इन्ही भावो में मंगल मिला तो गुण-दोष का परिहार बता देते है|
मंगल की बजाय यदि इन्ही भावों में से किसी में शनि, राहु, केतु, या सूर्य मिल जाय तो भी गुण दोष का परिहार बताकर जन्मपत्रियों के मिल जाने की घोषणा 5-10 मिनटों में ही कर देते है| मेलापक करना एक उत्तरदायित्य पूर्ण कार्य है इसे नामधारी ज्योतिषी दो अपरिचित व्यक्तीयो के भावी भाग्य एवं दामपत्य जीवन का फैसला कर देता है यह कैसी विडम्बना है कि आज हर एक पण्डित, करमकाण्डी, कथावाचक, पुजारी, साधु एवं सन्यासी स्वयं को ज्योतिषी बतलाने में लगा हुआ है| इससे भी दुभाग्य की बात यह है कि जनता ऐसे तथाकथित ज्योतिषीयों के पास अपने भाग्य का निणर्य कराने, मुहूर्त और मेलापक पूछने जाती है तथा ये नामधारी ज्योतिषी लोगों के भाग्य का फैसला चुटकियाँ बजाते-बजाते कर देते है| यही कारण है कि इन लोगों से मेलापक मिलवाने के बाद ही वैवाहिक जीवन सुखमय न होने के असंख्य उदाहरण सामने आते है|
मै यह नहीं कहता कि पण्डित, करमकाण्डी, कथावाचन या पुजारियों में सभी लोग ज्योतिष से अनभिज्ञ होते है इनमें भी कुछ लोग ज्योतिष शास्त्र के अच्छे ज्ञात होते है परन्तु इनकी संख्या प्रतिशत की दष्टि काफी कम है| ज्योतिष को न जानने वाले लोगो की संख्या सवाधिक है|
मेरी राय में मेलापक का विचार ज्योतिष शास्त्र के अच्छे विद्वान से कराना चाहिए| उन्हें विचार करने के लिए भी पुरा अवसर देना चाहिए| मेलापक विचार कोई बच्चों का खेल नहीं है यह एक गूढ़ विषय है, जिसका सावधानी पूवर्क विचार करना चाहिए तथा नक्षत्र मेलापक के साथ-साथ लड़के की कुडंली से स्वास्थ्य, शिक्षा, भाग्य, आयु, चरित्र एवं संतान क्षमता का विचार अवश्य है| कन्या की कुडंली से स्वा स्वास्थ्य, स्वभाव, भाग्य, आयु, चरित्र एवं प्रजनन क्षमता का विचार कर लेना चाहिए|

बाधक योग-----
जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है।
-सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है।
-सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है।
-लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं।
-सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।
-षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है।
-छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।
-यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।
विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।
विवाह नही होगा अगर-----
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।
विवाह में देरी-----
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।

सामान्य उपाय

सामान्य उपाय
1. आपका व्यवसाय यदि कम हो गया हो या किसी ने उसे बाँध दिया हो, तो दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर 'धनदा यन्त्र' को स्थापित करें और धूप, दीप दिखाएं, नैवेघ अर्पित करें. यह क्रिया करते समय मन ही मन श्रीं श्रीं मंत्र का जप करते रहें. प्रतिदिन नहा धोकर यन्त्र का निष्ठापूर्वक दर्शन करें.

2. दीपावली पूजन के समय 501 ग्राम चुहारों का पूजन करें. उनका तिलक करें, धुप दीप से आरती उतारें, प्रसाद का भोग लगाएं और रात्री भर पूजा स्थान पर रखा रहने दें. अगले दिन उन्हें लाल चमकीले या मखमली कपडे में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें. 51 दिन तक प्रतिदिन एक रूपया किसी भी मंदिर में माता लक्ष्मी को अर्पित करें. इससे वर्ष भर लक्ष्मी स्थिर रहती है.

3. कोर्ट कचहरी में मुकदमा चल रहा हो तो पांच गोमती चक्रों को दीपावली के दिन पूजन पर रखें. जब तारीख पर कोर्ट जाना हो तो उन्हें जेब में रख कर जाएं, जाते समय मन ही मन इश्वर से विजय की प्रार्थना करते रहें, सफलता प्राप्त होगी.

4. यदि आपका उधार लिया हुआ पैसा कोई लम्बे अरसे से नहीं लौटा रहा हो तो, उस व्यक्ति का नाम लेकर ग्यारह गोमती चक्र पर तिलक लगा कर, इष्ट देव का स्मरण कर, उससे निवेदन करें, कि मेरा पैसा जल्द से जल्द लौटा दो. इसके बाद पूजित गोमती चक्रों को पीपल के वृक्ष के पास जमीन में दबा दें.

5. व्यापार में हानि, धन नाश, बढ़ते कर्ज, व्यापार में बाधा आदि से मुक्ति पाने के लिए. दीपावली के दिन श्वेतार्क गणपति को गंगाजल से स्नान कराकर लाल वस्त्र पर रखें. फिर उनके समीप लाल चन्दन का एक टुकड़ा, ग्यारह धनदायी कौडियाँ, ग्यारह गोमती चक्र एवं ताम्बे की पादुकाएं या ताम्बे का एक टुकड़ा रखें. शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सफ़ेद कागज़ पर लाल चन्दन से अपनी दुकान का नाम लिखकर इसी सामग्री के पास रखें. लाल चन्दन की माला से "ॐ गं गणपतये नमः" का एक माला जप करें. लाल चन्दन की माला न हो तो रूद्राक्ष की माला से भी जप कर सकते हैं. फिर सारी सामग्री को उसी लाल वस्त्र में लपेट कर पोटली बना लें और उसे लाल मौली या रिबन से बांधें, धूप दीप दिखाएं व व्यापार स्थल में उत्तर पूर्व दिशा में बाँध दें. नित्य प्रातः व्यापार शुरू करने से पहले, उसे धूप दीप दिखाएं. ऐसा करते समय मन ही मन गणपति के पूर्वोक्त मंत्र का जप करते रहे. ऋण मुक्ति का यह बहुत प्रभावी उपाय है.

6. गाय को प्रतिदिन दो रोटी तेल लगाकर गुड रखकर खिलाएं, पक्षियों को दाना व जल दें और अपनी आय में से दो गरीबों को भरपेट भोजन कराते रहें, लाभ होगा.

7. कार्यसिद्धि के लिए कार्यसिद्धि यन्त्र अत्यंत फलदायी है. अपनी मनोकामना को लाल चन्दन से भोजपत्र पर लिख लें. लाल या पीले वस्त्र पर कार्यसिद्धि यन्त्र स्थापित करें. अगरबत्तियां व घी का दीपक जलाएं और आरती उतारें. कार्य सिद्ध हो जाने पर प्रभु के नाम पर कोई सत्कार्य जैसे कार्य करने को कहें. उदहारणतया पांच गरीबों को भोजन कराने, या घर में भजन कीर्तन कराने या फिर कोई भी सेवा करने का प्राण करें, कार्य सिद्ध हो जाने पर उसे भूलें नहीं. अब भोजपत्र को तह करके कार्यसिद्धि यन्त्र के नीचे रख दें. नित्य प्रति पांच अगरबत्तियां जलाएं और प्रतिदिन इक्कीस बार यन्त्र के सामने अपनी भोजपत्र पर लिखी मनोकामना को दोहराएं, अगरबत्तियों को मुख्यद्वार पर लगाएं. कुछ ही दिनों में आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा.

9. यदि कमाई का कोई जरिया न हो, तो एक गिलास कच्चे दूध में, चीनी डाल कर जामुन वृक्ष की जड़ में चढ़ाएं. यह क्रिया धनतेरस से शुरू करें और चालीस दिन लगातार करें. कभी-कभी सफाई कर्मचारी को चाय की 250 ग्राम पत्ती या सिगरेट दान करें. सफ़ेद धागे में दीपावली पूजन के पश्चात धागे में दीपावली पूजन के पश्चात ताम्बे का सिक्का गले में पहनें. उस दिन रसोईघर में बैठकर भोजन करें. लाभ स्वयं दिखने लगेगा.
कार्य सिद्धि के लिए----
किसी भी कार्य विशेष की सिद्धि के लिए या इंटरव्यू में सफलता पाने के लए यह उपाय यदि श्रद्धापूर्वक किया जाए तो पक्ष में परनाम निश्चित है। काम के लिए बाहर जाते समय भगवान् का निर्माल्य का फूल हाथ में लें और 'गजानना गजानना' का मूंगे या रूद्राक्ष की माला से एक माला जप करें फिर फूल जेब में रख कर कार्य पर चले जाएं। किन्तु विदा होने के पूर्व गणपति की तस्वीर को प्रणाम कर लें। पीछे मुड कर न देखें, कार्य सिद्ध होकर रहेगा।

व्यापार वृद्धि के लिए---
शुक्ल पक्ष के बुधवार को बिल्ली की जेर चांदी के सिक्के के साथ लाल कपडे या थैली में रखकर श्रद्धापूर्वक तिजोरी में रखें। चांदी का सिक्का, चांदी का सिक्का न हो तो साधारण रूपये का सिक्का गंगाजल से शुद्ध करके साथ में रखें। ऐसा करने से निश्चित रूप से व्यापार में वृद्धि होगी।

शीघ्र विवाह के लिए---
आयु अधिक होने के बाद भी यदि कन्या का रिश्ता पक्का न हो रहा हो तो यह उपाय करें। शुक्रवार की रात आठ छुहारे लें। ये छुहारे शुक्रवार को ही खरीदें। इन्हें जल में उबाल लें और जल के साथ ही अपने सिरहाने रख कर सो जाएं। यह जल चांदी के गिलास में या कटोरे में रखें तो उत्तम होगा। अगले दिन शनिवार को प्रातः स्नान करने के बाद इस जल और छुहारों को किसी बहते जल में प्रवाहित कर दें।

घर के सदस्यों में आपसी स्नेह बढाने के लिए ---
स्फटिक माला से निम्न चौपाई का नित्य पाठ करें, परिवार के सदस्यों के साथ स्नेह बढेगा।
"जोही के जेहि पर सत्य सनेहु
सो तेहि मिलही न कछु संदेहु

मुकदमें में विजय प्राप्ति हेतु ----
हनुमान जी के पर्वत लिए चित्र के समक्ष शुक्ल पक्ष के मंगलवार से निम्नलिखित चौपाई का रूद्राक्ष की माला से नित्य दो माला पाठ करें। हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी और मुक़दमे में विजय मिलेगी। साथ ही हर प्रकार के क्लेश से मुक्ति मिलेगी। यह एक अचूक टोटका है। इसमें श्रद्धा जरूरी है।
'पवन तनय बल पवन समाना
बुद्धि विवेक विग्यान निधाना।
कवन सो काज कठिन जग माहि
जो नहि होई तात तुम पाहिं।

धन वृद्धि के लिए ----
हर बुधवार गाय को पीला पपीता खिलाएं, धन दिन दूना रात चौगुना बढेगा। यह टोटका शुक्ल पक्ष से शुरू करें।

मनोकामना की पूर्ती के लिए-----
शुभ मुहूर्त में श्री कार्य सिद्धि यन्त्र लें। भोजपत्र पर लाल चन्दन से अपनी मनोकामना लिख लें। गुलाब की ग्यारह अगरबत्तियों से आरती उतारें। कामना पूर्ती के बाद कोई शुभ काम करने का संकल्प लें। उदहारण के लिए कीर्तन भजन कराने, या किसी निश्चित संख्या में (सात, नौ आदि) गरीबों को भोजन कराना या भगवान् को वस्त्र अर्पित करना जिस भोज पत्र पर मनोकामना लिखी है उसकी चार तह बनाकर कार्यसिद्धि यन्त्र के नीचे रख दें और उसे नियमित रूप से गुलाब की पांच अगरबत्तियां दिखाएं व 21 बार अपनी मनोकामना कहें। फिर अगरबत्तियां मुख्य द्वार पर लगा दें। यह सारी क्रिया श्रद्धापूर्वक करें, मनोकामना पूरी होगी।

घर में झगड़े, कलह शांति के लिए -----
घर में झगड़े, कलह आदि होते हों तो महीने में एक बार दस किलो आटा व पांच किलो सरसों का तेल अनाथ आश्रम, साधु आश्रम, वृद्धाश्रम, अंधालय को दान दें। वातावरण अनुकूल होगा और कलह का नामोनिशान नहीं होगा।