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Thursday, February 14, 2019

वास्तुशास्त्र में ईशान कोण

वास्तुशास्त्र में ईशान कोण का काफी महत्व है। इसे भगवान शंकर का दिशा जोन भी कहा जाता है। इस दिशा जोन को मानसिक स्पष्टता, निर्णय लेने की क्षमता और पूजा स्थल के नाम से भी हम जानते हैं। मस्तिष्क कैसे काम करता है और कैसे उसकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है, ये सब इसी दिशा में पर निर्धारित होता है। इस दिशा जोन का रंग नीला/काला होता है तथा यहां का तत्व मुख्यता जल है। हालांकि यहां पर अग्नि तत्व भी पूर्व की तरफ के हिस्से में प्रबलता से पाया जाता है।
इस देवता का है प्रमुख स्थान
वास्तु देवता यहां पर प्रमुखता से निवास करते हैं। राक्षसों की माता दिति का यहाँ पर मुख्य स्थान है। दिति ऋषि कश्यप की पत्नी थी। उत्तर दिशा के आठवें द्वार को दिति ही निर्धारित करती हैं। (हर दिशा में मुख्यता ८ द्वार होते हैं) बायीं आँख की सेहत और  दूरदृष्टि  यहीं  से निर्धारित होती है  तथा मन की द्विविद्ता (Duality) या द्वैतवाद यहीं पर दूर होते हैं। अगर घर में द्वार यहाँ पर हो तो महिलाओं का घर में वर्चस्व ज़्यादा होता है। दूसरे वास्तु देवता यहां पर शिखी हैं जिनका तत्त्व अग्नि है।  इसी को भगवा  शिव की तीसरी आँख भी कहा जाता है। यहां घर या भवन का पूर्व दिशा की और पहला द्वार भी होता है। मन के सब विचार, नए भाव तथा समझ यहीं पर पैदा होते हैं। यहां द्वार होने से घर में दुर्घटना अथवा आग लगने का ख़तरा रहता है।  

इन बातों का रखें विशेष ख्याल
इस दिशा जोन में कभी भी शौच, सेप्टिक टैंक्स, पानी की टंकी, सीढ़ियां, स्टोर, रसोई आदि का निर्माण नहीं करना चाहिए क्यूंकि इस से मानसिक परेशानी बढ़ती है तथा मस्तिष्क से सम्बंधित रोग होते हैं।  इनसे आपकी निर्णय लेने की क्षमता में रुकावट आती है तथा नकारात्मक सोच का निर्माण होता है। गृहणी के लिए तो ये ख़ास तौर से बहुत कष्टप्रद होता है। यहां की दीवारों पर लाल, गहरा लाल, गुलाबी तथा बैंगनी रंगो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

नहीं होनी चाहिये ये चीजें
उत्तर पूर्व दिशा चुंबकीय और सौर ऊर्जा का मिलान स्थल है इसलिए ये भगवान शंकर का भी स्थान है। इसलिए इस स्थान पर ये सरंचनाएं नहीं होने चाहिए —
•    स्टोर
•    सीढ़ियां
•    छत पर पानी की टाकी
•    शौचालय
•    रसोई
•    सीवर लाइन्स और नालियां
•    बिजली के भरी यंत्र, उपकरण और बिजली के बोर्ड्स
•    भारी  मशीनरी
•    भारी निर्माण

इन उपायों से मिलेगा शुभ फल
1. बच्चे इस दिशा की और देख कर पढ़ाई करें, इस से उन्हें लाभ होगा।
2.  नव वर-वधू को इस स्थान पर बने कमरे में कभी भी नहीं सोना चाहिए क्यों कि इस से वैवाहिक जीवन में बाधा पड़ती है तथा तलाक़ होने के खतरे बढ़ जाते हैं। 
3. गृहणियों को यहाँ पर गैस के नीचे पीले रंग का संगमरमर का पत्थर रखना चाहिए। 
4. इस स्थान पर हमेशा छोटा सा मंदिर बनाएं। 
5. इस दिशा जोन में कभी भी सीढ़ी, स्टोर या शौचालय न बनायें। इस से मस्तिष्क से सम्बंधित बीमारी होने की सम्भावना हो सकती है जैसे कि पैरालिसिस।
6.  इस दिशा जोन  में लाल, गुलाबी  और बैंगनी रंगो का दीवारों पर इस्तेमाल न करें।  इस रंग की वस्तुएं भी यहाँ से हटा कर दक्षिण पूर्व दिशा जोन में रख दें।  यहाँ पर ज़्यादा करके बिजली के उपकरण  भी न रखें।  इस दिशा जोन में हलके क्रीम कलर या नीले रंग का इस्तेमाल करें।

Tuesday, July 26, 2016

क्या वास्तु दोष के कारण होते हैं महिलाओं एवं पुरुषों के रोग..?

महिलाओं एवं पुरुषों के रोग..
क्या वास्तु दोष के कारण होते हैं महिलाओं एवं पुरुषों के रोग..????
आइये जाने की किन वास्तु दोष के कारण होते हैं महिलाओं एवं पुरुषों के रोग—
वास्तु शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ: समरांगण सूत्रधार, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश, नारद संहिता, बृहतसंहिता, वास्तु रत्नावली, भारतीय वास्तु शास्त्र, मुहूत्र्त मार्तंड आदि वास्तुज्ञान के भंडार हैं। अमरकोष हलायुध कोष के अनुसार वास्तुगृह निर्माण की वह कला है, जो ईशान आदि कोण से आरंभ होती है और घर को विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों और उपद्रवों से बचाती है।
ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा जी को संसार निर्माण के लिए नियुक्त किया था। इसका उद्देश्य था कि गृह स्वामी को भवन शुभफल दे, पुत्र, पौत्रादि, सुख, लक्ष्मी, धन और वैभव को बढ़ाने वाला हो।
वास्तु दोष से मुक्ति के लिए पंचतत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश चारों दिशाएं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा चारों कोण नैत्य, ईशान, वायव्य, अग्नि एवं ब्रह्म स्थान (केंद्र) को संतुलित करना आवश्यक है।
देखने में आ रहा है कि आजकल पुरूषों को पहले की तुलना में ज्यादा शारीरिक एवं मानसिक रोग हो रहे है। यह तय कि विज्ञान ने बहुत उन्नति की है। मेडिकल सांईस के कई अविष्कार मनुष्य के जटिल रोगों को दूर करने में सहायक हो रहे है। किंतु विज्ञान आधुनिक चिकित्सा की इतनी तरक्की के बाद भी मनुष्य के रोग घटने की बजाए, बढ़ते ही जा रहे है। आज नई-नई और असाध्य बीमारियां जन्म ले रही है प्रायः हर व्यक्ति किसी ना किसी रोग से पीडि़त है।
आधुनिक तकनीकों के कारण आजकल छोटे या बड़े भवनों की बनावट पहले के भवनों की तुलना में सुंदर व भव्य तो जरूर हो गई हैं, परंतु अब भवन आयताकार या चैकर न होकर अनियमित आकार के बनने लगे है। घरों की अनियमित आकार की बनावट के कारण ही उनमें वास्तुदोष उत्पन्न होते है। जो वहां रहने वालों को शारीरिक व मानसिक रोगी बनाने में अहम भूमिका निभाते है। यह एक अटल सत्य हे की वास्तु का रोगों से अभिन्न संबंध है।
किसी भी भवन में उत्तर पूर्वी भाग का संबंध जल तत्व से होता है अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से किसी भी मानव के शरीर में जल तत्व के असंतुलित होने से अनेक व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। अतः उत्तर पूर्व को जितना खुला एवं हल्का रखेंगे उतना ही अच्छा है इस दिशा में रसोई का निर्माण अशुभ है रसोई निर्माण करने पर उदर जनित रोगों का सामना करना पड़ता है परिवार के सदस्यों में तनाव बना रहता है इस दिशा में यदि भूमिगत जल भण्डारण की व्यवस्था हो तो घर में आने वाली जलापूर्ति की पाइप भी इसी दिशा में होना शुभ है।
भवन में ईशान कोण कटा हुआ नहीं होना चाहिए। कोण कटा होने से भवन में निवास करने वाले व्यक्ति रक्त विकार से ग्रस्त हो सकते है यौन रोगों में वृद्धि होती है प्रजनन क्षमता दुष्प्रभावित होती है। ईशान कोण में यदि उत्तर का स्थान अधिक ऊंचा है तो उस स्थान पर रहने वाली स्त्रियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ईशान के पूर्व का स्थान ऊंचा होने पर पुरुष दुष्प्रभावित होते हैं परिवार का कोई सदस्य बीमार हो तो उसे ईशान कोण में मुंह करके दवा का सेवन कराने से जल्दी स्वास्थ्य लाभ मिलता है। भवन के दक्षिण-पूर्व दिशा का संबंध अग्नि तत्व से होता है जिसे अग्नि कोण माना गया है। इस दिशा में रसोई का निर्माण करने से निवास करने वाले लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहता है अगर इस दिशा मंे जल भण्डारण या जल स्त्रोत की व्यवस्था की जाती है तो उदर रोग, आंत संबंधी रोग एवं पित्त विकार आदि बीमारियों की संभावना रहती है।
दक्षिण-पूर्वी दिशा में दक्षिण का स्थान अधिक बढ़ा हो तो परिवार की स्त्रियों को शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं। पूर्वी दिशा में दक्षिण का स्थान अधिक बढ़ा हो तो परिवार की स्त्रियों को शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं। पूर्व का स्थान बढ़ा हुआ होने से पुरुषों को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
दक्षिण-पश्चिम भाग का संबंध पृथ्वी तत्व से होता है अतः इसे ज्यादा खुला नहीं रखना चाहिए इस स्थान को हल्का व खुला रखने से अनेक प्रकार की शारीरिक बीमारियों एवं मानसिक व्याधियों का शिकार होना पड़ता है। निवास करने वाले सदस्यों में निराशा तनाव एवं क्रोध उत्पन्न रहता है अतः इस स्थान को सबसे भारी रखना श्रेष्ठकर है यह भाग भवन के अन्य भागों से कटा हुआ नहीं होना चाहिए वरना मधुमेय की बीमारी, ज्यादा सोचना अतिचेष्टा तथा अति जागरुकता जैसी व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
दक्षिण-पश्चिम में दक्षिण का भाग अधिक बढ़ा हुआ अथवा नीचा हो तो उसमें निवास करने वाली स्त्रियों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है पश्चिमी भाग अगर अधिक बढ़ा हुआ और अधिक नीचा हो तो पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः दक्षिण-पश्चिम के कोण को न तो बढ़ायें और न छोटा करें। इस स्थान को भवन में सबसे ज्यादा भारी रखना शुभ है।
भवन के उत्तर-पश्चिम भाग वायव्य कोण का संबंध वायु तत्व से होता है मानव के प्राणों का वायु से सीधा संबंध है अतः इस स्थान को खुला रखना शुभ है इस स्थान में भारी सामान नहीं रखना चाहिए एवं भारी निर्माण भी नहीं करवाना चाहिए। भारी निर्माण करवाने से वायु विकार तथा मानसिक रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इसके धरातल का उत्तर -पूर्व के अपेक्षा थोड़ा ऊंचा किंतु दक्षिण-पूर्व एवं दक्षिण-पश्चिम से कुछ नीचा होना शुभ है। भवन के इस भाग में ऊपर का स्थान अधिक बड़ा होने से परिवार की स्त्रियों को त्वचा संबंधी रोग जैसे एग्जिमा, एलर्जी आदि बीमारियों की संभावना रहती है।
यदि उत्तर की अपेक्षा यदि पश्चिम का स्थान अधिक बढ़ा हुआ हो तो पुरुषों को शारीरिक व्याधियां होने की संभावना रहती है। वास्तु शास्त्र में भवन के मध्य या केंद्र ब्रह्म स्थान को अति महत्वपूर्ण माना गया है। वास्तु में इसका वही महत्व है जो मानव शरीर में नाभि का होता है।
आकाश तत्व से संबंधित होने के कारण इस स्थान को खुला छोड़ना श्रेयस्कर होता है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार की गंदगी होने से निवास करने वाले प्राणियों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं इस स्थान पर विशेषकर शौचालय सीढ़ियां अथवा गटर, सैप्टिक टैंक आदि का निर्माण नहीं कराना चाहिए अन्यथा श्रवण दोष पैदा होते हैं एवं विकास कार्य प्रभावित होते हैं ब्रह्म स्थान खुला रखने से अनेक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
इन मुख्य वास्तु दोषी के कारन होते हैं पुरुषों एवं महिलाओं में रोग (बीमारियां)—-
आइये जानते हे (देखते है) कि वह कौन से ऐसे महत्वपूर्ण वास्तुदोष है जिसके कारण पुरूषों में विभिन्न प्रकार के रोग पैदा होते है जो कभी-कभी उनका जीवन भी लील लेते है।
——- यदि घर का नैऋत्य कोण (SW), विशेषतौर पर पश्चिम नैऋत्य (West of the South West) किसी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का टैंक, कुआ, बोरवेल, सैप्टिक टैंक इत्यादि हो तो वहां रहने वाले पुरूष सदस्य अक्सर रोगों से पीडि़त रहेगें और उन्हें मृत्यु-भय बना रहेगा।
—— अगर नैऋत्य कोण पर ऊँचाई पर हो, और दक्षिण और नैऋत्य के बीच में या नैऋत्य और पश्चिम के बीच में कुएं, गड्ढे या चैम्बर खोदे जायें या मोरी बनायी जाय तो उस घर का मालिक ऐसी बीमारी से पीडि़त हो जाएगा जिसका इलाज नहीं हो।
——–पूर्व दिशा में खाली जगह न हो और पश्चिम दिशा की ओर बरामदे को ढलाऊ बनाकर घर बना हो तो वहां रहने वालो को आंखों की बीमारी, लकवा आदि बीमारियां होती है।
——- दक्षिण दिशा की ओर घर का द्वार हो और पूर्व-उत्तर की हद तक निर्माण किया गया हो तथा पश्चिम में खाली जगह हो और प्लाट में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर ढलान हो, पश्चिम में भूमिगत पानी का स्रोत हो तो ऐसे घर का मालिक अल्पायु में ही भयंकर रोगों का शिकार होगा।
——– नैऋत्य (SW) या पश्चिम-नैऋत्य (West of the South West) में कम्पाऊण्ड वाल या घर का द्वार हो तो घर के लोग बदनामी, जेल, एक्सीडेंट या खुदकुशी के शिकार होंगे। हार्ट अटैक, आपरेशन, एक्सिडेन्ट, हत्या, लकवा अर्थात किसी भी प्रकार की असामयिक मृत्यु का शिकार होगें।
——– पूर्व, आग्नेय कोण, दक्षिण, पश्चिम, नैऋत्य कोण और वायव्य कोण, उत्तर और ईशान कोण से किसी भी प्रकार से नीचे हो तो घर के स्वामी की पत्नी का निधन हो जाएगा। उसे आर्थिक समस्याएं आएगी और अंत में उसकी जीवन यात्रा भी समाप्त हो जाएगी। वह लाईलाज बीमारी से पीडि़त होगा।
——- घर के पश्चिम नैऋत्य (West of the South West) मार्ग प्रहार हो तो घर के पुरूष उन्माद जैसे रोगों की शिकार होंगे। कहीं कहीं वे खुदकुशी भी कर सकते है।
——- जिस घर का पश्चिम नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ हो उस घर के पुरूषों को लम्बी बीमारियों या उनकी दर्दनाक मौत की संभावना बनती है।
—– बड़े आकार के वह बंगले जिसके पश्चिम भाग में कम्पाऊण्ड वाल के अंदर झोपडि़यां, कमरे, चबूतरे इत्यादि के फर्श गृहगर्भ के स्तर से नीचे हो तो बीमारी, बदनामी और धनहानि होती है।
——- पूर्व, आग्नेय और दक्षिण नीचे हो नैऋत्य, पश्चिम और वायव्य कोण उत्तर और ईशान से ऊँचे हों तो घर के मालिक की मृत्यु होगी, पुत्रों का नाश होगा।
——- दक्षिण के साथ मिलकर अगर नैऋत्य में बढ़ाव होता तो मालिक रोगों, प्राण-भय और अकाल मृत्यु के भय से परेशान रहेगा।
——किसी घर के आंगन से पानी नैऋत्य की ओर से बाहर बहकर जाता है तो उस घर में अनहोनी की संभावना रहती है।
——— ऊपर बताए गए वास्तु दोषों के साथ सभी या कुछ दोषों के होने के बाद भी कुछ खुशहाल परिवार देखने में आते है।
इसका कारण यह है कि जब घर का ईशान कोण कट जाता है या पूर्व व उत्तर की सड़कों के कारण उस स्थल का ईशान कोण कट गया हो, तो ऐसे में नैऋत्य में रहने वाले की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। परंतु ऐसे घरों में रहने वाले केवल पैसे को महत्व देते हुए अभिमान के कारण दूसरो की इज्जत करना, प्रेमपूर्वक व्यवहार रखना भूल जाते है। निश्चित ही हत्या करने वाले, हत्या और आत्महत्या के शिकार हुए लोग, दुर्घटनाओं में मरने वालों दीर्घव्याधिग्रस्तों के घरों की बनावट में यह दोष अवश्य होता है।
उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर कर पुरूषों को होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। वास्तुदोष होने पर उनका निराकरण केवल वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए और उसका एकमात्र तरीका घर की बनावट में वास्तुनुकुल परिवर्तन कर वास्तुदोषों को दूर किया जाए।
इन वास्तुदोषों का प्रभाव होता हैं महिलाओं के स्वास्थ्य पर —-
आजकल की महिलाओं का स्वास्थ्य चार-पांच दशक पहले की महिलाओं की तुलना में ज्यादा खराब रहने लगा है। रहन-सहन, खान-पान इत्यादि हर प्रकार की सावधानियां बरतने के बाद भी महिलाओं में रोग बढ़ते ही जा रहे है।
वास्तु का रोगों से अभिन्न संबंध है। आजकल बनने वाले घरों की बनावट में बहुत ज्यादा वास्तुदोष होते है। पिछले कुछ दशकों से आर्किटेक्ट मकानों को सुंदरता प्रदान करने के लिए अनियमित आकार के मकानों को महत्त्व देने लगे है। जिस कारण मकान बनाते समय जाने-अनजाने वास्तु सिद्धांतों की अवहेलना होती रहती है।
चाहे महिला हो या पुरूष उनकी हर प्रकार की बीमारी में वास्तुदोष की भी अपनी एक महत्त्व भूमिका अवश्य रहती है। वास्तुदोष के कारण घर में सकारात्क और नकारात्क ऊर्जा के बीच असंतुलन पैदा हो जाता है। जो महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके जीवन पर भी प्रभाव डालता है। देखते है ऐसे कौन से वास्तु दोष है जो घर में ऊर्जा के असंतुलन का कारण बनते है।
———जिस घर का आगे का भाग टूटा हुआ, प्लास्टर उखड़ा हुआ या सामने की दीवार में दरार, टूटी फूटी या किसी प्रकार से भी खराब हो रही हो उस घर की मालकिन का स्वास्थ्य खराब रहता है उसे मानसिक अशान्ति रहती है और हमेशा अप्रसन्न उदास रहती हैं।
——— किसी घर का नैऋत्य कोण (SW), विशेषतौर पर दक्षिण नैऋत्य (South of the South West) किसी भी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का टैंक, कुआ, बोरवेल, सैप्टिक टैंक इत्यादि हो तो वहां रहने वाली महिलाएं सदस्य अक्सर रोगों से पीडि़त रहेगी और उन्हें मृत्यु-भय बना रहेगा।
———उत्तर (North) और ईशान (North east) ऊँचा हो और बाकी सभी दिशाए व कोण पूर्व (East), आग्नेय (South east), दक्षिण (South), पश्चिम (West), नैऋत्य (South west) और वायव्य (North west) नीचे हो तो घर की स्त्री को लाईलाज बीमारी होती है और असामयिक मृत्यु की संभावना प्रबल हो जाती है।
——-अगर उत्तर, ईशान और पूर्व से नैऋत्य और पश्चिम निचले हो तथा आग्नेय, दक्षिण और वायव्य ऊँचे हो तो जबरदस्त आर्थिक हानि होगी उस घर का मालिक कर्ज से परेशान होगा। उसकी पुत्री व पत्नी लम्बी बीमारियों से पीडि़त होगी।
——–उत्तर, ईशान और पूर्व से नैऋत्य, पश्चिम और वायव्य निचले, आग्नेय और दक्षिण ऊँचे होने पर उस घर के मालिक की पत्नी की या तो असामयिक मृत्यु हो जाएगी या वह लम्बी बीमारी से परेशान रहेगी। ऐसे बने घर में हमेशा बीमारी, कलह, शत्रुता बनी रहती है।
——-घर का आग्नेय नीचा हो, और आग्नेय और पूर्व के बीच में या आग्नेय और दक्षिण के बीच में कुओं, पानी का टैंक, सैप्टिक टैंक, बोरवेल या मोरियां बनायी जाएं तो घर के सदस्यों को दीर्घकालिन व्याधियां होंगी विशेषतौर पर घर के मालिक की पत्नी दीर्घ व्याधि से पीडि़त होगी।
—— ईशान कोण स्थित घर की उत्तर ईशान दिशा की लम्बाई घटे और उत्तरी हद तक निर्माण किया गया हो तो घर की मालकिन रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी अथवा आर्थिक कठिनाईयों से परेशान होकर कठिन जीवन व्यतीत करेगी।
——-घर के दक्षिण नैऋत्य (South of the South West) मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां उन्माद जैसे रोगों की शिकार होंगी। कहीं कहीं वे खुदकुशी भी कर सकती है।
——- दक्षिण नैऋत्य मार्गप्रहार से उस घर की नारियां भयंकर रोगों से पीडि़त होंगी। इसके साथ नैऋत्य में कुआं, बोरवेल, भूमिगत पानी की टंकी अर्थात् किसी भी प्रकार से नीचा हो तो वे आत्महत्या कर सकती है या लम्बी बीमारी से उनकी मृत्यु हो सकती है।
——– जिस घर का दक्षिण नैऋत्य कोण बढ़ा हुआ हो उस घर की स्त्रियों को लम्बी बीमारियों या उनकी दर्दनाक मौत की संभावना बनती है।
—उत्तर वायव्य में मार्ग प्रहार हो तो उस घर की स्त्रियां बीमार रहेगी। उत्तर वायव्य मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां न केवल बीमार होंगी, बल्कि घर वाले अनेक प्रकार के व्यसनों के शिकार होंगे।
–पूर्व दिशा में मुखद्वार हो और उत्तर दिशा की हद तक निर्माण किया हो, दक्षिण में खाली स्थल हो तथा नैऋत्य अगे्रत हो, तो उस घर की स्त्रियां दुर्घटनाग्रस्त होंगी।
—-दक्षिण में घर का मुख्यद्वार हो और ईशान कोण तक भवन निर्माण किया गया हो दक्षिण दिशा खुली हो और वहां ढलाऊ बरामदा बनाया जाये तो ऐसे घर की मालकिन लाइलाज बीमारी से परेशान रहेगी। उस घर के बच्चे भी गलत रास्तों पर चलेंगे।
——घर के दक्षिण दिशा में अहाते का होना या खुला होना या सभी कमरों व बरामदों में दक्षिण का भाग नीचा हो तो उस घर की स्त्रियां सदैव रोगी रहती है, ऐसे घरों में अकाल मृत्यु की संभावना रहती है। परिवार में आर्थिक कष्ट रहता है।
——किसी घर के आंगन से पानी दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण की ओर से बाहर बह जाता तो उस घर की स्त्रियों के स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं होता है।
उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर कर महिलाओं को होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। वास्तुदोष होने पर उनका निराकरण केवल वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए और उसका एकमात्र तरीका घर की बनावट में वास्तुनुकुल परिवर्तन कर वास्तुदोषों को दूर किया जाए।
विकास नागपाल
सुकृति एस्ट्रो वास्तु रिसर्च सेंटर
करनाल।
9215588984
01844033984

Friday, October 3, 2014

वास्तुदेव की विशेषताए

वास्तुदेव की विशेषताएँ

वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं  : -
चर वास्तु  : इसमें वास्तु पुरुष की  नजर या रुख  भाद्रपद ( अगस्त, सितम्बर ), आश्विन तथा कार्तिक ( अक्टूबर , नवम्बर ) महीनों के अवधि में दक्षिण की ओर  होता है |  तथा  मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसंबर ), पौष ( दिसंबर – जनवरी ), और माघ (जनवरी-फरवरी ) महीनों में पश्चिम की ओर होता है | फाल्गुन (फरवरी – मार्च ), चैत्र (मार्च – अप्रैल ), और  वैशाख (अप्रैल – मई ) महीनों में उत्तर की ओर होता है | ज्येष्ठ (मई – जून ), आषाढ़ (जून – जुलाई ), तथा  श्रावण (जुलाई – अगस्त ) महीनों की अवधि में पूर्व की ओर होता है | निर्माण कार्य का आरम्भ  या शिलान्यास  और मुख्य द्वार की स्थापना  ऐसे स्थान पर होनी चाहिए जो वास्तुपुरुष की दृष्टी  या नजर की ओर हो , ताकि मनुष्य उस मकान में शान्ति और सुख से रह सके |

स्थिर वास्तु :  वास्तु पुरुष का सिर सदैव उत्तर-पूर्व की ओर  तथा पैर दक्षिण – पश्चिम की ओर , दाहिना हाथ उत्तर-पश्चिम की ओर  एवं बांया  हाथ दक्षिण – पूर्व की ओर रहता है  इस बात को ध्यान में रखते हुए मकान का डिजाइन एवं प्लान  बनाना चाहिए |

नित्य वास्तु : प्रत्येक दिन वास्तु पुरुष की नजर  सुबह प्रथम  तीन घंटे  पूर्व की ओर , इसके पश्चात तीन घंटे दक्षिण  की ओर  तथा उसके बाद तीन घंटे पश्चिम की ओर तथा अंतिम तीन घंटे उत्तर की ओर दृष्टी अथवा नजर रहती है | भवन का निर्माण कार्य इसी प्रकार समयानुसार करना  चाहिए | वास्तु पुरुष की तीन अवसरों पर पूजा अर्चना करनी चाहिये  निर्माण कार्य में  शिलान्यास  करते समय , दूसरी बार  मुख्य द्ववार लगाते  समय , तीसरी बार  गृह प्रवेश के समय पूजा करनी चाहिये | गृह प्रवेश उस समय होना चाहिये जब वास्तुपुरुष की नजर उस ओर हो  ये शुभ रहता है ।

सुकृति एस्ट्रो वास्तु करनाल
मोबाइल 8607627999

Sunday, November 3, 2013

घर के मुख्यद्वार के सामने पेड़ हो तो

वास्तु और फेंगशुई के अनुसार घर में छोटे-छोटे और कुछ विशेष पेड़ पौधों को लगाना अच्छा माना जाता है तुलसी और बेंबु, मनीप्लांट, अपराजिता, जैसे कई पौधे हैं जिन्हे घर में लगाना बहुत शुभ माना जाता है लेकिन आज हम बात कर रहे हैं उन पेड़ो या पौधो का घर के सामने होना अच्छा नहीं माना जाता है।

- कई बंगलों में मुख्य द्वार के सामने कैक्टस के छोट पौधे लगा देते हैं, चाँदनी बेल या मनीप्लांट लगा देते हैं, जिससे मुख्य द्वार में अवरोध पैदा हो जाता है। इस प्रकार के घर में भी बाधा का कारण बनता है।

- मुख्य द्वार के सामने तीखे या अंदर की ओर कोई नुकीली चीज हो तो वहाँ रहने वालों को कोई न कोई बाधा आती रहेगी। इसी प्रकार यदि घर के सामने बिजली का खंभा या ट्रांसफार्मर लगा हो तो आपके यहाँ अच्छी ऊर्जा आने के बजाय निगेटिव ऊर्जा आएगी, जिसके कारण उस घर में रहने वाले लोगों को मानसिक तनाव होगा। उनका स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रहेगा।

- पूर्व में पीपल का पेड़ नहीं होना चाहिए। अकारण भय व धन की हानि होती है।

- आग्नेय में अनार का पेड़ अति शुभ परिणाम देने वाला होता है। दक्षिण में गुलर का पेड़ शुभ रहेगा। नैऋत्य में इमली शुभ रहती है।

- दक्षिण नैऋत्य में जामुन और कदंब का पेड़ शुभ रहता है। उत्तर में पाकड़ का पेड़ लगाना ठीक रहेगा।

- ईशान में आँवला का पेड़ अति फलदायी रहता है। ईशान-पूर्व में आम का पेड़ शुभ रहता है। इस प्रकार हम पेड़ लगाकर शुभाशुभ फल प्राप्त कर सकते हैं।

- मुख्य द्वार के सामने कोई रास्ता द्वार की ओर जा रहा हो तब भी बाधा का कारण बनता है। ग्रह स्वामी की अकाल मृत्यु हो सकती है। घर के सामने वृक्ष बड़ा रहे तो वहाँ रहने वालों की प्रगति में बाधा का कारण बनता है। यदि उस वृक्ष की छाँव घर पर पड़ती हो तो नुकसानप्रद रहता है। जबकि उसकी छाया कहीं से भी मकान पर नहीं पड़ती हो तो हानि नहीं होगी।

-कई जगह बंगलों में या घरों के सामने लंबे अशोक वृक्ष लगा दिए जाते हैं, जिससे घर में आड़ सी हो जाती है। यहाँ भी घर में रहने वालों की प्रगति के मार्ग में बाधा का कारण बनता है। जहाँ तक हो सके मुख्य द्वार को बाधा से रहित ही रखना चाहिए।

Sunday, August 25, 2013

वास्तु व जीवन में महत्वपूर्ण, बाँसुरी

वास्तु व जीवन में महत्वपूर्ण, बाँसुरी


बाँसुरी को शान्ति, शुभता एवं स्थिरता का प्रतीक
माना जाता है. यह उन्नति, प्रगति एवं सकारात्मक
गुणों की वृद्धि की सूचक भी होती है. फेगशुई और हमारे
शास्त्रों में शुभ वस्तुओं में बाँसुरी का अत्यधिक महत्व है.
फेंगशुई
बाँसुरी के उपायों का महत्व इसलिए भी अधिक है,
क्योंकि वास्तु शास्त्र में जहां कहीं किसी दोष से
पूर्णतः मुक्ति के लिए अशुभ निर्माण कार्य
को तोड़ना आवश्यक होता है, वहीं फेंगशुई में अशुभ निर्माण
को तोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होती है. अपितु पैगोडा,
बाँसुरी आदि सकरात्मक वस्तुओं का प्रयोग कर के उस दोष से
मुक्ति पा लेते है.
बाँसुरी का निर्माण बाँस के ताने से होता है.
सभी वनस्पतियों में बाँस सबसे तेज गति से बढ़ने
वाला पौधा होता है.इसी कारण से यह विकास का प्रतीक
है.और किसी भी वातावरण में यह अपना अस्तित्व बनाए
रखने की क्षमता इसमें होती है. यदि किसी भी दूकान
या व्यवसाय स्थल पर इसके पौधे को लगाया जाए तो जैसे
बाँस के पौधे की वृद्धि तेज गति से होगी, वैसे ही उस दूकान
या व्यवसाय स्थल के मालिक की भी प्रगति होगी. बाँस के
पौधे के ये सभी गुण बाँसुरी में भी विद्यमान होते है.
बाँसुरी का उपयोग न केवल फेंगशुई में, वरन वास्तु शास्त्र
एवं ग्रह दोष निवारण में बहुत ही उपयोगी है. वास्तु में बीम
संबंधी दोष, द्वार वेध, वृक्ष वेध, वीथी वेध
आदि सभी वेधो के निराकरण में और अशुभ निर्माण
संबंधी वास्तु दोषों में बाँसुरी का प्रयोग होता है. ग्रह
दोषों के अंतर्गत शनि, राहू आदि पाप ग्रहों से सम्बन्धित
दोषों के निवारण में बाँसुरी का कोई विपरीत प्रभाव
नहीं होता है.
लेकिन बाँसुरी के प्रयोग में एक सावधानी अवश्य
रखनी चाहिए वह यह है कि, जहां कहीं भी इसे लगाया जाए,
वहां इसे बिलकुल सीधा नहीं लगा कर
थोड़ा तिरछा लगाना चाहिए तथा इसका मुंह नीचे की तरफ
होना चाहिए.
जापान, चीन, हांगकांग, मलेशिया और मध्य एशिया में
इसका प्रयोग बहुतायत में किया जाता है. यदि किसी के
विकास में अनेक प्रयास करने के बाद भी बाधाए उत्पन्न
हो रही हो तो इस बाँसुरी का प्रयोग अवश्य
ही करना चाहिए.वैसे तो ”बाँसुरी एक फायदे अनेक है”. लेकिन
यहां मै इस लेख मेंबाँसुरी के आसान और अचूक रामबाण उपाय
दे रहा हूं जो कि पग पग पर हमारे लिए सहायक बनते है, और
हमारी समस्याओं का पूर्ण रूप से समाधान करते है.
१:- बाँसुरी बाँस के पौधे से निर्मित होने के कारण शीघ्र
उन्नतिदायक प्रभाव रखती है अतः जिन व्यक्तियों को जीवन
में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही हो,
अथवा शिक्षा, व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो,
तो उसे अपने बैडरूम के दरवाजे पर
दो बाँसुरियों को लगाना चाहिए.
२:- यदि घर में बहुत ही अधिक वास्तु दोष है, या दो या तीन
दरवाजे एक सीध में है, तो घर के मुख्यद्वार के ऊपर
दो बाँसुरी लगाने से लाभ मिलता है तथा वास्तु दोष धीरे धीरे
समाप्त होने लगता है.
३:- यदि आप आध्यात्मिक रूप से उन्नति चाहते है, या फिर
किसी प्रकार की साधना में सफलता चाहते है तो, अपने
पूजा घर के दरवाजे पर भी बाँसुरिया लगाए. शीघ्र
ही सफलता प्राप्त होगी.
४:- बैडरूम में पलंग के ऊपर अथवा डाइनिंग टेबल के ऊपर
बीम हो तो, इसका अत्यंत खराब प्रभाव पड़ता है. इस दोष
को दूर करने के लिए बीम के दोनों ओर एक एक बाँसुरी लाल
फीते में बाँध कर लगानी चाहिए. साथ ही यह भी ध्यान रखे
कि बाँसुरी को लगाते समय बाँसुरी का मुंह नीचे की ओर
होना चाहिए.
५:- यदि बाँसुरी को घर के मुख हाल में या प्रवेश द्वार पर
तलवार की तरह “क्रास” के रूप में लगाया जाए,
तो आकस्मिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है.
६:- घर के सदस्य यदि बीमार अधिक हों अथवा अकाल मृत्यु
का भय या अन्य कोई स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्या हो,
तो प्रत्येक कमरें के बाहर और बीमार व्यक्ति के सिरहाने
बाँसुरी का प्रयोग करना चाहिए इससे अति शीघ्र लाभ
प्राप्त होने लगेगा.
७:- यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में शनि सातवें भाव
में अशुभ स्थिति में होकर विवाह में देर करवा रहे हो,
अथवा शनि की साढ़ेसती या ढैया चल रही हो, तो एक
बाँसुरी में चीनी या बूरा भरकर किसी निर्जन स्थान में
दबा देना लाभदायक होता है इससे इस दोष से
मुक्ति मिलती है.
८:- यदि मानसिक चिंता अधिक तेहती हो अथवा पति-
पत्नी दोनों के बीच झगड़ा रहता हो, तो सोते समय सिरहाने
के नीचे बाँसुरी रखनी चाहिए.
९:- यदि आप एक बाँसुरी को गुरु-पुष्य योग में शुभ मुहूर्त में
पूजन कर के अपने गल्ले में स्थापित करते है तो इसके कारण
आपके कार्य-व्यवसाय में बढोत्तरी होगी, और धन आगमन
के अवसर प्राप्त होंगे.
१०:- पाश्चात्य देशो में इसे घरों में तलवार की तरह से
भी लटकाया जाता है.इसके प्रभाव स्वरुप अनिष्ट एवं अशुभ
आत्माओं एवं बुरे व्यक्तियों से घर की रक्षा होती है.
११:- घर और अपने परिवार की सुख समृधि और सुरक्षा के
लिए एक बाँसुरी लेकर श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन रात
बारह बजे के बाद भगवान श्री कृष्ण के हाथों में सुसज्जित
कर दे तो इसके प्रभाव से पूरे वर्ष आपकी और आपके परिवार
की रक्षा तो होगी ही तथा सभी कष्ट व बाधाए भी दूर
होती जायेगी.
बाँसुरी के संबंध में एक धार्मिक मान्यता है कि जब
बाँसुरी को हाथ में लेकर हिलाया जाता है, तो बुरी आत्माएं
दूर हो जाति है. और जब इसे बजाया जाता है,
तो ऐसी मान्यता है कि घरों में शुभ चुम्बकीय प्रवाह
का प्रवेश होता है.
इस प्रकार बाँसुरी प्रकृति का एक अनुपम वरदान है.
यदि सोच समझ कर इसका उपयोग किया जाए तो वास्तु
दोषों का बिना किसी तोड़ फोड के निवारण कर अशुभ फलो से
बचा जा सकता है. जहां रत्न धारण, रुद्राक्ष, यंत्र, हवन,
आदि श्रमसाध्य और खर्चीले उपाय है,
वहीं बाँसुरी का प्रयोग सस्ता, सुगम और प्रभावी होता है.
अपनी आवश्यकता के अनुसार इसका प्रयोग करके लाभ
उठाया जा सकता है

बच्चों के कक्ष की आंतरिक सुसज्जा

बच्चों के कक्ष की आंतरिक सुसज्जा


बच्चों का कक्ष हमेशा पश्चिम, उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए। बच्चों के कक्ष की आंतरिक सुसज्जा बालक घर की मात्र रौनक ही नहीं, अपितु पुरे घर की शक्ति और उमंग का स्रोत है। बच्चों के बिना घर आत्माविहीन हो जाता है। बच्चे घर को उल्लासमय जीवन से सींचते हैं। अत: उनके पालन के लिए एक संतुलित वास्तुसम्मत वातावरण का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। 

यह संतुलन उनके लिए सही स्थान की व्यवस्था प्रदान करने से लेकर प्रेम और उल्लास के वातावरण का निर्माण करने तक मददगार सिद्ध हो सकता है। :------बच्चों के कमरे का प्रवेश द्वार उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए। खिड़की अथवा रोशनदान पूर्व में रखना उत्तम है। पढ़ने की टेबल का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पुस्तकें ईशान कोण में रखी जा सकती हैं।बच्चों का मुख पढ़ते समय उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए।एक छोटा-सा पूजास्थल अथवा मंदिर बच्चों के कमरे की ईशान दिशा में बनाना उत्तम है। इस स्थान में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की मूर्ति अथवा तस्वीर लगाना शुभ है।

कमरे का ईशान कोण का क्षेत्र सदैव स्वच्छ रहना चाहिए और वहां पर किसी भी प्रकार का व्यर्थ का सामान, कूड़ा, कबाड़ा नहीं होना चाहिए।

अलमारी, कपबोर्ड़, पढ़ने का डेस्क और बुक शेल्फ व्यवस्थित ढंग से रखा जाना चाहिए। सोने का बिस्तर नैऋत्य कोण में होना चाहिए। सोते समय सिरदक्षिण दिशा में हो तो उत्तम है, परंतु बालक अपना सिर पूर्व दिशा में भी रख कर सो सकते हैं।
कमरे के मध्य में भारी सामान न रखें।
कमरे में हरे रंग के हलके शेड्स करवाना उत्तम है, इससे बच्चों में बुद्धिमता की वृद्धि होती है।
कमरे के मध्य का स्थान बच्चों के खेलने के लिए खाली रखें।

बच्चों के कमरे का द्वार कदापि भी सीढ़ियों के अथवा शौचालय के सम्मुख न हो, अन्यथा ऐसे परिवार के 

बच्चे मां-बाप के नियमानुसार अनुसरण नहीं करेंगे।
बच्चों के कक्ष के ईशान कोण और ब्रह्म स्थान की ओर भी विशेष ध्यान दें कि वहां पर बेवजह का सामरन एकत्रित न हो।
यह क्षेत्र सदैव स्वच्छ और बेकार के सामान से मुक्त होना चाहिए।

वास्तु दोष को दूर करने के लिए विशेष उपाय


वास्तु दोष को दूर करने के लिए किसी विशेष उपाय की आवश्यकता नहीं है ...
यदि हम अगर अपनी दैनिक दिनचर्या में इन उपायों को शामिल कर लें, तो बहुत सी समस्यायों को
इन छोटी-छोटी मगर अत्यधिक प्रभावशाली उपायों से दूर कर सकतें हैं ......

1- सूर्यास्त व सूर्योदय होने से पहले मुख्य प्रवेश द्वार की साफ-सफाई हो जानी चाहिए।
2- सायंकाल होते ही यहां पर उचित रोशनी का प्रबंध होना भी जरूरी हैं।

3- दरवाजा खोलते व बंद करते समय किसी प्रकार की आवाज नहीं आना चाहिए,
4- बरामदे और बालकनी के ठीक सामने भी प्रवेश द्वार का होना अशुभ होता हैं.

5- प्रवेश द्वार पर गणेश व गज लक्ष्मी के चित्र लगाने से सौभाग्य व सुख में निरंतर वृद्धि होती है,

6- पूरब व उत्तर दिशा में अधिक स्थान छोड़ना चाहिए

7- मांगलिक कार्यो व शुभ अवसरों पर प्रवेश द्वार को आम के पत्ते व हल्दी तथा चंदन जैसे शुभ व
कल्याणकारी वनस्पतियों से सजाना शुभ होता है.

8- प्रवेश द्वार को सदैव स्वच्छ रखना चाहिए,
9- किसी प्रकार का कूड़ा या बेकार सामान प्रवेश द्वार के सामने कभी न रखे,
10- प्रातः व सायंकाल कुछ समय के लिए दरवाजा खुला रखना चाहिए.
11- सांय काल घर की दहलीज़ पर दीपक अवश्य जलाएं इससे घर का पित्र दोष भी समाप्त होता है
एवं नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश नहीं हो पाता .
12- बैठक के कमरे में द्वार के सामने की दीवार पर दो सूरजमुखी के या ट्यूलिप के फूलों का चित्र
लगाएं.

13- घर के बाहर के बगीचे में दक्षिण-पश्चिम के कोने को सदैव रोशन रखें.

14- घर के अंदर दरवाजे के सामने कचरे का ‍डिब्बा न रखें.

15- घर के किसी भी कोने में अथवा मध्य में जूते-चप्पल (मृत चर्म) न रखेंजूतों के रखने का स्थान
घर के प्रमुख व्यक्ति के कद का एक चौथाई हो, उदाहरण के तौर पर 6 फुट के व्यक्ति (घर का प्रमुख) के
घर में जूते-चप्पल रखने का स्थल डेढ़ फुट से ऊंचा न हो....

Saturday, June 8, 2013

ऐसे स्थान जहां मकान बनाने से होता है नुकसान


हर व्यक्ति का सपना होता है अपना घर। महंगाई के इस जमाने में एक आम आदमी को अपना घर बसाने के लिए जीवन भर की जमा पूंजी लगानी पड़ती है। इसलिए जरूरी है कि घर ऐसे स्थान पर हो जहां आप अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिताएं।

वास्तुविज्ञान में कहा गया है कि जहां दक्षिण दिशा ढाल वाली हो उस स्थान पर घर बनाने से स्त्रियों को कष्ट होता है। इसी तरह वास्तु में कई अन्य स्थानों का भी उल्लेख किया गया है जिसका वर्णन भविष्य पुराण में भी मिलता है।

भविष्य पुराण के अनुसार घर ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां की भूमि की ढाल पूर्व या उत्तर की ओर हो। मंदिर पूजनीय और पवित्र स्थान होता है लेकिन इसके आस-पास का स्थान गृहस्थों के निवास के लिए नहीं होता है।

इसका कारण संभवतः यह हो सकता है कि मंदिर की घंटी, मंत्र और शंख की ध्वनि भक्ति की भावना को अधिक उभारता है जिससे गृहस्थी से मन उचाट हो सकता है। घर पर मंदिर की छाया का पड़ना उन्नति में बाधक होता है।

जिस स्थान पर मांस-मदिरा बेचा जाता हो, जुआ खेलने वाले लोग आते हों ऐसे स्थान पर भी घर नहीं बसाना चाहिए। इससे घर में रहने वालों को मान-सम्मान का खतरा रहता है।

घर में रहने वालों पर नकारात्मक सोच हावी रहता है जिससे व्यक्तित्व के विकास में बाधा आती है। नगर का द्वार, चौक-चौराहे, राजकर्मचारी के निवास स्थान एवं राजमार्ग के आस-पास भी घर नहीं बसाना चाहिए।

घर बसाने के लिए उचित स्थान
  • भविष्य पुराण कहता है कि गृहस्थों को ऐसे स्थान पर घर बसाना चाहिए जहां बुद्घिजीवी और विद्वान लोग रहते हों।
  • जहां आवागमन के लिए साफ और सुव्यवस्थित रास्ते बनें हों।
  • जहां घर बसाने जा रहे हों वहां के लोगों के व्यवहार के विषय में पहले जान लें। जहां के लोग व्यवहारिक हों, समय-समय पर एक दूसरे का साथ दें, वहां पर घर बसाएं।
  • दुष्ट विचार रखने वालों के आस-पास घर नहीं बसाना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अधिक धनवान एवं अपने से कम आय वालों के बीच बसना भी उचित नहीं होता है।
  • भविष्य पुराण कहता है कि पड़ोसियों के बारे में जानने के बाद ज़मीन की पूरी जानकारी कर लें कि, इस पर कोई विवाद तो नहीं है।
  • पड़ोसियों को हमेशा मित्र बनाए रखने की कोशिश करें।

इन वास्तुदोष के कारण घरों में होती है चोरियां

किसी घर में चोरी क्यों होती है? सुरक्षा की कमी और मालिक की लापरवाही। लेकिन आप यकीन नहीं करेंगे कि वास्तुदोष भी किसी घर में चोरी कराने में अहम भूमिका निभाता है। घर में उत्पन्न वास्तुदोष चोरी के लिए जिम्मेदार होता है।

चोरी और डकैती की घटना को वास्तु काफी हद तक प्रभावित करते हैं। जिन घरों में वास्तु संबंधी दोष होता है आमतौर पर उन घरों में इस तरह की घटनाएं घटित होती हैं।

वास्तुशास्त्र के नियमानुसार जिनके घर का मुख्य दरवाजा पूर्व आग्नेय यानी पूर्व दिशा के अंतिम भाग में दक्षिण की ओर होता है उस घर में चोरी की आशंका प्रबल रहती है। ऐसे घर में कलह एवं अग्नि संबंधी दुर्घटनाएं भी होती हैं।

अगर घर का मुख्य दरवाजा बाहर की ओर झुका है तो उसे जल्दी ठीक करवा लेना चाहिए। इससे घर का मालिक अक्सर घर से बाहर रहता है और घर में चोरी की आशंका रहती है। पूर्व और दक्षिण भाग घर एवं आंगन से नीचा है तो उसे ऊंचा करने की व्यवस्था कर लें क्योंकि घर का यह वास्तुदोष आपकी जमा पूंजी चोरी करवा सकता है। इस वास्तुदोष से शत्रुओं के कारण भी नुकसान होता है।

उत्तर की अपेक्षा पश्चिम भाग अधिक बढ़ा हुआ होना दोषपूर्ण माना जाता है। इस स्थिति में विरोधियों की संख्या बढ़ती और घर में चोरी की घटनाएं होती हैं। पूर्व एवं उत्तर दिशा में मुख्य द्वार तिरछा नहीं होना चाहिए। इससे भी चोरी की आशंका बढ़ जाती है।

चोरी एवं दुर्घटना में कमी लाने के लिए हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि आग्नेय दिशा में ढलान नहीं हो। इस दिशा में गड्डे एवं बोरबेल, कुआं एवं पानी की टंकी नहीं हो। दक्षिण दिशा में उत्तर दिशा से अधिक सामान रखें, पश्चिम दिशा में पूर्व दिशा से कम खाली स्थान हो। चारदीवारी की दक्षिण नैऋत्य और पूर्व आग्नेय में मुख्य द्वार नहीं हो।

घर में ही कहीं मौजूद है आत्महत्या का कारण

जब कोई आत्महत्या करता है तो उसके भाग्य के साथ-साथ उसके घर के वास्तुदोष भी अहम भूमिका निभाते हैं।

जिस घर में आत्महत्या होती है उस घर में दो या दो से अधिक वास्तुदोष अवश्य होते हैं। जिनमें से एक घर के ईशान कोण (उत्तर पूर्व) में होता है और दूसरा दोष नैऋत्य कोण (दक्षिण पश्चिम) में होता है। इन दिशाओं में भूमिगत पानी की टंकी, कुआं, बोरवेल, बेसमेंट या किसी भी प्रकार से इस कोने का फर्श नीचा हो या घर के दक्षिण दिशा का दक्षिणी कोना या दक्षिण पश्चिम का दक्षिणी भाग का बढ़ा हुआ हो तो वास्तु बुरी तरह प्रभावित होता है।

इस दोष के साथ यदि घर के पश्चिम नैऋत्य कोण में मुख्य द्वार हो तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि मुख्य द्वार दक्षिण नैऋत्य कोण में हो तो उस घर की स्त्री द्वारा आत्महत्या करने की संभावना रहती है।

दूसरा वास्तुदोष घर के ईशान कोण में होता है। घर का यह कोना अंदर दब जाए, कट जाए, गोल हो जाए या किसी कारण दक्षिण पूर्व की दीवार पूर्व की ओर आगे बढ़ जाए तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि उत्तर पश्चिमी दीवार का का उत्तरी भाग आगे बढ़ा हुआ हो तो स्त्री सदस्य आत्महत्या कर सकती है।

घर के दक्षिण नैऋत्य में मार्ग प्रहार हो यानी इस दिशा में कोई रास्ता आकर मिल रहा हो तब स्त्रियां और पश्चिम नैऋत्य में कोई मार्ग आकर घर के द्वार के पास मिल रहा हो तब पुरूष इस प्रकार का कदम उठाते हैं।

जमीन के पूर्व आग्नेय कोण को किसी भी चीज से ढकना नहीं चाहिए अन्यथा पुरूषों में निराशा और आत्महत्या की भावना बलवती होती है जबकि वायव्य ढका हुआ हो तब स्त्रियां निराश होकर इस तरह के कदम उठाती हैं।

वास्तु के अनुसार इस तरह की घटना से बचने के लिए जरूरी है कि घर बनवाते समय वास्तु के इन दोषों को ध्यान में रखते हुए घर बनवाएं। अगर किराये पर घर ले रहे हैं तो ध्यान रखें कि घर में ऐसे वास्तुदोष न हो।

Sunday, March 24, 2013

स्नानगृह और शौचालय एक साथ होना ठीक नहीं

attach bathroom and toilet affect family disputeआज कल घरों में बाथरूम और टॉयलेट एक साथ होना आम बात है लेकिन वास्तुशास्त्र के नियम के अनुसार इससे घर में वास्तुदोष उत्पन्न होता है। इस दोष के कारण घर में रहने वालों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पति-पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों के बीच अक्सर मनमुटाव एवं वाद-विवाद की स्थिति बनी रहती है।

वास्तु शास्त्र के प्रमुख ग्रंथ विश्वकर्मा प्रकाश में बताया गया है कि ‘पूर्वम स्नान मंदिरम’ अर्थात भवन के पूर्व दिशा में स्नानगृह होना चाहिए। शौचालय की दिशा के विषय में विश्वकर्मा कहते हैं ‘या नैऋत्य मध्ये पुरीष त्याग मंदिरम’ अर्थात दक्षिण और नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा के मध्य में पुरीष यानी मल त्याग का स्थान होना चाहिए। बाथरूम और टॉयलेट एक दिशा में होने पर वास्तु का यह नियम भंग होता है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार स्नानगृह में चंद्रमा का वास है तथा शौचालय में राहू का। यदि किसी घर में स्नानगृह और शौचालय एक साथ हैं तो चंद्रमा और राहू एक साथ होने से चंद्रमा को राहू से ग्रहण लग जाता है, जिससे चंद्रमा दोषपूर्ण हो जाता है। चंद्रमा के दूषित होते ही कई प्रकार के दोष उत्पन्न होने लगते हैं। चंद्रमा मन और जल का कारक है और राहु विष का। इस युति से जल विष युक्त हो जाता है। जिसका प्रभाव पहले तो व्यक्ति के मन पर पड़ता है और दूसरा उसके शरीर पर।

शास्त्रों में चन्द्रमा को सोम अर्थात अमृत कहा गया है और राहु का विष। अमृत और विष एक साथ होना उसी प्रकार है जैसे अग्नि और जल। दोनों ही विपरीत तत्व हैं। इसलिए बाथरूम और टॉयलेट एक साथ होने पर परिवार में अलगाव होता है। लोगों में सहनशीलता की कमी आती है। मन में एक दूसरे के प्रति द्वेष की भावना बढ़ती है।

Sunday, January 6, 2013

घर की दीवार के सहारे न चढ़ाएं बेल और लताओं को

 creeper plantation according vastu अगर आप अपने घर को सजाने के लिए घर की दीवार के सहारे बेल और लताओं को चढ़ाते हैं तो, वास्तु विज्ञान के अनुसार आप अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करते हैं। वास्तु विज्ञान के अनुसार घर की दीवार के सहारे बेल और लताओं का चढ़ना बताता है कि आपके शत्रु धीरे-धीरे बलवान हो रहे हैं और आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं। बेल और लताओं को घर के मुख्य द्वार पर लगाना भी वास्तुशास्त्र के अनुसार शुभ फलदायी नहीं होता है।

मत्स्य पुराण में वास्तु विज्ञान एवं उसके प्रभाव का उल्लेख मिलता है। वास्तु विज्ञान बताया गया है कि बेल और लताओं पर शुक्र का प्रभाव होता है। इन्हें घर के दक्षिण पूर्व भाग में खाली स्थान में लगाना चाहिए। पेड़ या किसी अन्य चीज के सहारे इन्हें ऊपर चढ़ाया जा सकता है। इस दिशा में सुगंधित फूल भी लगाया जा सकता है क्योंकि इनका कारक ग्रह भी शुक्र होता है। आग्नेय दिशा यानी दक्षिण पूर्व में इन्हें लगना शुभ फलों की वृद्धि करता है। लताओं को भी मनी प्लांट की तरह उत्तर पूर्व में नहीं लगाना चाहिए।

वास्तु विज्ञान के नियम व्यवहारिकता पर आधारित हैं। व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो बेल और लताओं के सहारे विषैले जीव-जंतु घर में पहुंच कर घर में रहने वाले व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं। संभवतः इसलिए वास्तु विज्ञान में बेल और लताओं को दीवार के सहारे ऊपर चढ़ाना अशुभ बताया गया होगा।

Sunday, July 22, 2012

टोटका ही नहीं वास्‍तु दोष कम करने में भी इस्‍तेमाल होता है नींबू

Lemon Vastu Shastra Aid0191नींबू एक ऐसा वृक्ष, जो लगभग हर जगह आसानी से मिल जाता है। नींबू विटामिन सी का प्रमुख स्रोत है। यह अम्लीय होने पर भी पित्तनाशक होता है। अन्य फल पकने पर मीठे हो जाते हैं, परन्तु नींबू अपनी प्रत्येक अवस्था में अम्लीय ही रहता है। यह एक औषधीय फल है, जिसका प्रयोग अधिकतर लोग अपने भोजन को रूचिकर बनाने में करते है।
धार्मिक कार्यो के रूप में प्रायः नींबू का प्रयोग नजर दोष तथा किसी के द्वारा टोने-टोटके से बचाने के लिए भी किया जाता है। नींबू का विभिन्न प्रकार से प्रयोग करके बुरी नजर एंव बुरी हवाओं से बचा जा सकता है।
1- नींबू का पौधा घर में होने से बुरी हवायें घर में प्रवेश नहीं कर पाती है एंव वास्तु दोष का प्रभाव भी कम हो जाता है।
2- जब कभी किसी छोटे बच्चों को नजर लग जाती है तो, वह दूध उलटने लगता है और दूध पीना बन्द कर देता है, ऐसे में परिवार के लोग चिंतित और परेशान हो जाते है। ऐसी स्थिति में एक बेदाग नींबू लें और उसको बीच में आधा काट दें तथा कटे वाले भाग में थोड़े काले तिल के कुछ दाने दबा दें। और फिर उपर से काला धागा लपेट दें। अब उसी नींबू को बालक पर उल्टी तरफ से 7 बार उतारें। इसके पश्चात उसी नींबू को घर से दूर किसी निर्जन स्थान पर फेंक दें। इस उपाय से शीघ्र ही लाभ मिलेगा।
3- यदि एक स्वस्थ्य व्यक्ति अचानक अस्वस्थ्य हो जायें और उस पर चिकित्सा का प्रभाव नहीं हो रहा है तो समझना चाहिए कि उक्त व्यक्ति नजरदोष से ग्रसित है। ऐसी स्थिति में एक साबूत नींबू के उपर काली स्याही से 307 लिख दें और उस व्यक्ति के उपर उल्टी तरफ से 7 बार उतारें। इसके पश्चात उसी नींबू को चार भागों में इस प्रकार से काटें कि वह नीचें से जुड़े रहें। और फिर उसी नींबू को घर से बाहर किसी निर्जन स्थान पा फेंक दें। यह उपाय करने से पीडि़त व्यक्ति शीघ्र ही स्वस्थ्य हो जायेगा।
4- मोटापा दूर करने के लिए- प्रातः काल खाली पेट 250 मिली हल्के गर्म जल में एक नींबू का रस व दो चम्मच शहद मिलाकर नित्य सेवन करने से लाभ मिलेगा।
5- यदि किसी मनुष्य को रात में अक्सर डारवने सपने आते है, जिसके कारण वह डर जाता और ठीक से नींद नहीं आती है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की तकिये के नीचे एक हरा नींबू रख दें, और सूख जाने पर वह नींबू हटाकर दूसरा हरा नींबू रख दें। यह क्रिया लगातार 5 बार करने से दुःस्वपन आना बन्द हो जायेंगे और ठीक से नींद भी आने लगेगी।

वास्तु और रोग

वास्तु दोष और रोग( कारण एवं उपाय/निवारण)
वास्तुशास्त्रअर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, से पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो.

इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है.

यहाँ हम अपने पाठकों को जानकारी दे रहे हैं कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से पारिवारिक सदस्यों को किस तरह से नाना प्रकार के रोगों का सामना करना पड सकता है.
पूर्व दिशा में दोष:-
* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी.

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.
* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है.
* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है.
* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है.
* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं.
बचाव के उपाय:-
* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.
* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार परसूर्य यन्त्रस्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.
* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी.
पश्चिम दिशा में दोष:-
पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है. यह स्थान कालपुरूष का पेट, गुप्ताँग एवं प्रजनन अंग है.
* यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो परिवार में फेफडे, मुख, छाती और चमडी इत्यादि के रोगों का सामना करना पडता है.
* यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो पुरूष संतान की रोग बीमारी पर व्यर्थ धन का व्यय होता रहेगा.
* यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकर, बाहर जाए तो परिवार के पुरूष सदस्यों को लम्बी बीमारियों का शिकार होना पडेगा.
* यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो, तो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा.
* यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें जायें, तो गृहस्वामी के गुप्ताँग में अवश्य कोई बीमारी होगी.
* यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान हो, तो पारिवारिक सदस्यों को गर्मी, पित्त और फोडे-फिन्सी, मस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी.
बचाव के उपाय:-
* ऎसी स्थिति में पश्चिमी दिवार परवरूण यन्त्रस्थापित करें.
* परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करे.
* पश्चिम की दिवार को थोडा ऊँचा रखें और इस दिशा में ढाल रखें.
* पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें.
उत्तर दिशा में दोष-
उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरूष का ह्रदय स्थल माना जाता है. जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है.
* यदि उत्तर दिशा ऊँची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बीमारियाँ, थकावट, आलस, घुटने इत्यादि की बीमारियाँ बनी रहेंगीं.
* यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियों को रूग्णता का शिकार होना पडता है.
बचाव के उपाय :-
यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जाये, तो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय: स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा. रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पडेगा.
* इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल मेंबुध यन्त्रस्थापित करें.
* परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे.
* भवन के प्रवेशद्वार पर संगीतमय घंटियाँ लगायें.
* उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा(Parrot Green) रंग करवायें.
दक्षिण दिशा में दोष:-
दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है, जो कि कालपुरूष के बायें सीने, फेफडे और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है.
* यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआँ, दरार, कचरा, कूडादान, कोई पुराना सामान इत्यादि हो, तो गृहस्वामी को ह्रदय रोग, जोडों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आँखों की बीमारी, कोलेस्ट्राल बढ जाना अथवा हाजमे की खराबीजन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पडता है.
* दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊँचा चबूतरा बनाया गया हो, तो परिवार की स्त्रियों को घबराहट, बेचैनी, ब्लडप्रैशर, मूर्च्छाजन्य रोगों से पीडा का कष्ट भोगना पडता है.
* यदि दक्षिणी भाग नीचा हो, ओर उत्तर से अधिक रिक्त स्थान हो, तो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगें. उन्हे उच्चरक्तचाप, पाचनक्रिया की गडबडी, खून की कमी, अचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पडेगा. दक्षिण पिशाच का निवास है, इसलिए इस तरफ थोडी जगह खाली छोडकर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए.
* यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाए, तो ऎसा भवन दीर्घ व्याधियाँ एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है.
बचाव के उपाय:-
* यदि दक्षिणी भाग ऊँचा हो, तो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगें. इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें.
* घर के पूजनस्थल मेंश्री हनुमंतयन्त्रस्थापित करें.
* दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु कामंगलयन्त्रलगायें.
* प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूँड वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें.