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Friday, December 16, 2016

ज्योतिष विज्ञान में गंड मूल नक्षत्

ज्योतिष विज्ञान में गंड मूल नक्षत्र

27 नक्षत्रों में 6 नक्षत्र- अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, अश्विनी, मूल तथा रेवती नक्षत्रों को गंड मूल नक्षत्र के नाम से जाना जाता है। इन नक्षत्रों में जन्म होने पर 27 दिनों के पश्चात जब वही नक्षत्र आता है। तब मूल शांति करायी जाती है। ज्योतिष विज्ञान में मूल नक्षत्र में जन्मे बालक को पिता के लिये कष्टकारी बताया गया है। यदि शांति नहीं करायी जाय तो बच्‍चा बीमार रहता है, लेकिन प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते है। बालक का जन्म नक्षत्र के किस चरण में हुआ है यह जानना अतिआवश्यक है, क्योंकि उक्त नक्षत्रों के सभी चरण अशुभ नहीं होते है वरन शुभ व फलदायी भी होते हैं। यदि बालक का जन्म शुभ चरण में हुआ है तो बालक धन, पद, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य से परिपूर्ण होता है। 

नक्षत्रों के निम्न चरणों में भेद का फलः 

अश्विनी

प्रथम चरण - पिता को कष्ट तथा भय रहेगा

द्वितीय चरण - सुख सम्पत्ति में वृद्धि होगी

तृतीय चरण - राजकीय कार्यो में विजय तथा नौकरी में प्रगति होगी

चतुर्थ चरण - धन का लाभ तथा परिवार में कोई मांगलिक कार्य होगा

अश्लेषा

प्रथम चरण - शांति कराने से शुभ फल प्राप्त होगा

द्वितीय चरण - अचानक धन की हानि हो सकती है

तृतीय चरण - माता के लिये अनिष्टकारी रहेगा

चतुर्थ चरण - पिता के धन का अपव्यय होगा एंव बच्चों की शिक्षा में व्यवधान आयेगा

मघा 

प्रथम चरण - माता के लिये कष्टकारी रहेगा

द्वितीय चरण - पिता के लिये अनिष्टकारी रहेगा

तृतीय चरण - सुख व समृद्धि आयेगी

चतुर्थ चरण - परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी तथा भौतिक संसाधनों में वृद्धि होगी

ज्येष्ठा 

प्रथम चरण - बड़े भाई के लिये अनिष्टकारी रहेगा

द्वितीय चरण - छोटे भाई के लिये अशुभ प्रतीत होगा

तृतीय चरण - माता को मानसिक व शारीरिक पीड़ा रहेगी

चतुर्थ चरण - स्वंय को शारीरिक कष्ट रहेगा

मूल 

प्रथम चरण - पिता को शारीरिक कष्ट तथा धन की हानि होगी

द्वितीय चरण - माता को शारीरिक कष्ट रहेगा

तृतीय चरण - धन का व्यय तथा आपस में विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होगी

चतुर्थ चरण - शांति कराने से लाभ होगा

रेवती 

प्रथम चरण - राज्य से सम्मान तथा परिवार में धन का आगमन

द्वितीय चरण - परिवार में वैभव तथा प्रसन्नता रहेगी

तृतीय चरण - नौकरी व व्यवसाय में लाभ होगा। मन प्रसन्नचित्त रहेगा

चतुर्थ चरण - विविध प्रकार के कष्ट आ सकते हैं

मूल नक्षत्र 

मूल नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र के अन्तर्गत आता है। यह नक्षत्र बहुत ही अशुभ माना जाता है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु होता है। इस नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में होते हैं। इस नक्षत्र के विषय में यह धारणा है कि जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं उनके परिवार के सदस्यों को इसके दोष का सामना करना पड़ता है। दोष पर विशेष चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति में कई गुण होते हैं, हमें इन गुणों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 

ज्योतिषशास्त्र कहता है जो व्यक्ति मूल नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे ईमानदार होते हैं। इनमें ईश्वर के प्रति आस्था होती है। ये बुद्धिमान होते हैं। ये न्याय के प्रति विश्वास रखते हैं। लोगों के साथ मधुर सम्बन्ध रखते हैं और इनकी प्रकृति मिलनसार होती है। स्वास्थ्य के मामले में ये भाग्यशाली होते हैं, ये सेहतमंद होते हैं। ये मजबूत व दृढ़ विचारधारा के स्वामी होते हैं। ये सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं। ये अपने गुणों एवं कार्यो से काफी प्रसिद्धि हासिल करते हैं। 

मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति के कई मित्र होते हैं क्योंकि इनमें वफादारी होती है। ये पढ़ने लिखने में अच्छे होते हैं तथा दर्शन शास्त्र में इनकी विशेष रूचि होती है। इन्हें विद्वानों की श्रेणी में गिना जाता है। ये आदर्शवादी और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति होते हैं अगर इनके सामने ऐसी स्थिति आ जाए जब धन और सम्मान मे से एक को चुनना हो तब ये धन की जगह सम्मान को चुनना पसंद करते हैं। 

जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे व्यवसाय एवं नौकरी दोनों में ही सफल होते हैं, परंतु व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी करना इन्हें अधिक पसंद है। ये जहां भी होते हैं अपने क्षेत्र में सर्वोच्च होते हैं। ये शारीरिक श्रम की अपेक्षा बुद्धि का प्रयोग करना यानी बुद्धि से काम निकालना खूब जानते हैं। 

अध्यात्म में विशेष रूचि होने के कारण धन का लोभ इनके अंदर नहीं रहता। ये समाज में पीड़ित लोगों की सहायता के लिए कई कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लेते हैं। समाज में इनका काफी सम्मान होता है तथा ये प्रसिद्ध होते हैं। इनका सांसारिक जीवन खुशियों से भरा होता है। ये सुख सुविधाओं से युक्त जीवन जीने वाले होते हैं। समाज के उच्च वर्गों से इनकी मित्रता रहती है। 

ये ईश्वरीय सत्ता में हृदय से विश्वास रखते हैं। इस नक्षत्र के जातक को मूल शांति करा लेनी चाहिए, इससे उत्तमता में वृद्धि होती है और अशुभ प्रभाव में कमी आती है। 

Friday, October 10, 2014

दुर्भाग्य और परिहार

दुर्भाग्य और परिहार

कुछ लोगों के जीवन में शादी के बाद उथल पुथल शुरू हो जाती है | यदि शादी के बाद आप कुछ अच्छा अनुभव नहीं कर रहे हैं या भाग्य साथ नहीं दे रहा है तो जन्मकुंडली में इसके कारण का पता लगा कर इसका परिहार किया जा सकता है |
यदि शुक्र पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शादी के बाद भाग्य चमकने की बजाये दुर्भाग्य में भी बदल सकता है | ऐसी स्थिति में यह जानना आवश्यक है कि वह कौन सा ग्रह है जो शुक्र पर बुरा प्रभाव डाल रहा है | मैं एक एक करके सभी ग्रहों का वर्णन करता हूँ |
चन्द्र, बुध और गुरु से शुक्र को उतनी हानि नहीं होती इसलिए केवल उन्ही ग्रहों की चर्चा करूंगा जो शुक्र या विवाह के लिए बाधक बन सकते हैं |
इनमे सबसे ऊपर नाम आता है राहू का | राहू यदि भाग्य में अवरोध पैदा कर रहा हो तो बहुत ही चमत्कारी उपाय है | धर्म स्थान मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा आदि में जो थोड़ी बहुत गन्दी जगह दिखे वहां पर राहू का वास होता है | उस जगह पर झाड़ू लगाने से आप राहू को धर्म के स्थान से अलग कर सकते हैं | रोज न हो सके तो प्रत्येक शनिवार को यह उपाय करें | इसके अतिरिक्त किसी से स्टील का कोई बर्तन मुफ्त में न लें | यदि पहले लिया हो तो किसी तरह उसे वापस कर दें या उसकी कीमत दे दें |
शनि से शुक्र को उतना नुक्सान नहीं पहुँचता जितना सूर्य, मंगल और राहू से होता है | यदि शनि भाग्य में अवरोध का कारण हो तो किसी बुजुर्ग को कपडे भेंट करें | मंदिर / धर्मस्थान में पेठा दान करें | इसके अतिरिक्त एक और आजमाया हुआ उपाय है जो बहुत लाभदायक सिद्ध होता है | शुक्रवार के दिन स्टील का नया ताला खरीद लें और शनिवार की सुबह पांच बजे से पहले किसी धर्म स्थान में दान कर दें | ताले को बंद करके चाबी बीच में ही छोड़ दें और आते हुए पीछे मुड़कर न देखें |
मंगल यदि भाग्य में अवरोध पैदा कर रहा हो तो मंगलवार के दिन तंदूरी रोटी और खीर के साथ कद्दू की सब्जी का भोजन और कुछ पैसे किसी विकलांग व्यक्ति को दोपहर के समय दें | हर मंगलवार यह उपाय करें |
यदि सूर्य भाग्य में बाधक बन जाए तो आलस्य छोड़ दीजिये और सूर्योदय से पूर्व उठाना प्रारम्भ कर दीजिये | स्नानोपरांत ताम्बे के पात्र में जल भरकर थोडा दूध और केसर मिला कर यह जल सूर्यदेव को तब अर्पण कीजिये जब सूर्य उदय हो  रहा हो | केवल चालीस दिन में भाग्य में आ रहा अवरोध समाप्त हो जाएगा |

कौन और कैसा होगा आपका जीवन साथी


कौन और कैसा होगा आपका जीवन साथी


प्रेम व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से जागृत होता है | प्रेम ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अजनबी एक दुसरे के प्रति समर्पण को जान पाते हैं | दो व्यक्तियों के बीच पनपने वाले इस भाव का लक्ष्य शादी पर संपन्न हो जाए तो प्रेम को पूर्णता मिल जाती है |

प्रेम करने वाले युवक युवतियों से हर रोज मेरी बात होती है | प्रेम के विषय पर लोगों से मेरी चर्चा जब भी होती है कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है | यही मेरे ज्ञान का स्त्रोत है | कुछ सालों से मैंने लोगों से जितना सीखा है उतना ज्ञान किताबों से मिलना मुमकिन नहीं है | माँ सरस्वती का यह आशीर्वाद मेरे लिए दुर्लभ है |

माँ सरस्वती की कृपा से कुछ ऐसे तथ्य जो हाल ही में मैंने आप लोगों से ही सीखे हैं इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ |

प्रेम विवाह और जन्मकुंडली
जैसा कि वास्तविक जीवन में होता है | अनायास ही मुलाकात होती है और कोई अजनबी अपना लगने लगता है | जन्मकुंडली में भी कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो अनायास होने वाली घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं | हर अजनबी पर राहू की सत्ता है क्योंकि आप उसके विषय में कुछ नहीं जानते | राहू रहस्य के लिए जाना जाता है | इसलिए प्रेम को समझने के लिए राहू को समझना अत्यंत आवश्यक है |

मैंने देखा है जिस स्थान से राहू का सम्बन्ध हो उस स्थान से सम्बंधित काम अचानक ही होते हैं | प्रेम का भाव शुक्र से पनपता है | यदि आपका शुक्र अच्छा है तो आप प्रेम कर पायेंगे | प्रेम को समझने की आपमें शक्ति होती | प्रेम की अनुभूति आपके लिए नयी चीज नहीं होगी |

इस बात को थोड़ी और गहराई से समझते हैं | इस दुनिया में जितनी चमकदार चीजें हैं जिन्हें देखकर मन मोहित हो जाता है उन पर शुक्र का आधिपत्य है | मन को बहलाने के लिए या खुश होने के लिए या जिन कार्यों से ख़ुशी प्राप्त होती है उन सभी पर शुक्र का साम्राज्य है |

यदि आपका राहू अच्छा है तो अजनबी लोगों के दिल का हाल जानने की क्षमता आपमें होगी | आपका लगाया गया अनुमान गलत साबित नहीं होगा परन्तु यदि कुंडली में राहू खराब है तो आप किसी व्यक्ति को तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक काफी देर न हो चुकी हो |

शुक्र और राहू यदि दोनों अच्छे हैं तो प्रेम भी होगा और प्रेम विवाह भी होगा | आप अपने जीवन साथी विषय में अनुमान लगा पायेंगे कि वह इस समय सुख में है या दुःख में है | यही प्रेम है और यही प्रेम की पूर्णता है |

इस तरह शुक्र और राहू बहुत कुछ कहते हैं जिन्हें समझ पाने के लिए ज्ञान और अनुभव दोनों की आवश्यकता होगी |

किस से होगी शादी आपकी शादी 
यदि आपके माता पिता आपके लिए वर / वधु की तलाश कर रहे हैं और आपका मन कहीं और अटका है तो यह सवाल आपके मन में अवश्य आएगा | किन्ही दो व्यक्तियों की कुंडली देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह दोनों पति पत्नी बनेंगे या नहीं | इस सम्बन्ध में सटीक भविष्यवाणी करने के पीछे मेरे पास कुछ सिद्धांत हैं जिन्हें पढ़कर और समझकर आप भी शत प्रतिशत अनुमान लगा सकते हैं कि आपकी शादी किस से होने वाली है और किस से नहीं |

दो कुंडलियों में यदि समान लग्न, समान राशि, समान नवांश लग्न और समान नवमांश मिले तो चालीस प्रतिशत एक और लिख लें |

आपकी कुंडली के सातवें घर का स्वामी यदि आपके साथी की कुंडली में यदि नवांश लग्न में है या नवांश से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखता है तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें |

आपका शुक्र और आपके साथी का शुक्र किसी एक ही ग्रह की राशि में हैं तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें |

आपकी कुंडली का…
सप्तमेश और आपके जीवन साथी की कुंडली का सप्तमेश,
शुक्र और आपके जीवन साथी का शुक्र,
नवांश लग्नेश और जीवन साथी का नवांश लग्नेश,
लड़के का गुरु और लड़की का शुक्र,

यदि एक ही राशि में बैठे हों, एक दुसरे को देख रहे हों या एक ही ग्रह की राशि में हों तो यह संभावना साथ प्रतिशत बढ़ जाती है कि आपमें मेल होगा |

यदि आपकी कुंडली में सातवें घर में कोई वक्री ग्रह है और आपके साथी की कुंडली में भी कोई वक्री ग्रह सातवें घर में है तो आप दोनों के बीच शादी की संभावना सत्तर प्रतिशत होगी |

यदि लड़का और लड़की दोनों के सप्तमेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों

यदि लड़का और लड़की दोनों के लग्नेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों

यदि लड़का और लड़की दोनों के नवांश लग्नेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों

तो शादी की संभावना तीस प्रतिशत तक होती है |

ऊपर लिखे नियमों में से एक से अधिक नियम यदि मिल जाएँ तो परस्पर शादी संभव होती है |

इस तरह के और भी नियम हैं जो केवल तभी प्रकट होते हैं जब सामने कुंडली हो और जिन्हें बिना देखे व्यक्त नहीं किया जा सकता |
मनपसन्द व्यक्ति से शादी

हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसकी शादी उसकी पसंद के अनुसार हो | प्रस्तुत है कुछ ऐसे नियम जब आप की शादी मनचाहे जीवन साथी से होती है |

यदि सातवें घर में कोई ग्रह स्वराशी हो तो आप अपने जीवन साथी को पहली बार देखते ही पसंद करने लगेंगे | परन्तु कभी कभी केवल स्वराशी में होना पर्याप्त नहीं होता | फिर भी यह नियम सौ में से साठ लोगों पर लागू होगा |

मनपसंद व्यक्ति से शादी का मतलब यह नहीं की आपका जीवनसाथी अत्यंत सुन्दर हो अपितु कुछ लोगों की पसंद यह भी होती है कि जीवन साथी अच्छे स्वभाव वाला तथा प्रेम करने वाला हो | यदि आप स्त्री हैं और गुरु कुंडली के 1, 3, 7, 11वें घर में है तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि आपके पति से आपको प्रेम मिलेगा और आपके पति आपका ध्यान रखेंगे | परन्तु ऐसे गुरु पर यदि राहू, शनि का प्रभाव हो तो प्रेम तो मिलेगा परन्तु प्रेम के लिए तरसना भी पड़ेगा |

सातवें घर के स्वामी पर यदि गुरु, शुक्र, बुध और चन्द्र का प्रभाव हो तो भी आप उम्मीद कर सकते हैं कि आपके पति / पत्नी में बहुत से गुण ऐसे होंगे जो आपको पसंद हैं |

सातवें घर या सातवें घर के स्वामी पर शुक्र का प्रभाव होना ही इस बात के लिए काफी होता है कि जीवन साथी आकर्षक होगा |

आपकी कुंडली का नवमांश इस बात की पूरी जानकारी देता है कि आपका जीवनसाथी कैसा होगा | आपकी पसंद का होगा या आप उसे नापसंद करेंगे | समझदार होगा या लापरवाह | आपसे प्यार करेगा या आपसे दूर भागेगा | आदर्श जीवन साथी होगा नहीं |

बहरहाल कुंडली देखने के मेरे अपने नियम हैं मेरी अपनी विचारधारा है | हो सकता है कि मैंने अधिक ध्यान से यह लेख न लिखा हो या फिर आप मेरे विचारों से सहमत न हों | फिर भी मैं आपका आभारी रहूँगा यदि आप इस लेख के विषय में अपने विचार प्रकट करेंगे |

Sunday, September 21, 2014

लग्न के अनुसार मंत्र का जाप

लग्न के अनुसार मंत्र का जाप
इष्ट को मनाएँ उनके ही मंत्र से ....
इष्ट का बड़ा महत्व होता है। यदि इष्ट का साथ मिल जाए
तो जीवन की मुश्किलें आसान
होता चली जाती हैं। कुंडली में कितने
भी कष्टकर योग हो, इष्ट की कृपा से
जीवन आसान हो जाता है। अतः हर व्यक्ति को अपने इष्ट और
उसके मन्त्र की जानकारी होना जरूरी है।
लग्न कुंडली का नवम भाव इष्ट का भाव होता है और नवम से
नवम होने से पंचम भाव इष्ट का भाव माना जाता है। इस भाव में
जो राशि होती है उसके ग्रह के देवता ही हमारे
इष्ट कहलाते है। उनका मंत्र ही इष्ट मन्त्र कहलाता है।
यहाँ लग्न के अनुसार आपके इष्टदेव और उनके मंत्र
की जानकारी दी जा रही है।
1. मेष लग्न के इष्ट देव हैं विष्णु जी - मंत्र- ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय
2. वृषभ लग्न के इष्ट हैं गणपति जी - मंत्र- ऊँ गं गणपतये
नमः
3. मिथुन लग्न की इष्टदेवी हैं माँ दुर्गा - मंत्र- ऊँ
दुं दुर्गाय नमः
4. कर्क लग्न के इष्ट हैं हनुमान जी - मंत्र- ऊँ हं
हनुमंताय नमः
5. सिंह लग्न के इष्ट है विष्णु जी - मंत्र- ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय
6. कन्या लग्न के इष्ट हैं शिव जी - मंत्र-ऊँ नमः शिवाय
7. तुला लग्न के इष्ट हैं रूद्र जी - मंत्र- ऊँ रुद्राय नमः
8. वृश्चिक लग्न के इष्ट होंगे विष्णु जी - मंत्र- ऊँ गुं गुरुवे
नमः , ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
9. धनु लग्न के इष्ट है हनुमान जी - मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय
नमः
10. मकर लग्न की इष्ट है
देवी भगवती - मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
11. कुम्भ लग्न के इष्ट है गणपति जी - मंत्र- ऊँ गं गणपतये
नमः
12. मीन लग्न के इष्ट हैं शिव जी - मंत्र- ऊँ
नमः शिवाय
विशेष : इष्ट मंत्र का जाप नियमित रूप से और रोज एक निश्चित समय पर
ही करना चाहिये और कम से कम 108 बार.....

Tuesday, November 12, 2013

विवाह के तीन सूत्र ग्रह : गुरु, शुक्र व मंगल


जब किसी व्यक्ति की कुण्डली से दांपत्य का विचार किया जाता है, तो उसके लिये गुरु, शुक्र व मंगल का विश्लेषण किया जाता है. इन तीनों ग्रहों कि स्थिति को समझने के बाद ही व्यक्ति के दांपत्य जीवन के विषय में कुछ कहना सही रहता है. आईये यहां हम दाम्पत्य जीवन से जुडे तीन मुख्य ग्रहों को समझने का प्रयास करते है.

1. गुरु की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Jupiter in Marriage Astrology)

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये भावी वर-वधू की कुण्डली में गुरु पाप प्रभाव से मुक्त (Jupiter should be free for malefic influence) होना चाहिए. गुरु की शुभ दृ्ष्टि सप्तम भाव पर हों तो वैवाहिक जीवन में परेशानियों व दिक्कतों के बाद भो अलगाव की स्थिति नहीं बनती है. अर्थात गुरु की शुभता वर-वधू का साथ व उसके विवाह को बनाये रखती है. गुरु दाम्पत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह भी है. अगर कुण्डली में गुरु पीडित हों तो सर्वप्रथम तो विवाह में विलम्ब होगा, तथा उसके बाद संतान प्राप्ति में भी परेशानियां आती है.

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये संतान का समय पर होना आवश्यक समझा जाता है. विवाह के बाद सर्वप्रथम संतान का ही विचार किया जाता है. अगर गुरु किसी पापी ग्रह के प्रभाव से दूषित हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है. जब गुरु पर पाप प्रभाव हों तथा गुरु पापी ग्रह की राशि में भी स्थित हों तो निश्चित रुप से दाम्पत्य जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें आने की संभावनाएं बनती है.

2. शुक्र की वैवाहिक जीवन में भूमिका ( Role of Venus in married Life and astrology)
शुक्र विवाह का कारक ग्रह है. वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये शुक्र का कुण्डली में सुस्थिर होना आवश्यक होता है. जब पति-पत्नी दोनों की ही कुण्डली में शुक्र पूर्ण रुप से पाप प्रभाव से मुक्त हो तब ही विवाह के बाद संबन्धों में सुख की संभावनाएं बनती है. इसके साथ-साथ शुक्र का पूर्ण बली व शुभ (Venus should be strong and auspicious) होना भी जरूरी होता है.

शुक्र को वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह कहा जाता है. कुण्डली में शुक्र का किसी भी अशुभ स्थिति में होना पति अथवा पत्नी में से किसी के जीवन साथी के अलावा अन्यत्र संबन्धों की ओर झुकाव होने की संभावनाएं बनाता है. इसलिये शुक्र की शुभ स्थिति दाम्पत्य जीवन के सुख को प्रभावित करती है.

कुण्डली में शुक्र की शुभाशुभ स्थिति के आधार पर ही दाम्पत्य जीवन में आने वाले सुख का आकलन किया जा सकता है. इसलिये जब शुक्र बली हों, पाप प्रभाव से मुक्त हों, किसी उच्च ग्रह के साथ किसी शुभ भाव में बैठा हों (When Venus is strong, free of malefic influence and situated with exalted planet) तो, अथवा शुभ ग्रह से दृ्ष्ट हों तो दाम्पत्य सुख में कमी नहीं होती है. उपरोक्त ये योग जब कुण्डली में नहीं होते है. तब स्थिति इसके विपरीत होती है. शुक्र अगर स्वयं बली है, स्व अथवा उच्च राशि में स्थित है. केन्द्र या त्रिकोण में हों तब भी अच्छा दाम्पत्य सुख प्राप्त होता है.

इसके विपरीत जब त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु क्षेत्र में बैठा हों, अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तब दाम्पत्य जीवन के लिये अशुभ योग बनता है. यहां तक की ऎसे योग के कारण पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. इसके अलावा शुक्र, मंगल का संबन्ध व्यक्ति की अत्यधिक रुचि वैवाहिक सम्बन्धों में होने की सम्भावनाएं बनाती है. यह योग इन संबन्धों में व्यक्ति के हिंसक प्रवृ्ति अपनाने का भी संकेत करता है.

इसलिये विवाह के समय कुण्डलियों की जांच करते समय शुक्र का भी गहराई से अध्ययन करना चाहिए.

3. मंगल की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Mars in Marriage astrology)

मंगल की जांच किये बिना विवाह के पक्ष से कुण्डलियों का अध्ययन पूरा ही नहीं होता है. भावी वर-वधू की कुण्डलियों का विश्लेषण करते समय सबसे पहले कुण्डली में मंगल की स्थिति पर विचार किया जाता है. मंगल किन भावों में स्थित है, कौन से ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा है (aspect of Mars for marriage), तथा किन ग्रहों से युति संबन्ध में है. इन सभी बातों की बारीकी से जांच की जाती है.

मंगल के सहयोग से मांगलिक योग का निर्माण होता है (mars causes Manglik yoga in marriage). वैवाहिक जीवन में मांगलिक योग को इतना अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि जो लोग ज्योतिष शास्त्र में विश्वास नहीं करते है. अथवा जिन्हें विवाह से पूर्व कुण्डलियों की जांच करना अनुकुल नहीं लगता है वे भी यह जान लेना चाहते है कि वर-वधू की कुण्डलियों में मांगलिक योग बन रहा है या नहीं.

चूंकि विवाह के बाद सभी दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना करते है. जबकि मांगलिक योग से इन इसमें कमी होती है. जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति मांगलिक होता है. परन्तु मंगल का इन भावों में स्थित होने के अलावा भी मंगल के कारण वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाएं बनती है.

अनेक बार ऎसा होता है कि कुण्डली में मांगलिक योग बनता है. परन्तु कुण्डली के अन्य योगों से इस योग की अशुभता में कमी हो रही होती है. ऎसे में अपूर्ण जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ प्रभाव को लेकर भयभीत होते रहते है. तथा बेवजह की बातों को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम भी बनाये रखते है. जो सही नहीं है. विवाह के बाद एक नये जीवन में प्रवेश करते समय मन में दाम्पत्य जीवन को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रखना चाहिए.

Thursday, November 7, 2013

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ज्योतिषीय सलाह


सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ज्योतिषीय सलाह 

कुण्डली मिलान से पहले 
विवाह से पूर्व इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वर और कन्या की आयु में अधिक अंतर नहीं हो.आर्थिक स्थिति के कारण भी पारिवारिक जीवन में कलह उत्पन्न होता है अत: आर्थिक मामलों की अच्छी तरह जांच पड़ताल करने के बाद ही विवाह की बात आगे चलाना चाहिए.संभव हो तो वर और वधू की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की भी जांच करवा लेनी चाहिए इससे विवाह के पश्चात आने वाली बहुत सी उलझनें सुलझ जाती हैं.

कुण्डली और गुण मिलान
उपरोक्त बातों की जांच पड़ताल करने के बाद वर और वधू की कुण्डली मिलान कराना चाहिए.कुण्डली मिलान करते समय जन्म कुण्डली की सत्यता पर भी ध्यान देना चाहिए.मेलापक में 36 गुणों में से कम से कम 18 गुण मिलना शुभ होता है.मेलपाक में 18 गुण होने पर इस इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गण मैत्री और नाड़ी दोष नहीं हो.वर वधू की राशि का मिलान भी करना चाहिए.राशि मिलान के अनुसार वर और कन्या क्रमश: अग्नि एवं वायु तत्व तथा भूमि एवं जल तत्व के होने पर वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है.

मेलापक में राशि विचार 
वर और कन्या की राशियों के बीच तालमेल का वैवाहिक जीवन पर काफी असर होता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.दोनों की राशियां एक दूसरे से चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.तृतीय और एकादश राशि होने पर गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है.ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो.

वर और कन्या की राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है.अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.

कुण्डली में दोष विचार 
विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग, व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग, व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.हलांकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है.

Monday, November 4, 2013

कन्या का विवाह कब होगा ?




विवाह की आयु - गोचर का गुरु जब लग्न,त्रितीय,पंचम,नवम या एकादश भाव में आता है,उस वर्ष विवाह होता है! विशेषकर लग्न अथवा सप्तम बाव मेंआने पर विवाह हो जाता है! तथापि संबध्द वर्ष में शनि की दृष्टि लग्न अथवा सप्तम भाव पर नहीं होनी चाहिए ! विवाह का वर्ष निकालने की एक अन्य विधि इस प्रकार है -
सप्तम में जिस क्रम की राशि स्थित हो ,उस राशि के अंक में १० जोड़ें ! अब देखें कि सप्तम में कितनें पाप ग्रहों की दृष्टि है! ऍसे प्रत्येक ग्रह के लिए चार अंक जोड़े ! उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि सप्तम भाव में सिंह राशि स्थित है,तो इस राशि के ५ अंक में १० जोड़े! अब यदि सप्तम भाब पर तीन पाप ग्रहों कि दृष्टि पड़ रही है तो ५+१०+१२=२७वर्ष की आयु में विवाह होने की सम्भावना है! 
 विवाह का वर्ष निकालने की एक अन्य विधि इस प्रकार है - सप्तम में जिस क्रम की राशि स्थित हो ,उस राशि के अंक में १० जोड़ें ! अब देखें कि सप्तम में कितनें पाप ग्रहों की दृष्टि है! ऍसे प्रत्येक ग्रह के लिए चार अंक जोड़े ! उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि सप्तम भाव में सिंह राशि स्थित है,तो इस राशि के ५ अंक में १० जोड़े! अब यदि सप्तम भाब पर तीन पाप ग्रहों कि दृष्टि पड़ रही है तो ५+१०+१२=२७वर्ष की आयु में विवाह होने की सम्भावना है!
 पति कैसा मिलेगा----अगर कोई शुभ ग्रह (चन्द्र,गुरु,शुक्रसप्तम भाव में स्थित हो,या इन भावो का स्वामी हो,या इन भावो को देख रहा हो ,तो समझें कि लगभग सम आयु का पति प्राप्त होगा,परन्तु यदि कोई पापी ग्रह (सुर्य,मंगल,शनि,राहु,केतुसप्तम को अपनी स्थिति,दृष्टि या भावेश होने के नाते प्रभावित कर रहा है,तो मानेके अपनी से बड़ी आयु का पति प्राप्त होगा! पति की नौकरी,
उसके भाई-बहन एवं आयु---नवम भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर द्र्ष्ति डालने वाले ग्रहो के आधार पर पति के भाई बहनों क़ि संख्या को जाना जाता है,पुरुष और स्त्री ग्रह क्रमशः भाई बहनो को संकेत करता है!चतुर्थ भाव या चतुर्थेश बलयुक्त हो,तो पति की अजीविका के बारे में समझ सकते हैं!द्वतीयेश शुभ स्थान में हो अथवा अच्छी स्थिति में हो कर द्वतीय भाव को दृष्ट करता हो,तो पति दीर्घायु होता है!

Tuesday, October 29, 2013

राजनीति में प्रवेश एवं सफलता के लिये ज्योतिष योग

According to Ravan Sahita- राजनीति में प्रवेश एवं सफलता के लिये ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Carrer in Politics)

Astrology Yoga for Carrer in Politics
अन्य व्यवसायों एवं कैरियर की भांति ही राजनीति में प्रवेश करने वालों की कुंडली में भी ज्योतिष योग होते हैं. राजनीति में सफल रहे व्यक्तियों की कुंडली में ग्रहों का विशिष्ट संयोग देखा गया है,

1. आवश्यक भाव : छठा, सांतवा, दसवां व ग्यारहवां घर (Important Houses for Carrer in Politics)
सफल राजनेताओं की कुण्डली में राहु का संबध छठे, सांतवें, दशवें व ग्यारहवें घर से देखा गया है. कुण्डली के दशवें घर को राजनीति का घर कहते है. सत्ता में भाग लेने के लिये दशमेश या दशम भाव में उच्च का ग्रह बैठा होना चाहिए.

और गुरु नवम में शुभ प्रभाव में स्थिति होने चाहिए. या दशम घर या दशमेश का संबध सप्तम घर से होने पर व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है. छठे घर को सेवा का घर कहते है. व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिये इस घर से दशम /दशमेश का संबध होना चाहिए. सांतवा घर दशम से दशम है इसलिये इसे विशेष रुप से देखा जाता है.

2. आवश्यक ग्रह: राहु, शनि, सूर्य व मंगल . (Important Houses: Rahu, Saturn, Sun and Mars)
राहु को सभी ग्रहों में नीति कारक ग्रह का दर्जा दिया गया है. इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए. सूर्य को भी राज्य कारक ग्रह की उपाधि दी गई है. सूर्य का दशम घर में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो व राहु का छठे घर, दसवें घर व ग्यारहवें घर से संबध बने तो यह राजनीति में सफलता दिलाने की संभावना बनाता है. इस योग में दूसरे घर के स्वामी का प्रभाव भी आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है.

शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबध बनाये और इसी दसवें घर में मंगल भी स्थिति हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हितों के लिये काम करने के लिये राजनीति में आता है. यहां शनि जनता के हितैशी है तथा मंगल व्यक्ति में नेतृ्त्व का गुण दे रहा है. दोनों का संबध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण दे रहा है.

3. अमात्यकारक : राहु/ सूर्य (Amatyakarak Rahu and Sun)
राहु या सूर्य के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है. राहु के प्रभाव से व्यक्ति नीतियों का निर्माण करना व उन्हें लागू करने की ण्योग्यता रखता है. राहु के प्रभाव से ही व्यक्ति में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है. सूर्य अमात्यकारक होकर व्यक्ति को समाज में उच्च पद की प्राप्ति का संकेत देता है. नौ ग्रहों में सूर्य को राजा का स्थान दिया गया है.

4. नवाशं व दशमाशं कुण्डली (Navamsha and Dashamasha Kundli)
जन्म कुण्डली के योगों को नवाशं कुण्डली में देख निर्णय की पुष्टि की जाती है. किसी प्रकार का कोई संदेह न रहे इसके लिये जन्म कुण्डली के ग्रह प्रभाव समान या अधिक अच्छे रुप में बनने से इस क्षेत्र में दीर्घावधि की सफलता मिलती है. दशमाशं कुण्डली को सूक्ष्म अध्ययन के लिये देखा जाता है. तीनों में समान या अच्छे योग व्यक्ति को राजनीति की उंचाईयों पर लेकर जाते है.

5. अन्य योग (Other planets combination)
(1) नेतृ्त्व के लिये व्यक्ति का लग्न सिंह अच्छा समझा जाता है. सूर्य, चन्द्र, बुध व गुरु धन भाव में हों व छठे भाव में मंगल, ग्यारहवे घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो एसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है. यह योग व्यक्ति को लम्बे समय तक शासन में रखता है. जिसके दौरान उसे लोकप्रियता व वैभव की प्राप्ति होती है.

(ख) कर्क लग्न की कुण्डली में दशमेश मंगल दूसरे भाव में , शनि लग्न में, छठे भाव में राहु, तथा लग्नेश की दृष्टि के साथ ही सूर्य-बुध पंचम या ग्यारहवें घर में हो तो व्यक्ति को यश की प्राप्ति होती.

(ग) वृ्श्चिक लग्न की कुण्डली में लग्नेश बारहवे में गुरु से दृ्ष्ट हो शनि लाभ भाव में हो, राहु -चन्द्र चौथे घर में हो, शुक्र स्वराहि के सप्तम में लग्नेश से दृ्ष्ट हो तथा सूर्य ग्यारहवे घर के स्वामी के साथ युति कर शुभ स्थान में हो और साथ ही गुरु की दशम व दूसरे घर पर दृ्ष्टि हो तो व्यक्ति प्रखर व तेज नेता बनता है.

Wednesday, September 25, 2013

बृहस्पति और शुक्र

बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं.

बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं (Venus and Jupiter are benefic planets).सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है (7th House is of the spouse).इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.

ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है (Jupiter has bad effect on the house it is in) और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है.

दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है (Jupiter & Venus relationship with seventh house).जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.

शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव को देखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं (Jupiter & Venus aspect the seventh lord) तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग (Papkartari Yoga) से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है.

Sunday, August 25, 2013

प्रेम विवाह

प्रेम विवाह करने वाले लडके व लडकियों को एक-दुसरे को समझने
के अधिक अवसर प्राप्त होते है. इसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे
की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ
पाते है. प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओ व स्नेह की प्रगाढ
डोर से बंधे होते है. ऎसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में
भी दोनों का साथ बना रहता है.
पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद
की स्थिति इसके विपरीत होती है. इस स्थिति में दोनों का प्रेम
विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत
होता है. आईये देखे कि कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह
की संभावनाएं बनाते है.
1. राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं (Yogas of Rahu
increase the chances of a love marriage)
1) जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु
की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए
बनती है. राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर
व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने
का सोचता है. राहु को स्वभाव से संस्कृ्ति व लीक से हटकर कार्य
करने की प्रवृ्ति का माना जाता है.
2.) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध
या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है.
कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व
पापी ग्रह माना गया है. इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब
विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने
परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं
बनती है.
3.) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु
की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है.
(Aspect of Rahu on the seventh lord, saturn or venus increases
chances of love marriage)
4) जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित
हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है.
2. प्रेम विवाह के अन्य योग (Other astrological yogas for love
marriage)
1) जब किसी व्यक्ति कि कुण्ड्ली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव
के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम
भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह
के योग बनते है.
2) इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द लग्न
से पंचम भाव में स्थित होंने पर प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
(Venus in fifth or ninth house from ascendant or fifth house
from Moon increases love marriage chances)
3) प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हों तथा पंचमेश व
एकादशेश का राशि परिवतन अथवा दोनों कुण्डली के
किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम
विवाह होने के योग बनते है.
4) अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के
स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ
स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है.
5) जब सप्तम भाव में शनि व केतु
की स्थिति हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है. (When
Saturn or ketu are in the seventh house the chances for love
marriage increase)
6) कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित
हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों,
अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम
विवाह की संभावनाएं बनती है.
7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के
स्वामी एक -दूसरे से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह
की संभावनाएं बनती है.
जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब
विवाह का भाव बली होता है. तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर
सकता है.
9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति,
स्थिति अथवा दृ्ष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन
हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है. (Combinatin of
fifth and the seventh house and mutual aspect or sign
exchange causes love marriage)
10) जब सप्तमेश की दृ्ष्टि, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश
भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है.
11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से
दृ्ष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं
बनती है. (Conjunction of lagna lord seventh house or aspect
increases chances of love marriage)
12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव
का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते
है. तो प्रेम विवाह हो सकता है.

Sunday, March 31, 2013

नवम घर में बैठे ग्रह बताते हैं कब आएगा धन और सुख

ninth house planets in birth chart ज्योतिषशास्त्र में कुण्डली के नवम घर को भाग्य स्थान कहा जाता है। इस घर में जो ग्रह बैठा होता है या जो ग्रह इस घर को देखता है उसके अनुरूप व्यक्ति को भाग्य का सहयोग प्राप्त होता है। इस घर का स्वामी ग्रह जिस घर में बैठता है उससे भी भाग्य प्रभावित होता है। ज्योतिषशास्त्री चन्द्रप्रभाव बताती हैं कि भाग्य स्थान में सूर्य होने पर व्यक्ति स्वाभिमानी और महत्वाकांक्षी होता है। 22 वें वर्ष में इनका भाग्योदय होता है। ऐसा व्यक्ति राजनीति और सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर भाग लेता है। इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। वाहन सुख प्राप्त होता है।

चन्द्रमा जिनकी कुण्डली में नवें घर में होता है उनका भाग्योदय 16वें वर्ष में होता है। ऐसे व्यक्ति दयालु और धार्मिक प्रवृति के होते हैं। जल से जुड़े क्षेत्र से इन्हें लाभ होता है। ऐसे व्यक्ति जन्म स्थान से दूर जाकर तरक्की करते हैं। मंगल का नवम घर में होना बताता है कि व्यक्ति को भूमि से संबंधित कार्यों में तथा अपने जन्मस्थान पर ही अच्छी कामयाबी मिल जाएगी। ऐसे लोग कई बार धन लाभ के लिए गलत तरीका भी अपना लेते हैं।

बुध का नवम भाव में होना दर्शात है कि व्यक्ति का भाग्योदय 32वें वर्ष में होगा। ऐसे लोग कल्पनाशील और अच्छे लेखक होते हैं। ज्योतिष, गणित एवं पर्यटन क्षेत्र से इन्हें लाभ मिलता है। ऐसे लोग काफी बुद्धिमान होते हैं। इन्हें प्रसिद्घि प्राप्त होती है। गुरू नवम स्थान का स्वामी ग्रह माना जाता है। गुरू का इस स्थान में होना उत्तम माना जाता है। ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय 24वें वर्ष में होता है इन्हें भाग्य का साथ हमेशा मिलता रहता है। धन-संपत्ति के साथ ही इन्हें मान-सम्मान भी प्राप्त होता है।

गुरू की तरह शुक्र का भी नवम स्थान में होना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय 25वें वर्ष में होता है। ऐसे व्यक्ति की रूचि साहित्य और कला में होती है। धन प्राप्ति का एक माध्यम कला और साहित्य हो सकता है। इनके पास धन-संपत्ति भरपूर होती है। भाग्य स्थान में शनि का होना दर्शात है कि व्यक्ति की तरक्की धीमी गति से होगी।

ऐसे व्यक्ति के जीवन का उत्तरार्ध पूर्वार्ध से अधिक सुखमय और खुशहाल होता है। इनका भाग्योदय 36वें वर्ष में होता है। ऐसे व्यक्ति नियम-कानून एवं प्राचीन मान्यताओं से जुड़े रहते हैं। राहु केतु का इस स्थान में होना बताता है कि व्यक्ति का भाग्योदय 42वें वर्ष में होगा।

Sunday, January 6, 2013

किस राशि के लोग कैसे होते ?

  ज्योतिष के अनुसार इंसानों को जन्म के समय और ग्रहों की स्थिति के अनुसार 12 राशियों में विभाजित किया गया है। हर राशि के व्यक्ति का स्वभाव और आदतें दूसरी राशि के लोगों से एकदम अलग होती हैं। किसी भी इंसान को समझने के लिए ज्योतिष सटीक विद्या है।

मेष-
राशि चक्र की यह पहली राशि है, इस राशि का चिन्ह मेढ़ा या भेड़ है, मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है तथा इसका स्वामी मंगल है। मेष राशि के अन्तर्गत अश्विनी और भरणी नक्षत्र के चारों चरण और कृत्तिका का प्रथम चरण आते हैं। मंगल जातक को अधिक उग्र और निरंकुश बना देता है। वह किसी की जरा सी भी विपरीत बात में या कार्य में जातक को क्रोधात्मक स्वभाव देता है, जिससे जातक बात-बात में झगड़ा करने को उतारू हो जाता है। मेष राशि के जातक को किसी की आधीनता पसंद नहीं होती है। वह अपने अनुसार ही कार्य और बात करना पसंद करता है। जातक को ऐश-आराम की जिन्दगी जीने के लिये मेहनत वाले कार्यों से दूर रखता है और जातक विलासी होता है। जातक के दिमाग में विचारों की स्थिरता रहती है और जातक जो भी सोचता है उसे करने के लिये उद्धत हो जाता है। मंगल की वजह से जातक में भटकाव वाली स्थिति रहती है वह अपनी जिन्दगी में यात्रा को महत्व देता है। जातक में उग्रता के साथ विचारों को प्रकट न करने की हिम्मत देते हैं, वह हमेशा अपने मन में ही लगातार माया के प्रति सुलगता रहता है। जीवन साथी के प्रति बनाव बिगाड़ हमेशा चलता रहता है, मगर जीवन साथी से दूर भी नहीं रहा जाता है। जनता के लिये अपनी सहायता वाली सेवाएं देकर पूरी जिन्दगी निकाल देगा। सूर्य जातक को अभिमानी और चापलूस प्रिय बनाता है। बुध जातक को बुद्धि वाले कार्यों की तरफ और संचार व्यवस्था से धन कमाने की वृत्ति देता है। शुक्र विलासिता प्रिय और दोहरे दिमाग का बनाता है लेकिन अपने विचारों को उसमें सतुलित करने की अच्छी योग्यता होती है।
मेष अग्नि तत्व वाली राशि है, अग्नि त्रिकोण (मेष, सिंह, धनु) की यह पहली राशि है। इसका स्वामी मंगल अग्नि ग्रह है। राशि और स्वामी का यह संयोग इसकी अग्नि या ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है, यही कारण है कि मेष जातक ओजस्वी, दबंग, साहसी और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले होते हैं, यह जन्मजात योद्धा होते हैं। मेष राशि वाले व्यक्ति बाधाओं को चीरते हुए अपना मार्ग बनाने की कोशिश करते हैं।

वृष-
राशि का चिन्ह बैल है। बैल स्वभाव से ही अधिक पारिश्रमी और बहुत अधिक वीर्यवान होता है, साधारणत: वह शांत रहता है। किन्तु क्रोध आने पर वह उग्र रूप धारण कर लेता है। यह स्वभाव वृष राशि के जातक में भी पाया जाता है। वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। इसके अन्तर्गत कृत्तिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चारों चरण और मृगशिरा के प्रथम दो चरण आते हैं।
जातक के जीवन में पिता-पुत्र का कलह रहता है, जातक का मन सरकारी कार्यों की ओर रहता है। सरकारी ठेकेदारी का कार्य करवाने की योग्यता रहती है। पिता के पास जमीनी काम या जमीन के द्वारा जीविकोपार्जन का साधन होता है। जातक अधिकतर शराब, काबाब के भोजन में अपनी रुचि को प्रदर्शित करता है।
गुरु का प्रभाव जातक में ज्ञान के प्रति अहम भाव को पैदा करने वाला होता है, वह जब भी कोई बात करता है तो गर्व की बात करता है, सरकारी क्षेत्रों की शिक्षाएं और उनके काम जातक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और किसी प्रकार से केतु का बल मिल जाता है तो जातक सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखता है। मंगल के प्रभाव से जातक के अन्दर मानसिक गर्मी को प्रदान करता है, कल कारखानों, स्वास्थ्य कार्यों और जनता के झगड़े सुलझाने का कार्य जातक कर सकता है, जातक की माता आपत्तियों से घिरी होती है और पिता का लगाव अन्य स्त्रियों से बना रहता है। ये अधिक सौन्दर्य बोधी और कला प्रिय होते हैं। जातक कलाकारी के क्षेत्र में नाम करता है। माता और पति का साथ या माता और पत्नी का साथ घरेलू वातावरण मे सामजस्यता लाता है, जातक अपने जीवन साथी के अधीन रहना पसंद करता है।
चन्द्र-बुध जातक को कन्या संतान अधिक देता है और माता के साथ वैचारिक मतभेद का वातावरण बनाता है, जातक के जीवन में व्यापारिक यात्राएं काफी होती हैं, जातक अपने ही बनाए हुए उसूलों पर जीवन चलाता है, वह मकडी जैसा जाल बुनता रहता है और अपने ही बुने जाल में फंस जाता है।
रोहिणी के चौथे चरण के मालिक चन्द्र-चन्द्र है,जातक के अन्दर हमेशा उतार चढाव की स्थिति बनी रहती है,वह अपने ही मन का राजा होता है।
मंगल-सूर्य की युति में पैदा होने वाले जातक अपने शरीर से दुबले पतले होने के वावजूद गुस्सेवाले होते हैं, वे घमंडी होते हैं। जिससे आदेश देने की वृत्ति होने से सेना या पुलिस में अपने को निरंकुश बनाकर रखते है, इस तरह के जातक अगर राज्य में किसी भी विभाग में काम करते हैं तो सरकारी सम्पत्ति को किसी भी तरह से क्षति नहीं होने देते। मंगल-बुध जातक के अन्दर कभी कठोर और कभी नर्म वाली स्थिति पैदा कर देते हैं। जातक का मन कम्प्यूटर और इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र की ओर होता है। वृष राशि वाले जातक शांति पूर्वक रहना पसंद करते हैं। जीवन में परिवर्तन से चिढ सी होती है, अलग माहौल में रहना अच्छा नही लगता है। इस प्रकार के लोग सामाजिक होते हैं और अपने से उच्च लोगों को आदर की नजर से देखते है।

मिथुन- राशि का प्रतीक युवा दम्पति है, यह द्वि-स्वभाव वाली राशि है। मृगसिरा नक्षत्र के तीसरे चरण के मालिक मंगल-शुक्र हैं। मंगल शक्ति और शुक्र माया है। जातक के अन्दर माया के प्रति भावना पायी जाती है, जातक जीवन साथी के प्रति हमेशा शक्ति बन कर प्रस्तुत होता है। साथ ही घरेलू कारणों चलते कई बार आपस में तनाव रहता है। मंगल और शुक्र की युती के कारण जातक में स्त्री रोगों को परखने की अद्भुत क्षमता होती है। जातक वाहनों की अच्छी जानकारी रखता है। इनका घरेलू साज सज्जा के प्रति अधिक झुकाव होता है।
मंगल के कारण जातक जबान का पक्का बन जाता है। गुरु आसमान का राजा है तो राहु गुरु का चेला, दोनो मिलकर जातक में आसमानी ताकतों को बढ़ाते हैं। जातक का रुझान अंतरिक्ष और ब्रह्माण्ड के बारे मे पता करने की योग्यता जन्म जात पैदा होती है। वह वायुयान और सेटेलाइट के बारे में ज्ञान बढ़ाता है। राहु-शनि के साथ मिलने से जातक के अन्दर शिक्षा और शक्ति उत्पादित होती है। जातक का कार्य शिक्षा स्थानों में या बिजली, पेट्रोल या वाहन वाले कामों की ओर होता है। जातक एक दायरे मे रह कर ही कार्य कर पाता है और पूरा जीवन कार्योपरान्त फलदायक रहता है। जातक के अन्दर एक मर्यादा जो धर्म में लीन करती है और जातक सामाजिक और धार्मिक कार्यों में अपने को रत रखता है। गुरु जो ज्ञान का मालिक है, उसे मंगल का साथ मिलने पर उच्च पदासीन करने के लिये और रक्षा आदि विभागों में ले जाता है।
जातक के अन्दर अपने ही विचारों में अपने ही कारणों से उलझने का कारण पैदा होता है। मिथुन राशि पश्चिम दिशा की द्योतक है, जो चन्द्रमा की निरयण समय में जन्म लेते हैं, वे मिथुन राशि के कहे जाते हैं।
जातक मे चंचलता रहती है। शरीर बलबान नही रह पाता है, आंखों का रंग भूरा या नीला होता है, शरीर का रंग सांवला या गोरा कैसा भी हो सकता है।
मिथुन राशि वालों को दुर्बोध माना जाता है। इस राशि का निशान स्त्री और पुरुष का जोडा है। इसका स्वामी बुध है। बुध की धातु पारा है और इसका स्वभाव जरा सी गर्मी-सर्दी में ऊपर नीचे होने वाला है।
जातकों में दूसरे की मन की बातें पढऩे, दूरदृष्टि, बहुमुखी प्रतिभा, अधिक चतुरायी से कार्य करने की क्षमता होती है। जातक को बुद्धि वाले कामों में ही सफलता मिलती है। अपने आप पैदा होने बाली मति और वाणी की चतुरता से इस राशि के लोग कुशल कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ भी बन जाते हैं, हर कार्य में जिज्ञासा और खोजी दिमाग होने के कारण इस राशि के लोग अन्वेषण में भी सफलता लेते रहते हैं और पत्रकार, लेखक, मीडियाकर्मी, भाषाओं की जानकारी, योजनाकार भी बन सकते हैं।

कर्क- इस राशि का चिन्ह केकड़ा है और यह उत्तर दिशा की द्योतक है। यह चर राशि है। राशि स्वामी चन्द्रमा है। इसके अन्तर्गत पुनर्वसु नक्षत्र का अन्तिम चरण, पुष्य नक्षत्र के चारों चरण तथा अश्लेशा नक्षत्र के चारों चरण आते हैं।
जातक कल्पनाशील होते हैं। शनि-सूर्य जातक को मानसिक रूप से अस्थिर बनाते हैं और जातक में अहम की भावना बढ़ाते हैं। जिस स्थान पर भी वह कार्य करने की इच्छा करता है, जातक को परेशानी ही मिलती है।
शनि-बुध दोनो मिलकर जातक को होशियार बना देते है। शनि-शुक्र जातक को धन और जायदाद देते है। शुक्र उसे सजाने संवारने की कला देता है और शनि अधिक वासना देता है।
जातक को उपदेशक बन सकता है। जातक को बुध आंकडे और शनि लिखने का प्रभाव देते हैं। कम्प्यूटर आदि का प्रोग्रामर बनाने में जातक को सफलती मिलत है।
जानक श्रेष्ठ बुद्धि वाला, जलविहारी, कामुक, कृतज्ञ, ज्योतिषी, सुगंधित पदार्थों का सेवी और भोगी होता है। वह मातृभक्त होता है।
कर्क केकडा जब किसी वस्तु या जीव को अपने पंजों के जकड़ लेता है, तो उसे आसानी से नहीं छोडता है। भले ही इसके लिये उसे अपने पंजे गंवाने पडें. उसी तरह जातकों में अपने प्रेम पात्रों तथा विचारों से चिपके रहने की प्रबल भावना होती है, यह भावना उन्हें ग्रहणशील, एकाग्रता और धैर्य के गुण प्रदान करती है। उनका मूड बदलते देर नहीं लगती है। कल्पनाशक्ति और स्मरण शक्ति बहुत तीव्र होती है। उनके लिए अतीत का महत्व होता है। मैत्री को वे जीवन भर निभाना जानते हैं, अपनी इच्छा के स्वामी होते हैं।
ये सपना देखने वाले होते हैं, परिश्रमी और उद्यमी होते हैं। जातक बचपन में प्राय: दुर्बल होते हैं, किन्तु आयु के साथ साथ उनके शरीर का विकास होता जाता है। चूंकि कर्क कालपुरुष की वक्षस्थल और पेट का प्रतिधिनित्व करती है, अत: जातकों को अपने भोजन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

सिंह- सिंह राशि पूर्व दिशा की द्योतक है। इसका चिन्ह शेर है। राशि का स्वामी सूर्य है और इस राशि का तत्व अग्नि है। इसके अन्तर्गत मघा नक्षत्र के चारों चरण, पूर्वा फाल्गुनी के चारों चरण और उत्तराफाल्गुनी का पहला चरण आता है।
केतु-मंगल जातक में दिमागी रूप से आवेश पैदा करता है। केतु-शुक्र, जो जातक में सजावटी और सुन्दरता के प्रति भावना को बढाता है। केतु-बुध, जो जातक में कल्पना करने और हवाई किले बनाने के लिये सोच पैदा करता है। चन्द्र-केतु जातक में कल्पना शक्ति का विकास करता है। शुक्र-सूर्य जातक को स्वाभाविक प्रवृत्तियों की तरफ बढाता है। जातक का सुन्दरता के प्रति मोह होता है और वे कामुकता की ओर भागते हैं। जातक में अपने प्रति स्वतन्त्रता की भावना भरता है और जातक किसी की बात नहीं मानता।
जातक, पित्त और वायु विकार से परेशान रहने वाले लोग, रसीली वस्तुओं को पसंद करने वाले होते हैं। कम भोजन करना और खूब घूमना, इनकी आदत होती है। छाती बड़ी होने के कारण इनमे हिम्मत बहुत अधिक होती है और मौका आने पर यह लोग जान पर खेलने से भी नहीं चूकते। जातक जीवन के पहले दौर में सुखी, दूसरे में दुखी और अन्तिम अवस्था में पूर्ण सुखी होता है।
सिंह राशि वाले जातक हर कार्य शाही ढंग से करते हैं जैसे सोचना शाही, करना शाही, खाना शाही और रहना शाही। इस राशि वाले लोग जुबान के पक्के होते हैं। जातक जो खाता है वही खायेगा, अन्यथा भूखा रहना पसंद करेगा, वह आदेश देना जानता है, किसी का आदेश उसे सहन नही है, जिससे प्रेम करेगा, उसके मरते दम तक निभायेगा, जीवन साथी के प्रति अपने को पूर्ण रूप से समर्पित रखेगा, अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी का आना इस राशि वाले को कतई पसंद नहीं है।
जातक कठोर मेहनत करने वाले धन के मामलों में बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। स्वर्ण, पीतल और हीरा जवाहरात के व्यवसाय इनको बहुत फायदा देने वाले होते हैं। सरकार और नगर पालिका वाले पद इनको खूब भाते हैं। जातकों की वाणी और चाल में शालीनता पायी जाती है। इस राशि वाले जातक सुगठित शरीर के मालिक होते हैं। नृत्य करना इनकी आदत होती है, अधिकतर इस राशि वाले या तो बिलकुल स्वस्थ रहते है या फिर आजीवन बीमार रहते हैं, जिस वारावरण में इनको रहना चाहिये, अगर वह न मिले, इनके अभिमान को कोई ठेस पहुंचाये या इनके प्रेम में कोई बाधा आये, तो यह लोग अपने मानसिक कारणों से बीमार रहने लगते है। रीढ़ की हड्डी की बीमारी या चोटों से अपने जीवन को खतरे में डाल लेते हैं। इस राशि के लोगों के लिये ह्रदय रोग, धड़कन का तेज होना, लू लगना और आदि बीमारी होने की संभावना होती है।

कन्या राशि- राशि चक्र की छठी कन्या राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। इस राशि का चिह्न हाथ में फूल लिए कन्या है। राशि का स्वामी बुध है। इसके अन्तर्गत उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के दूसरे, तीसरे और चौथे चरण, चित्रा के पहले दो चरण और हस्त नक्षत्र के चारों चरण आते है। जातक को उसके द्वारा किये जाने वाले कार्यों के प्रति अधिक महत्वाकांक्षी बनाते हैं। जातक भावुक होता है एवं वह दिमाग की अपेक्षा ह्रदय से काम लेना चालू कर देता है। इस राशि के लोग संकोची और शर्मीले प्रभाव के साथ झिझकने वाले होते है। मकान, जमीन और सेवाओं वाले क्षेत्र में इस राशि के जातक कार्य करते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से फेफड़ों में ठंड लगना और पाचन एवं आंतों से संबंधी बीमारियां जातकों मे मिलती है।
बाल्याकाल से युवावस्था के अलावा जातकों की वृद्धावस्था अधिक सुखी और ज्यादा स्थिर होता है। इस राशि वाल पुरुषों का भी शरीर स्त्रियों की भांति कोमल होता है। ये नाजुक और ललित कलाओं से प्रेम करने वाले लोग होते है। इनका बचपन संघर्षों में बीतता है, इन्हें सुविधायें आसानी से प्राप्त नहीं होती है। किंतु ये अपनी योग्यता के बल पर ही उच्च पद पर पहुंच जाते है। विपरीत परिस्थितियां भी इन्हें डिगा नहीं सकती और ये अपनी सुझ-बुझ, धैर्य, चातुर्य के कारण आगे बढ़ते रहते है। ये कभी विचलित नही होते है। बुध का प्रभाव इनके जीवन मे स्पष्ट झलकता है. अच्छे गुण, विचारपुर्ण जीवन, बुद्धिमत्ता, इस राशि वाले में अवश्य देखने को मिलती है। इसके स्वभाव मे नम्रता और लज्जा का पुट होता है। शिक्षा और जीवन में सफलता के कारण लज्जा और झेंपुपन तो कम हो जाते हैं परंतु नम्रता तो इनका स्वाभाविक गुण है। इनको अकारण क्रोध नहीं आता किंतु जब क्रोध आता है तो जल्दी समाप्त नहीं होता। जिसके कारण क्रोध आता है, उसके प्रति घृणा की भावना इनके हृदय में घर कर जाती है। इन व्यक्तियों मे भाषण व बातचीत करने की अच्छी शक्ति होती है। सम्बन्धियों से इन्हे विशेष लाभ नहीं होता है इनका वैवाहिक जीवन भी सुखी नहीं होता। यह जरुरी नहीं की इनका किसी और औरत के साथ सम्बन्ध होने के कारण ही ऐसा होगा। बगैर पराई स्त्री से प्रेम के बावजूद भी क्लेशमय हो सकता है। अगर ये ये दुसरा विवाह कर भी लें जिसकी प्रबल सम्भावना रहती है, तो इनके जीवन मे काफी परिवर्तन आ जाता है। पर इनके प्रेम सम्बन्ध प्राय: बहुत सफल नहीं होते है। इसी कारण निकटस्थ लोगों के साथ इनके झगड़े चलते रहते है। ऐसे व्यक्ति धार्मिक विचारों में आस्था तो रखते है परंतु किसी विशेष मत के नहीं होते है। इन्हें यात्राएं भी करनी पड़ती है तथा विदेश गमन की भी सम्भावना रहती है। जिस काम मे हाथ डालते है लगन के साथ पुरा करके ही छोड़ते है। इस राशि वाले लोग अपरिचित लोगों मे अधिक लोकप्रिय होते है, इसलिये इन्हें अपना सम्पर्क विदेशों और विदेशियों मे बढ़ाना चाहिये। परिश्रम और सतत संघर्ष से किसी भी कार्य मे लगें रहे तो इनको सफलता के साथ यश भी मिलता है। इन्हें पेट की बीमारी से प्राय: कष्ट होता है। जिगर भी उसी का भाग है। पैर के रोगों से भी सचेत रहें। वैसे इन व्यक्ति की मैत्री किसी भी प्रकार के व्यक्ति के साथ हो सकती है।

तुला- इस राशि का चिन्ह तराजू है और यह राशि पश्चिम दिशा की द्योतक है और यह वायुतत्व की राशि है। शुक्र राशि का स्वामी है। इस राशि वालों को कफ की प्रवृत्ति होती है। इस राशि के पुरुष सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। आंखों में चमक व चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। इनका स्वभाव सम होता है। किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते, दूसरों को प्रोत्साहन देना, सहारा देना इनका स्वभाव होता है। ये व्यक्ति कलाकार, सौंदर्योपासक व स्नेहिल होते हैं। व्यावहारिक भी होते हैं व इनके मित्र इन्हें पसंद करते हैं। कई बार व्यसनाधीन होने की भी रहते है।
तुला राशि की स्त्रियां मोहक व आकर्षक होती हैं। स्वभाव खुशमिजाज व हंसी खनखनाहट वाली होती हैं। बुद्धि वाले काम करने में अधिक रुचि होती है। घर की साजसज्जा व स्वयं को सुंदर दिखाने का शौक रहता है। कला, गायन आदि गृह कार्य में दक्ष होती हैं। बच्चों से बेहद जुड़ाव रहता है।

वृश्चिक राशि- वृश्चिक राशि का चिन्ह बिच्छू है और यह राशि उत्तर दिशा की द्योतक है। वृश्चिक राशि जलतत्व की राशि है। इसका स्वामी मंगल है। यह स्थिर राशि है, स्त्री राशि है। इस राशि के व्यक्ति उठावदार कदकाठी के होते है। यह राशि गुप्त अंगों, उत्सर्जन, तंत्र व स्नायु तंत्र का प्रतिनिधित्व करती है। अत: मंगल की कमजोर स्थिति में इन अंगों के रोग जल्दी होते है। ये लोग एलर्जी से भी अक्सर पीडि़त रहते है विशेषकर जब चंद्रमा कमजोर हो।
वृश्चिक राशि वालों में दूसरों को आकर्षित करने की अच्छी क्षमता रखते हैं। इस राशि के लोग बहादुर, भावुक होने के साथ-साथ कामुक होते हैं। शरीरिक डील-डौल भी अच्छा होता है। ऐसे व्यक्तियों की शारीरिक संरचना अच्छी तरह से विकसित होती है। इनके कंधे चौड़े होते हैं। इनमें शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। इन्हें बेवकूफ बनाना आसान नहीं होता है। इसीलिये कोई इन्हें धोखा नहीं दे सकता। आप हमेशा साफ-सुथरी और सही सलाह देने में विश्वास रखते हैं। कभी साफगोई विरोध का कारण भी बन सकती है। ये जातक दूसरों के विचारों का विरोध ज्यादा करते हैं, अपने विचारों के पक्ष में कम बोलते हैं और आसानी से सबके साथ घुलते-मिलते नहीं हैं। यह जातक अक्सर विविधता की तलाश में रहते हैं। वृश्चिक राशि से प्रभावित लड़के बहुत कम बोलते होते हैं। ये आसानी से किसी को भी आकर्षित कर सकते हैं। इन्हें दुबली-पतली लड़कियां आकार्षित करती हैं। वृश्चिक वाले एक जिम्मेदार गृहस्त की भूमिका निभाते हैं। अति महत्वाकांक्षी और जिद्दी होते हैं। अपने रास्ते चलते है मगर किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। लोगों की गलतियों और बुरी बातों को खूब याद रखते हैं और समय आने पर उनका उत्तर भी देते हैं। इनकी वाणी कटु और गुस्सा तेज होता है मगर मन साफ होता है। दूसरों में दोष ढूंढने की आदत होती है। जोड़-तोड़ की राजनीति में चतुर होते हैं।
इस राशि की लड़कियां तीखे नयन-नक्ष वाली होती हैं। यह ज्यादा सुन्दर न हों तो भी इनमें एक अलग आकर्षण रहता है। इनका बातचीत करने का अपना विशेष अंदाज होता है। ये बुद्धिमान और भावुक होती हैं। इनकी इच्छा शक्ति बहुत दृढ़ होती है। स्त्रियां जिद्दी और अति महत्वाकांक्षी होती है। थोड़ी स्वार्थी प्रवृत्ति भी होती है। स्वतंत्र निर्णय लेना इनकी आदत में होते है। मायके परिवार से अधिक स्नेह रहता है। नौकरीपेशा होने पर अपना वर्चस्व बनाए रखती है। काम करने की अपार क्षमता होती है। वाणी की कटुता इनमें भी होती है, सुख-साधनों की लालसा सदैव बनी ही रहती है।
ये सभी जातक जिद्दी होते है, काम के प्रति लगन रखते है, महत्वाकांक्षी व दूसरों को प्रभावित करने की योग्यता रखते हैं। ये व्यक्ति उदार व आत्मविश्वासी भी होते है।
वृश्चिक राशि के बच्चे परिवार से अधिक स्नेह रखते हैं। कम्प्यूटर-टीवी का बेहद शौक होता है। दिमागी शक्ति तीव्र होती है, खेलों में इनकी रुचि होती है।

धनु राशि- इस राशि का चिन्ह धनुषधारी व्यक्ति होता है। यह राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। धनु राशि वाले काफी खुले विचारों के होते हैं। जीवन के अर्थ को अच्छी तरह समझते हैं। दूसरों के बारे में जानने की कोशिश में हमेशा करते रहते हैं। धनु राशि वालों को रोमांच काफी पसंद होता है। धनु राशि के व्यक्ति निडर व आत्म विश्वासी होते हैं। ये अत्याधिक महत्वाकांक्षी और स्पष्टवादी होते हैं। लेकिन स्पष्टवादीता के कारण दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा देते हैं। इनके अनुसार जो इनके द्वारा परखा हुआ है वही सत्य है अत: इनके मित्र कम होते है। ये धार्मिक विचारधारा से दूर होते हैं।
धनु राशि के लड़के मध्यम कद काठी के होते हैं। इनके बाल भूरे व आंखें बड़ी-बड़ी होती हैं। इनमें धैर्य की कमी होती है। इन्हें मेकअप करने वाली लड़कियां पसंद हैं। इन्हें भूरा और पीला रंग प्रिय होता है। अपनी पढ़ाई और कैरियर के कारण अपने जीवन साथी और विवाहित जीवन की उपेक्षा कर देते हैं। पत्नी को शिकायत का मौका नहीं देते और घरेलू जीवन का महत्व समझते हैं। धनु राशि की लड़कियां लम्बे कदमों से चलने वाली होती हैं। आप आसानी से किसी के साथ दोस्ती नहीं करती हैं। ये एक अच्छी श्रोता होती हैं और इन्हें खुले और ईमानदारी पूर्ण व्यवहार के व्यक्ति पसंद आते हैं। इस राशि की स्त्रियां गृहणी बनने की अपेक्षा सफल कैरियर बनाना चाहती है। इनके जीवन में भौतिक सुखों की महत्ता रहती है। सामान्यत: सुखी और सम्पन्न जीवन व्यतीत करती हैं।

मकर राशि- मकर राशि का चिन्ह मगरमच्छ है।
मकर राशि के व्यक्ति अति महत्वाकांक्षी होते हैं। यह सम्मान और सफलता प्राप्त करने के लिये लगातार कार्य कर सकते हैं। इनका शाही स्वभाव व गंभीर व्यक्तित्व होता है। आपको अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इन्हें यात्रा करना पसंद है। गंभीर स्वभाव के कारण आसानी से किसी को मित्र नहीं बनाते हैं। इनके मित्र अधिकतर कार्यालय या व्यवसाय से ही सम्बन्धित होते हैं। मनपसंद रंग भूरा और नीला है। सामान्यत: कम बोलने वाले, गंभीर और उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को ज्यादा पसंद करते हैं। ईश्वर व भाग्य में विश्वास करते हैं। दृढ़ पसंद-नापसंद के चलते इनका वैवाहिक जीवन लचीला नहीं होता और जीवन साथी को आपसे परेशानी महसूस हो सकती है। मकर राशि के लड़के कम बोलने वाले होते हैं। इनके हाथ की पकड़ काफी मजबूत होती है। देखने में सुस्त किन्तु मानसिक रूप से बहुत चुस्त होते हैं। प्रत्येक कार्य को बहुत योजनाबद्ध ढंग से करते हैं। गहरा नीला या श्वेत रंग प्रधान वस्त्र पहने हुए लड़कियां आपको बहुत पसंत आती है।
जब आप कार में दूर की यात्रा कर रहे होते हैं, आपकी खामोशी आपके साथी को प्रिय होती है। अगर आपकी पत्नी आपके व्यवहार को अच्छी तरह समझ लेती है तो आपका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है। आप पत्नी या साथी के सहयोग से उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
मकर राशि की लड़कियां लम्बी व दुबली-पतली होती हैं। यह व्यायाम आदि करना पसंद करती हैं। लम्बे कद के बाबजूद आप ऊंची एड़ी की सैंडिल पहनना पसंद करती हैं। पारंपरिक मूल्यों पर विश्वास करने वाली होती हैं। छोटे छोटे वाक्यों में अपने विचारों को व्यक्त करती हैं। दूसरों के विचारों को अच्छी तरह से समझ सकती हैं। इनके मित्र बहुत होते हैं और नृत्य की शौकिन होती है। इनको मजबूत कद कठी के व्यक्ति बहुत आकर्षित करते हैं। विवाहेत्तर सम्बन्धों में विश्वास नहीं करती हैं। अगर आप कैरियर वूमैन हैं तो आप अपने कार्य क्षेत्र में अपना अधिकतर समय व्यतीत करती हैं। आप अपने घर या घरेलू कार्यों के विषय में अधिक चिन्ता नहीं करती हैं।

कुंभ राशि- कुंभ राशि का चिन्ह घड़ा लिए खड़ा हुआ व्यक्ति है।
कुंभ राशि वाले बुद्धिमान होने के साथ-साथ व्यवहारकुशल होते हैं। जीवन में स्वतन्त्रता के पक्षधर होते हैं। प्रकृति से भी असीम प्रेम करते हैं। शीघ्र ही किसी से भी मित्रता स्थपित कर सकते हैं। आप सामाजिक क्रिया कलापों में रूचि रखने वाले होते हैं। इसमें भी साहित्य, कला, संगीत व दान आपको बेहद पसंद होता है।
इस राशि के लोगों में साहित्य प्रेम भी उच्च कोटि का होता है। आप केवल बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ बोलना चालना पसंद करते हैं। कभी भी आप अपने मित्रों से असमानता का व्यवहार नहीं करते हैं। आपका व्यवहार सभी को आपकी ओर आकर्षित कर लेता है। कुंभ राशि के लड़के दुबले और लम्बे होते हैं। आपका व्यवहार स्नेहपूर्ण होता है। इनकी मुस्कान इन्हें आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करती है। इनकी रूचि स्तरीय खान पान व पहनावे की ओर रहती है। ये बोलने की अपेक्षा सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। इन्हें लोगों से मिलना जुलना अच्छा लगता है। अपने व्यवहार में बहुत ईमानदार रहते हैं इसलिये अनेक लड़कियां आपकी प्रशंसक होती हैं। आपको कलात्मक अभिरूचि व सौम्य व्यक्तित्व वाली लड़कियां आकर्षित करती हैं। अपनी इच्छाओं को दूसरों पर लादना पसंद नहीं करते हैं और अपने घर परिवार से स्नेह रखते हैं।
कुंभ राशि की लड़कियां बड़ी बड़ी आंखों वाली व भूरे बालों वाली होती हैं। यह कम बोलती हैं इनकी मुस्कान आकर्षक होती है। इनका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक होता है किन्तु आसानी से किसी को अपना नहीं बनाती हैं। ये अति सुंदर और आकर्षक होती हैं। आप किसी कलात्मक रूचि, पेंटिग, काव्य, संगीत, नृत्य या लेखन आदि में अपना समय व्यतीत करती हैं। ये सामान्यत: गंभीर व कम बोलने वाले व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होती हैं। इनका जीवन सुखपूर्वक व्यतित होता है क्योंकि ये ज्यादा इच्छाएं नहीं करती हैं। अपने घर को भी कलात्मक रूप से सजाती हैं।


मीन राशि- मीन राशि का चिन्ह मछली होता है।
मीन राशि वाले मित्रपूर्ण व्यवहार के कारण अपने कार्यालय व पास पड़ोस में अच्छी तरह से जाने जाते हैं। आप कभी अति मैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं करते हैं। बल्कि आपका व्यवहार बहुत नियंत्रित रहता है। ये आसानी से किसी के विचारों को पढ़ सकते हैं। अपनी ओर से उदारतापूर्ण व संवेदनाशील होते हैं और व्यर्थ का दिखावा व चालाकी को बिल्कुल नापसंद करते हैं। एक बार किसी पर भी भरोसा कर लें तो यह हमेशा के लिये होता है इसीलिये आप आपने मित्रों से अच्छा भावानात्मक सम्बन्ध बना लेते हैं। सौंदर्य और रोमांस की दुनियां में रहते हैं। कल्पनाशीलता बहुत प्रखर होती है। अधिकतर व्यक्ति लेखन और पाठन के शौकीन होते हैं। आपको नीला, सफेद और लाल रंग रूप से आकर्षित करते हैं। आपकी स्तरीय रूचि का प्रभाव आपके घर में देखने को मिलता है। आपका घर आपकी जिंदगी में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अपने धन को बहुत देखभाल कर खर्च करते हैं। आपके अभिन्न मित्र मुश्किल से एक या दो ही होते हैं। जिनसे ये अपने दिल की सभी बातें कह सकते हैं। ये विश्वासघात के अलावा कुछ भी बर्दाश्त कर सकते हैं।
मीन राशि के लड़के भावुक हृदय व पनीली आंखों वाले होते हैं। अपनी बात कहने से पहले दो बार सोचते हैं। आप जिंदगी के प्रति काफी लचीला दृटिकोण रखते हैं। अपने कार्य क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिये परिश्रम करते हैं।
कार्यालय या विद्यालय में कोई लड़की आपको आकर्षित करती है तो केवल इसलिये कि इससे इनके कार्यों में कोई रूकावट नहीं आती हैं। आपको बुद्धिमान और हंसमुख लड़कियां पसंद हैं। आप बहुत संकोचपूर्वक ही किसी लड़की से अपनी बात कह पाते हैं। एक कोमल व भावुक स्वभाव के व्यक्ति हैं। आप पत्नी के रूप में गृहणी को ही पसंद करते हैं। किन्तु ये खुद घरेलू कार्यों में दखलंदाजी नहीं करते हैं न ही आप अपनी व्यावसायिक कार्य में उसका दखल पसंद करते हैं। आपका वैवाहिक जीवन अन्य राशियों की अपेक्षा सर्वाधिक सुखमय रहता है।
मीन राशि की लड़कियां भावुक व चमकदार आंखों वाली होती हैं। ये आसानी से किसी से मित्रता नहीं करती हैं। लेकिन एक बार उसकी बातों पर विश्वास हो जाये तो आप अपने दिल की बात भी उससे कह देती हैं। ये स्वभाव से कला प्रेमी होती हैं। एक बुद्धिमान व सभ्य व्यक्ति आपको आकर्षित करता है। आप शान्तिपूर्वक उसकी बात सुन सकती हैं और आसानी से अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करती हैं। अपनी मित्रता और वैवाहिक जीवन में सुरक्षा व दृढ़ता रखना पसंद करती हैं। ये अपने पति के प्रति विश्वसनीय होती है और वैसा ही व्यवहार अपने पति से चाहती हैं। आपको ज्योताषि आदि में रूचि हो सकती है। आपको नई-नई चीजें सीखने का शौक होता है।

Sunday, July 22, 2012

ग्रह नक्षत्रों के विकार को दूर करता है सूरज मुखी

वैसे तो लगभग हर व्यक्ति सूरजमुखी के पौधे से परिचित होगा, परन्तु यह शायद कम लोगों को ही मालूम हो कि इसके प्रयोग से निर्बल गुरू ग्रह को बलवान किया जा सकता है। आइये बताते हैं कि किस प्रकार से इसका प्रयोग करके गुरू ग्रह को बलनाव किया जाये।
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1- यदि किसी जातक का गुरू ग्रह पीडि़त होकर अशुभ फल दे रहा। वह व्यक्ति शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार के दिन दोपहर में 12 बजे के आस-पास किसी नवग्रह मन्दिर में जाकर गुरू ग्रह को सूरजमुखी के पुष्प अर्पित करना चाहिए। यह उपाय कम से कम 9 गुरूवार लगातार करने से लाभ मिलेगा। जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही है, यह उपाय करने से उनका विवाह शीघ्र ही हो जायेगा।
2- शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार के दिन शुभ मुहूर्त में पूर्व निमंत्रित करके इसकी जड़ को निकाल लें। जड़ के इस टुकड़े को प्रति गुरूवार स्नान जल में डालकर उसी जल स्नान करें। ऐसा प्रयोग कम से कम 9 गुरूवार लगातार करने से गुरू ग्रह शुभ फल देने लगता है।
3- सूरजमुखी के बीजों कोलेस्ट्राल कम करने का अद्भुत औषधीय गुण होता है। यदि प्रातः काल 1 चम्मच सूरजमुखी के अंकुरित बीजों का नित्य सेंवन किया जाये तो शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा कुछ ही समय में कम हो जायेगी।
4- सूरजमुखी का पौधा मकान की सीमा में होने से सकारात्मक उर्जा का संचरण करता है जिससे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम व सौहार्द बनाता रहता है।

रोग और ज्योतिष



रोग का कारण,ज्योतिष के नजरिये से—
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लग्न कुण्डली के प्रथम भाव के नाम आत्मा, शरीर, होरा, देह, कल्प, मूर्ति, अंग, उदय, केन्द्र, कण्टक और चतुष्टय है। इस भाव से रूप, जातिजा आयु, सुख-दुख, विवेक, शील, स्वभाव आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। लग्न भाव में मिथुन, कन्या, तुला व कुम्भ राशियाँ बलवान मानी जाती हैं। इसी प्रकार षष्ठम भाव का नाम आपोक्लिम, उपचय, त्रिक, रिपु, शत्रु, क्षत, वैरी, रोग, द्वेष और नष्ट है तथा इस भाव से रोग, शत्रु, चिन्ता, शंका, जमींदारी, मामा की स्थिति आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। प्रथम भाव के कारक ग्रह सूर्य व छठे भाव के कारक ग्रह शनि और मंगल हैं। जैसा कि स्पष्ट है कि देह निर्धारण में प्रथम भाव ही महत्वपूर्ण है ओर शारीरिक गठन, विकास व रोगों का पता लगाने के लिए लग्न, इसमें स्थित राशि, इन्हें देखने वाले ग्रहों की स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अलावा सूर्य व चन्द्रमा की स्थिति तथा कुण्डली के 6, 8 व 12वां भाव भी स्वास्थ्य के बारे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लग्न में स्थित राशि व इनसे संबंधित ग्रह किस प्रकार व किस अंग को पी़डा प्रदान करते हैं, आइए अब इसके बारे में जानते हैं-
1. मेष राशि :- इस राशि का स्वामी मंगल है। यह सिर या मस्तिष्क की कारक है और इसके कारक ग्रह मंगल और गुरू हैं। मकर राशि में 28 अंश पर मंगल उच्चा के होते हैं तथा कर्क राशि में नीच के होते हैं। मंगल वीर, योद्धा, खूनी स्वभाव और लाल रंग के हैं। अग्नि तत्व व पुरूष प्रधान तथा क्षत्रिय गुणों से युक्त है। यह राशि मस्तिष्क, मेरूदण्ड तथा शरीर की आंतरिक तंत्रिकाओं पर विपरीत प्रभाव डालती है। लग्न में यह राशि स्थित हो तथा मंगल नीच के हो या बुरे ग्रहों की इस पर दृष्टि हो तो ऎसा जातक उच्चा रक्तचाप का रोगी होगा। आजीवन छोटी-मोटी चोटों का सामना करता रहेगा। सीने में दर्द की शिकायत रहती है और ऎसे जातक के मन में हमेशा इस बात की शंका रहती है कि मुझे कोई जहरीला जानवर ना काट ले। परिणाम यह होता है कि ऎसे जातक का आत्म विश्वास कमजोर हो जाता है और उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है जो अनावश्यक रूप से विविध प्रकार की मानसिक बीमारियों का कारण होती है।
2. वृषभ राशि :- इस राशि का स्वामी शुक्र है। यह मुख की कारक राशि है व लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, बुध और शनि होते हैं। शुक्र 27 अंश पर मीन में उच्चा के तथा कन्या राशि में नीच के होते हैं(परम उच्चांश व परम नीचांश)। शुक्र ग्रह कलात्मक गुणों से भरपूर, रसिक व आशिक मिजाज, रंग सफेद तथा भूमि व वायु से युक्त है। वृषभ राशि लग्न में स्थित हो, शुक्र या कारक ग्रह नीच के हो तो जातक हमेशा नियमों के खिलाफ चलने वाला होता है। ऎसे जातक को मुख संबंधी बीमारी छाले, तुतलाकर बोलना आदि की शिकायत रहती है तथा जातक की संतान को आजीवन बुरे स्वास्थ्य का सामना करना प़डता है।
3. मिथुन राशि :- मिथुन राशि का स्वामी बुध है। यह वक्ष, छाती, भुजाएं व श्वास नली की कारक है। लग्न मेे स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, बुध व चन्द्रमा होते हैं। बुध के परम उच्चांश व परम नीचांश 15 होते हैं जो कन्या राशि में उच्चा के तथा मीन राशि में नीच के होते हैं। बुध ग्रह को नपुंसक, स्त्री तत्व युक्त, राजकुमार आदि की संज्ञा दी गई है। रंग हरा व इसमें पृथ्वी व वायु तत्व मौजूद है। इसकी वणिक वृत्ति रहती है। यदि बुध कुण्डली में नीच का हो या अन्य क्रूर ग्रहों से पीç़डत हो तो जातक फेफ़डों से संबंधित रोग जैसे टी.बी., श्वास नली में खराबी, वायु प्रकोप (गैस व अपच), जी घबराना, हाथ व माँस पेशियों पर विपरीत प्रभाव प़्ाडता है।
4. कर्क राशि :-कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है। यह राशि ह्वदय की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह चन्द्रमा और मंगल होते हैं। 3 अंश पर वृषभ राशि में चन्द्रमा उच्च् के तथा वृश्चिक राशि में परम नीच के माने जाते हैं। चन्द्रमा सौम्य ग्रह है। जल तत्व, सफेद रंग, स्त्री प्रधान तथा ब्राrाण व वैश्य के गुण इनमें मौजूद हैं। यदि कुण्डली के लग्न में र्क राशि हो व चन्द्रमा नीच के या पीड़ित हो तो जातक की त्वचा व पाचन संस्थान पर विपरीत प्रभाव रहता है एवं जातक में आत्म विश्वास की कमी रहती है। मानसिक अवसाद, कुण्ठा व जातक कमजोर दिल का होता है। ऎसे जातक की संतान भी नीच विचारों की होती है।
5. सिंह राशि :-सिंह राशि का स्वामी सूर्य है जो नक्षत्र-मण्डल का स्वामी है। यह राशि गर्भ व पेट की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह सूर्य और मंगल होते हैं। 10 अंश पर मेष राशि में ये परम उच्च के तथा तुला राशि में परम नीच के होते हैं। सूर्य उग्र स्वभाव के, अगिA तत्व तथा इनका रंग हल्का लाल व पीला है। यदि कुण्डली के लग्न में सिंह राशि है तथा यह या सूर्य नीच के हो या अन्यथा किसी प्रकार पीड़ित हो तो शरीर में रक्त संचार एवं जीवनी शक्ति प्रभावित होती है। जातक को ह्वदयाघात, हडि्डयों की बीमारी व नेत्र रोगों से ग्रसित हो सकता है। ऎसा जातक अपने लक्ष्यों से भटक जाता है तथा नीच कर्मरत रहता है।
6. कन्या राशि :- न्या राशि के स्वामी बुध है तथा यह पेट व कमर के कारक हैं। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह बुध तथा शुक्र होते हैं। नीच का या अन्यथा बुध पीड़ित होने पर पेट, पाचन क्रियाएं, यकृत संबंधित रोग व शुक्र के प्रभाव या संयोग के कारण गुप्त रोगों का व किडनी, गुदा से संबंधित रोग जातक को प्रदान करता है।
7. तुला राशि :-तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं तथा यह राशि मृत्राशय की कारक है। लग्न में यह राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, शनि व बुध होते हैं एवं स्वामी के किसी भी प्रकार से पीड़ित होने पर या नीच का होने पर यह जातक को जननांग व मूत्राशय संबंधित रोगों से पीç़डत रखता है। महिलाओं के मासिक धर्म व गर्भ धारण संबंधी क्रिया भी इसी के कारण प्रभावित होती है।
8. वृश्चिक राशि :-वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल हैं। यह राशि गुप्तांगों (लिंग व गुदा) की कारक है। लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह मंगल, गुरू व चंद्रमा होते हैं। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर व राशि स्वामी के पीड़ित होने पर या नीच में स्थित होने पर या मंगल बद होने पर गुदा, लिंग, जननांग, यकृत, मस्तिष्क संबंधी व आंतों की बीमारियों से जातक को ग्रसित करती हैं।
9. धनु राशि :-धनु राशि के स्वामी देवगुरू बृहस्पति हैं। यह राशि जांघों व नितम्ब की कारक है। गुरू पुरूष प्रधान, शांत व मौन प्रकृति के, रंग पीला तथा इनमें जल व अग्नि दोनों तत्व मौजूद है। लग्न में स्थित होने पर इस राशि के कारक ग्रह गुरू व चन्द्रमा होते हैं। 5 अंश पर कर्क में परमोच्चा व मकर राशि में परम नीच के होते हैं। नीचस्थ व पीç़डत गुरू जातक को लीवर, ह्वदय, आंत, जंघा, कूल्हे व बवासीर रोगों से ग्रसित रखते हैं।
10. मकर राशि :-मकर राशि के स्वामी शनि है। यह राशि घुटनों की कारक है। शनि क्रूर ग्रह है। इसका रंग काला तथा इसमें वायु व पृथ्वी तत्व मौजूद है। शनि 20 अंश पर तुला राशि में परमोच्चा व मेष राशि में परम नीच के होते हैं। लग्न में मकर राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शनि, शुक्र व बुध होते हैं। शनि नीचस्थ या पीड़ित होने पर जातक को घुटनों, जांघ, कफ व पाचन तंत्र संबंधी बीमारियों से ग्रसित रखता है। इसके अलावा पुरानी बीमारी यदि कोई है तो उस पर भी इसी राशि का प्रभाव रहता है।
11. कुम्भ राशि :-कुम्भ राशि के स्वामी भी शनि है। यह राशि पिण्डलियों की कारक है। कुम्भ राशि लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह गुरू, शुक्र व शनि होते हैं। शनि के पीड़ित या नीचस्थ होने पर व इस राशि के पीड़ित होने पर जातक पिण्डलियों, उच्च रक्तचाप, हर्निया व कई प्रकार की अन्य बीमारियों से ग्रसित रहता है क्योंकि ऎसा जातक खराब आदतों वाला व किसी भी प्रकार के नशे का आदि होता है जिसके परिणामस्वरूप वह कई प्रकार की व्याधियां पाल लेता है।
12. मीन :- मीन राशि का स्वामी देवगुरू बृहस्पति होते हैं। यह राशि पैर के पंजों की कारक है। लग्न में मीन राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह सूर्य, मंगल व गुरू होते हैं। राशि स्वामी के पीç़डत या नीचस्थ होने पर जातक लीवर, पंजों, तंत्रिका से संबंधी बीमारी व घुटनों संबंधी परेशानी जातक को रहती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कुण्डली में रोगों का अध्ययन करते समय उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए व ग्रहों की युति, प्रकृति, दृष्टि, उनका परमोच्चा या परम नीच की स्थिति का गहन अध्ययन कर ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए।

Sunday, May 20, 2012

ग्रहों के अनुसार करें ये उपाय, जल्दी होगा प्रमोशन

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा अपने काम के प्रति समर्पित रहते हैं। वे दिन-रात अपने काम में निखार लाने का प्रयत्न करते रहते हैं और उसमें सफल भी होते हैं लेकिन इसके बाद भी उन्हें प्रमोशन नहीं मिल पाता। जबकि कुछ लोग बिना कुछ किए ही प्रमोशन पा लेते हैं। कुछ ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कारण ऐसा हो सकता है। यदि आप प्रमोशन चाहते हैं तो नीचे लिखे उपाय कर उन ग्रहों को शांत करें, आपका भी प्रमोशन जल्दी होगा।

उपाय

- यदि शनि आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न कर रहा है, तो एक बर्तन में तिल्ली का तेल लेकर उसमें अपनी परछाई देखकर भिखारी को दान कर दें।

- यदि सूर्य के कारण बाधा हो तो प्रतिदिन पहली रोटी गाय को दें यदि गाय काली या पीली हो तो और भी शुभ रहता है।

- चन्द्र के कारण बाधा हो तो पिता को स्वयं जाकर दूध पिलाएं और उनकी सेवा करें।

- मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण बाधा हो तो घर में बुजुर्ग, महिलाओं का सम्मान करें और चांदी की अंगूठी या कड़ा पहनें।

- बुध ग्रह के कारण आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो किसी चांदी के आभूषण का दान करें।

- गुरु के प्रभाव के कारण तरक्की में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन पीली गाय को गुड़-चने खिलाएं।

- यदि शुक्रग्रह के कारण आपको बाधा हो तो रोज घर की बुजुर्ग स्त्रियों के चरण स्पर्श करें।

- राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ  को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

- केतु का अशुभ प्रभाव हो तो रोज कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं।