Sunday, July 22, 2012

वास्तु और रोग

वास्तु दोष और रोग( कारण एवं उपाय/निवारण)
वास्तुशास्त्रअर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, से पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो.

इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है.

यहाँ हम अपने पाठकों को जानकारी दे रहे हैं कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से पारिवारिक सदस्यों को किस तरह से नाना प्रकार के रोगों का सामना करना पड सकता है.
पूर्व दिशा में दोष:-
* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी.

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.
* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है.
* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है.
* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है.
* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं.
बचाव के उपाय:-
* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.
* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार परसूर्य यन्त्रस्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.
* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी.
पश्चिम दिशा में दोष:-
पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है. यह स्थान कालपुरूष का पेट, गुप्ताँग एवं प्रजनन अंग है.
* यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो परिवार में फेफडे, मुख, छाती और चमडी इत्यादि के रोगों का सामना करना पडता है.
* यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो पुरूष संतान की रोग बीमारी पर व्यर्थ धन का व्यय होता रहेगा.
* यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकर, बाहर जाए तो परिवार के पुरूष सदस्यों को लम्बी बीमारियों का शिकार होना पडेगा.
* यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो, तो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा.
* यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें जायें, तो गृहस्वामी के गुप्ताँग में अवश्य कोई बीमारी होगी.
* यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान हो, तो पारिवारिक सदस्यों को गर्मी, पित्त और फोडे-फिन्सी, मस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी.
बचाव के उपाय:-
* ऎसी स्थिति में पश्चिमी दिवार परवरूण यन्त्रस्थापित करें.
* परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करे.
* पश्चिम की दिवार को थोडा ऊँचा रखें और इस दिशा में ढाल रखें.
* पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें.
उत्तर दिशा में दोष-
उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरूष का ह्रदय स्थल माना जाता है. जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है.
* यदि उत्तर दिशा ऊँची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बीमारियाँ, थकावट, आलस, घुटने इत्यादि की बीमारियाँ बनी रहेंगीं.
* यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियों को रूग्णता का शिकार होना पडता है.
बचाव के उपाय :-
यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जाये, तो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय: स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा. रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पडेगा.
* इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल मेंबुध यन्त्रस्थापित करें.
* परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे.
* भवन के प्रवेशद्वार पर संगीतमय घंटियाँ लगायें.
* उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा(Parrot Green) रंग करवायें.
दक्षिण दिशा में दोष:-
दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है, जो कि कालपुरूष के बायें सीने, फेफडे और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है.
* यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआँ, दरार, कचरा, कूडादान, कोई पुराना सामान इत्यादि हो, तो गृहस्वामी को ह्रदय रोग, जोडों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आँखों की बीमारी, कोलेस्ट्राल बढ जाना अथवा हाजमे की खराबीजन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पडता है.
* दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊँचा चबूतरा बनाया गया हो, तो परिवार की स्त्रियों को घबराहट, बेचैनी, ब्लडप्रैशर, मूर्च्छाजन्य रोगों से पीडा का कष्ट भोगना पडता है.
* यदि दक्षिणी भाग नीचा हो, ओर उत्तर से अधिक रिक्त स्थान हो, तो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगें. उन्हे उच्चरक्तचाप, पाचनक्रिया की गडबडी, खून की कमी, अचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पडेगा. दक्षिण पिशाच का निवास है, इसलिए इस तरफ थोडी जगह खाली छोडकर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए.
* यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाए, तो ऎसा भवन दीर्घ व्याधियाँ एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है.
बचाव के उपाय:-
* यदि दक्षिणी भाग ऊँचा हो, तो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगें. इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें.
* घर के पूजनस्थल मेंश्री हनुमंतयन्त्रस्थापित करें.
* दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु कामंगलयन्त्रलगायें.
* प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूँड वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें.

रोग और ज्योतिष



रोग का कारण,ज्योतिष के नजरिये से—
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लग्न कुण्डली के प्रथम भाव के नाम आत्मा, शरीर, होरा, देह, कल्प, मूर्ति, अंग, उदय, केन्द्र, कण्टक और चतुष्टय है। इस भाव से रूप, जातिजा आयु, सुख-दुख, विवेक, शील, स्वभाव आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। लग्न भाव में मिथुन, कन्या, तुला व कुम्भ राशियाँ बलवान मानी जाती हैं। इसी प्रकार षष्ठम भाव का नाम आपोक्लिम, उपचय, त्रिक, रिपु, शत्रु, क्षत, वैरी, रोग, द्वेष और नष्ट है तथा इस भाव से रोग, शत्रु, चिन्ता, शंका, जमींदारी, मामा की स्थिति आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। प्रथम भाव के कारक ग्रह सूर्य व छठे भाव के कारक ग्रह शनि और मंगल हैं। जैसा कि स्पष्ट है कि देह निर्धारण में प्रथम भाव ही महत्वपूर्ण है ओर शारीरिक गठन, विकास व रोगों का पता लगाने के लिए लग्न, इसमें स्थित राशि, इन्हें देखने वाले ग्रहों की स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अलावा सूर्य व चन्द्रमा की स्थिति तथा कुण्डली के 6, 8 व 12वां भाव भी स्वास्थ्य के बारे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लग्न में स्थित राशि व इनसे संबंधित ग्रह किस प्रकार व किस अंग को पी़डा प्रदान करते हैं, आइए अब इसके बारे में जानते हैं-
1. मेष राशि :- इस राशि का स्वामी मंगल है। यह सिर या मस्तिष्क की कारक है और इसके कारक ग्रह मंगल और गुरू हैं। मकर राशि में 28 अंश पर मंगल उच्चा के होते हैं तथा कर्क राशि में नीच के होते हैं। मंगल वीर, योद्धा, खूनी स्वभाव और लाल रंग के हैं। अग्नि तत्व व पुरूष प्रधान तथा क्षत्रिय गुणों से युक्त है। यह राशि मस्तिष्क, मेरूदण्ड तथा शरीर की आंतरिक तंत्रिकाओं पर विपरीत प्रभाव डालती है। लग्न में यह राशि स्थित हो तथा मंगल नीच के हो या बुरे ग्रहों की इस पर दृष्टि हो तो ऎसा जातक उच्चा रक्तचाप का रोगी होगा। आजीवन छोटी-मोटी चोटों का सामना करता रहेगा। सीने में दर्द की शिकायत रहती है और ऎसे जातक के मन में हमेशा इस बात की शंका रहती है कि मुझे कोई जहरीला जानवर ना काट ले। परिणाम यह होता है कि ऎसे जातक का आत्म विश्वास कमजोर हो जाता है और उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है जो अनावश्यक रूप से विविध प्रकार की मानसिक बीमारियों का कारण होती है।
2. वृषभ राशि :- इस राशि का स्वामी शुक्र है। यह मुख की कारक राशि है व लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, बुध और शनि होते हैं। शुक्र 27 अंश पर मीन में उच्चा के तथा कन्या राशि में नीच के होते हैं(परम उच्चांश व परम नीचांश)। शुक्र ग्रह कलात्मक गुणों से भरपूर, रसिक व आशिक मिजाज, रंग सफेद तथा भूमि व वायु से युक्त है। वृषभ राशि लग्न में स्थित हो, शुक्र या कारक ग्रह नीच के हो तो जातक हमेशा नियमों के खिलाफ चलने वाला होता है। ऎसे जातक को मुख संबंधी बीमारी छाले, तुतलाकर बोलना आदि की शिकायत रहती है तथा जातक की संतान को आजीवन बुरे स्वास्थ्य का सामना करना प़डता है।
3. मिथुन राशि :- मिथुन राशि का स्वामी बुध है। यह वक्ष, छाती, भुजाएं व श्वास नली की कारक है। लग्न मेे स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, बुध व चन्द्रमा होते हैं। बुध के परम उच्चांश व परम नीचांश 15 होते हैं जो कन्या राशि में उच्चा के तथा मीन राशि में नीच के होते हैं। बुध ग्रह को नपुंसक, स्त्री तत्व युक्त, राजकुमार आदि की संज्ञा दी गई है। रंग हरा व इसमें पृथ्वी व वायु तत्व मौजूद है। इसकी वणिक वृत्ति रहती है। यदि बुध कुण्डली में नीच का हो या अन्य क्रूर ग्रहों से पीç़डत हो तो जातक फेफ़डों से संबंधित रोग जैसे टी.बी., श्वास नली में खराबी, वायु प्रकोप (गैस व अपच), जी घबराना, हाथ व माँस पेशियों पर विपरीत प्रभाव प़्ाडता है।
4. कर्क राशि :-कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है। यह राशि ह्वदय की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह चन्द्रमा और मंगल होते हैं। 3 अंश पर वृषभ राशि में चन्द्रमा उच्च् के तथा वृश्चिक राशि में परम नीच के माने जाते हैं। चन्द्रमा सौम्य ग्रह है। जल तत्व, सफेद रंग, स्त्री प्रधान तथा ब्राrाण व वैश्य के गुण इनमें मौजूद हैं। यदि कुण्डली के लग्न में र्क राशि हो व चन्द्रमा नीच के या पीड़ित हो तो जातक की त्वचा व पाचन संस्थान पर विपरीत प्रभाव रहता है एवं जातक में आत्म विश्वास की कमी रहती है। मानसिक अवसाद, कुण्ठा व जातक कमजोर दिल का होता है। ऎसे जातक की संतान भी नीच विचारों की होती है।
5. सिंह राशि :-सिंह राशि का स्वामी सूर्य है जो नक्षत्र-मण्डल का स्वामी है। यह राशि गर्भ व पेट की कारक है। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह सूर्य और मंगल होते हैं। 10 अंश पर मेष राशि में ये परम उच्च के तथा तुला राशि में परम नीच के होते हैं। सूर्य उग्र स्वभाव के, अगिA तत्व तथा इनका रंग हल्का लाल व पीला है। यदि कुण्डली के लग्न में सिंह राशि है तथा यह या सूर्य नीच के हो या अन्यथा किसी प्रकार पीड़ित हो तो शरीर में रक्त संचार एवं जीवनी शक्ति प्रभावित होती है। जातक को ह्वदयाघात, हडि्डयों की बीमारी व नेत्र रोगों से ग्रसित हो सकता है। ऎसा जातक अपने लक्ष्यों से भटक जाता है तथा नीच कर्मरत रहता है।
6. कन्या राशि :- न्या राशि के स्वामी बुध है तथा यह पेट व कमर के कारक हैं। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह बुध तथा शुक्र होते हैं। नीच का या अन्यथा बुध पीड़ित होने पर पेट, पाचन क्रियाएं, यकृत संबंधित रोग व शुक्र के प्रभाव या संयोग के कारण गुप्त रोगों का व किडनी, गुदा से संबंधित रोग जातक को प्रदान करता है।
7. तुला राशि :-तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं तथा यह राशि मृत्राशय की कारक है। लग्न में यह राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शुक्र, शनि व बुध होते हैं एवं स्वामी के किसी भी प्रकार से पीड़ित होने पर या नीच का होने पर यह जातक को जननांग व मूत्राशय संबंधित रोगों से पीç़डत रखता है। महिलाओं के मासिक धर्म व गर्भ धारण संबंधी क्रिया भी इसी के कारण प्रभावित होती है।
8. वृश्चिक राशि :-वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल हैं। यह राशि गुप्तांगों (लिंग व गुदा) की कारक है। लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह मंगल, गुरू व चंद्रमा होते हैं। इस राशि के लग्न में स्थित होने पर व राशि स्वामी के पीड़ित होने पर या नीच में स्थित होने पर या मंगल बद होने पर गुदा, लिंग, जननांग, यकृत, मस्तिष्क संबंधी व आंतों की बीमारियों से जातक को ग्रसित करती हैं।
9. धनु राशि :-धनु राशि के स्वामी देवगुरू बृहस्पति हैं। यह राशि जांघों व नितम्ब की कारक है। गुरू पुरूष प्रधान, शांत व मौन प्रकृति के, रंग पीला तथा इनमें जल व अग्नि दोनों तत्व मौजूद है। लग्न में स्थित होने पर इस राशि के कारक ग्रह गुरू व चन्द्रमा होते हैं। 5 अंश पर कर्क में परमोच्चा व मकर राशि में परम नीच के होते हैं। नीचस्थ व पीç़डत गुरू जातक को लीवर, ह्वदय, आंत, जंघा, कूल्हे व बवासीर रोगों से ग्रसित रखते हैं।
10. मकर राशि :-मकर राशि के स्वामी शनि है। यह राशि घुटनों की कारक है। शनि क्रूर ग्रह है। इसका रंग काला तथा इसमें वायु व पृथ्वी तत्व मौजूद है। शनि 20 अंश पर तुला राशि में परमोच्चा व मेष राशि में परम नीच के होते हैं। लग्न में मकर राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह शनि, शुक्र व बुध होते हैं। शनि नीचस्थ या पीड़ित होने पर जातक को घुटनों, जांघ, कफ व पाचन तंत्र संबंधी बीमारियों से ग्रसित रखता है। इसके अलावा पुरानी बीमारी यदि कोई है तो उस पर भी इसी राशि का प्रभाव रहता है।
11. कुम्भ राशि :-कुम्भ राशि के स्वामी भी शनि है। यह राशि पिण्डलियों की कारक है। कुम्भ राशि लग्न में स्थित होने पर इसके कारक ग्रह गुरू, शुक्र व शनि होते हैं। शनि के पीड़ित या नीचस्थ होने पर व इस राशि के पीड़ित होने पर जातक पिण्डलियों, उच्च रक्तचाप, हर्निया व कई प्रकार की अन्य बीमारियों से ग्रसित रहता है क्योंकि ऎसा जातक खराब आदतों वाला व किसी भी प्रकार के नशे का आदि होता है जिसके परिणामस्वरूप वह कई प्रकार की व्याधियां पाल लेता है।
12. मीन :- मीन राशि का स्वामी देवगुरू बृहस्पति होते हैं। यह राशि पैर के पंजों की कारक है। लग्न में मीन राशि स्थित होने पर इसके कारक ग्रह सूर्य, मंगल व गुरू होते हैं। राशि स्वामी के पीç़डत या नीचस्थ होने पर जातक लीवर, पंजों, तंत्रिका से संबंधी बीमारी व घुटनों संबंधी परेशानी जातक को रहती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कुण्डली में रोगों का अध्ययन करते समय उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए व ग्रहों की युति, प्रकृति, दृष्टि, उनका परमोच्चा या परम नीच की स्थिति का गहन अध्ययन कर ही किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए।

Sunday, June 10, 2012

हाथाजोडी – वनस्पति के रूप में जड़

हाथाजोडी – वनस्पति के रूप में जड़ हैं. मानव कंकाल की प्रकृति से साम्य रखनेवाली हाथाजोडी तंत्र-शास्त्र की अदभुत वस्तु हैं. शालिम मिश्री जैसी चिकनी और उसी रंग की होती हैं. किसी रविपुष्प योग में हाथाजोडी को पंचामृत में स्नान कराके लाल आसन पर स्थापित करें, फिर उसे सिंदूर भरी डिब्बी में रख लें. इसके रखने से गले एवं वाणी की दोष एवं रोग नहीं होते हैं. व्यक्तित्व को प्रभावी बनाती हैं. परिवार में प्रेत बाधा या भय की स्थिति नहीं रहती हैं. आत्म-विश्वास में वृद्धि होती हैं.

वांदा – वांदा, वंदा अथवा बंदाल नाम की परोपजीवी वनस्पति प्रात: आम, पीपल, महुआ, जामुन आदि के पेड़ों पर देखी जाती हैं. इसके पतले, लाल गुच्छेदार फूल और मोटे कड़े पत्ते पीपल के पत्ते की बराबर होते हैं.

भरणी नक्षत्र में कुश का वांदा लाकर पूजा के स्थान पर रखने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं.

पुष्प नक्षत्र में इमली का वांदा लाकर दाहिने हाथ में बाँधने से कंपन के रोग में आराम मिलेगा.

मघा नक्षत्र में हरसिंगार सज वांदा लाकर घर में रखने से समृद्धि एवं सम्पन्नता में वृद्धि होती हैं.

विशाखा नक्षत्र में महुआ का वांदा लाकर गले में धारण करने से भय समाप्त हो जाता हैं. डरावने सपने नहीं आती हैं. शक्ति (पुरुषत्व) में वृद्धि होती हैं.

लटजीरा – देहातों में जंगल तथा घरों के आसपास बरसात में एक पौधा उगता हैं. यह लाल एवं श्वेत किसी भी रंग का हो सकता हैं.

लाल लटजीरा की टहनी से दातुन करने पर दांत के रोग से मुक्ति मिलेगी. तथा सम्मोहन की शक्ति में वृद्धि होगी.

लटजीरा की जड़ को जलाकर भस्म बना लें. उसे दूध के साथ पीने से संतानोत्पति की क्षमता आ जाती हैं.

सफ़ेद लटजीरा की जड़ रविपुण्य नक्षत्र में लाने के बाद उसे अपने पास रख लें, जिससे नर्वसनेस समाप्त होगी. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी.

लक्ष्मणा बूटी – देहात में इसे गूमा कहते हैं. वैधवर्ग इसे लक्ष्मण बूटी कहते हैं. श्वेत लक्ष्मण का पौधा ही तांत्रिक प्रयोग में लाया जाता हैं.

संतानहीन स्त्री, स्वस्थ एवं निरोगी हैं, तो वह श्वेत लक्ष्मण बूटी की २१ गोली बना ले, इसे गाय के दूध के साथ लगातार प्रात: एक गोली २१ दिन तक खाए, तो संतान लाभ मिलता हैं.

श्वेत लक्ष्मणा की जड़ को घिसकर तिलक नियमित रूप से लगाये, तो नर्वसनेस समाप्त होगी. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी.

मदार – मदार, मंदार, अर्क अथवा आक के नाम से प्राय: सभी इस पौधे से परिचित हैं. इसके पुष्प शिवजी को अर्पित किये जाते हैं. लाल एवं श्वेत पुष्प के मदार के पेड़ होते हैं. श्वेत पुष्प वाले मदार का तांत्रिक प्रयोग होता हैं.

रविपुष्प के दिन मदार की जड़ खोद लाए, उस पर गणेशजी की मूर्ति बनाये. वह मूर्ति सिद्ध होगी. परिवार के अनेक संकट मात्र मूर्ति रखे से ही दूर हो जायेंगे. यदि गणेशजी की साधना करनी हैं, तो उसके लिए सर्वश्रेष्ठ वह मूर्ति होगी.

रविपुष्प में उसकी जड़ को बंध्या स्त्री भी कमर में बंधे तो संतान होगी. रविपुष्प नक्षत्र में लायी गयी जड़ को दाहिने हाथ में धारण करने से आर्थिक समृधि में वृद्धि होती हैं.

धन-धान्य की कमी न हो

धन-धान्य की कमी न हो

हर व्यक्ति चाहता है कि वह सुख-शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जीए। कभी धन-धान्य की कमी न हो। इसके लिए वह दिन-रात मेहनत भी करता है। लेकिन इतना सब करने के बाद भी ऐसा नहीं हो पाता जैसा वह चाहता है। कुछ साधारण तांत्रिक उपाय करने पर जीवन को सुखी व शांतिपूर्ण बनाया जा सकता है।

- प्रतिदिन सुबह एक लौटे में पानी लेकर उसमें फूल, कुंकुम व चावल डालकर बरगद के पेड़ की जड़ में डालें तथा गाय को गुड़ व रोटी खिलाएं। ऐसा करने से आपके जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी।

- सूर्यास्त के समय रोज आधा किलो कच्चे दूध में 9 बूंदें शहद मिलाकर घर के सभी कमरों में छींटे और फिर चौराहे पर जाकर वह दूध रखकर लौट आएं। लौटते समय पीछे पलटकर न देंखे। 21 दिन तक यह टोटका करने से घर में जितनी भी नकारात्मक शक्तियां होती हैं स्वत: ही दूर चली जाती हैं और शांति का अनुभव होता है।

- प्रतिदिन सुबह नहाकर घर के प्रत्येक सदस्य के मस्तक पर चंदन का तिलक लगाने से भी परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती हैं तथा धन-वैभव बढ़ता है।

- किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष में शनिवार के दिन नाव की कील से बना लॉकेट गले में धारण करने से समस्त प्रकार के दोषों का नाश हो जाता है तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।

- शुक्रवार के दिन पीले कपड़े पर हल्दी की 7 साबूत गांठ, 7 जनेऊ, 7 लग्नमंडप की सुपारी, गुड़ की 7 डली तथा 7 पीले फूल रखें। इसके पश्चात धूप-दीप से पूजा करें तथा इसे बांधकर तिजोरी या जहां आप पैसे रखते हैं, वहां रख दें। निश्चय ही इस टोटके से धन-धान्य में वृद्धि होगी । 

बुरी नजर से बचाता है यह छोटा सा उपाय..


बुरी नजर से बचाता है यह छोटा सा उपाय..

आप भले ही इसे अंधविश्वास कहो या फिर टोटका मगर यह सच है कि बुरी नजर से बचने के लिए हमेशा से ही नजरबट्टू की शरण ली जा रही है। अधिकांश दुकानों के बाहर इसे टंगा देखा जा सकता है। और वह है - नींबू व हरी मिर्च से बना 
 नजरबट्टू।

नजरबट्‍टू बनाने के लिए एक धागे में एक नींबू व उसके साथ पांच या सात हरी मिर्च पिरो दी जाती है फिर इसे दुकानों के बाहर टांग दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि नींबू व हरी मिर्च को दुकान के बाहर टांग देने से किसी की बुरी नजर नहीं लगेगी और दुकानदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

मॉडर्न व पढ़े-लिखे लोग तक इस बात को मानते हैं कि बुरी नजर से बचने के लिए तो नजरबट्टू सबसे अच्छा तरीका है। इसलिए बाजार हो या महंगे शॉपिंग मॉल्स अधिकांश दुकानों के आगे नींबू व हरी मिर्च लटकते हुए मिल जाएंगे। ऐसा माना जाता है कि हरी मिर्च व नींबू लटकाने से कारोबार को बुरी नजर नहीं लगती है।

Sunday, May 20, 2012

ग्रहों के अनुसार करें ये उपाय, जल्दी होगा प्रमोशन

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा अपने काम के प्रति समर्पित रहते हैं। वे दिन-रात अपने काम में निखार लाने का प्रयत्न करते रहते हैं और उसमें सफल भी होते हैं लेकिन इसके बाद भी उन्हें प्रमोशन नहीं मिल पाता। जबकि कुछ लोग बिना कुछ किए ही प्रमोशन पा लेते हैं। कुछ ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कारण ऐसा हो सकता है। यदि आप प्रमोशन चाहते हैं तो नीचे लिखे उपाय कर उन ग्रहों को शांत करें, आपका भी प्रमोशन जल्दी होगा।

उपाय

- यदि शनि आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न कर रहा है, तो एक बर्तन में तिल्ली का तेल लेकर उसमें अपनी परछाई देखकर भिखारी को दान कर दें।

- यदि सूर्य के कारण बाधा हो तो प्रतिदिन पहली रोटी गाय को दें यदि गाय काली या पीली हो तो और भी शुभ रहता है।

- चन्द्र के कारण बाधा हो तो पिता को स्वयं जाकर दूध पिलाएं और उनकी सेवा करें।

- मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण बाधा हो तो घर में बुजुर्ग, महिलाओं का सम्मान करें और चांदी की अंगूठी या कड़ा पहनें।

- बुध ग्रह के कारण आपके प्रमोशन में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो किसी चांदी के आभूषण का दान करें।

- गुरु के प्रभाव के कारण तरक्की में बाधा उत्पन्न हो रही हो तो प्रतिदिन पीली गाय को गुड़-चने खिलाएं।

- यदि शुक्रग्रह के कारण आपको बाधा हो तो रोज घर की बुजुर्ग स्त्रियों के चरण स्पर्श करें।

- राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ  को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

- केतु का अशुभ प्रभाव हो तो रोज कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं।

पहनें इस रंग के कपड़े, हो जाएगी चट मंगनी-पट ब्याह



यदि काफी उम्र होने के बाद भी आपकी बिटिया की शादी नहीं हो पा रही है और अब रिश्ते आना भी बंद हो गए हैं तो भी आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि नीचे हम आपको बता रहे हैं इस समस्या का निदान कैसे संभव है।

उपाय

ज्योतिष के अनुसार हर रंग का व्यक्ति पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हर रंग एक विशेष देवता को प्रिय होता है। पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को अधिक प्रिय माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार जब तक देवगुरु बृहस्पति अनुकूल न हो,विवाह नहीं हो पाता है। जिस कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो उसे गुरुवार को पीले तथा शुक्रवार को सफेद वस्त्र पहनना चाहिए। ऐसा करने से उस कन्या के लिए विवाह प्रस्ताव आने लगते हैं और जल्दी ही उसका विवाह भी हो जाता है। यह उपाय करते समय मन में देवगुरु बृहस्पति के लिए श्रृद्धा भाव होना आवश्यक है।

करें इस मंत्र का जप, नहीं सताएगा दुश्मनों का डर

क्या आपके कई दुश्मन हैं जो हमेशा आपका अहित करने की सोचते रहते हैं। आपको हर समय यही डर सताता रहता है कि कहीं आपका कोई दुश्मन आपको नुकसान तो नहीं पहुंचा रहा। यदि ऐसा है तो नीचे लिखे मंत्र का विधिवत जप करने से आपको कभी भी दुश्मनों का भय नहीं सताएगा। यदि आपका कोई शत्रु आपका अहित करने का प्रयास करेगा भी तो वह सफल नहीं हो पाएगा।

मंत्र

मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशन।

शत्रून संहर मां रक्ष श्रियं दापय मे प्रभो।।


जप विधि-

- सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्म कर, नहाकर, साफ वस्त्र धारण करें।

- भगवान हनुमान का चित्र और हनुमान यंत्र सामने रख कर पूर्व दिशा में मुख करके आसन पर बैठ जाएं।

- शत्रु निवारण के लिए हनुमान यंत्र के सामने यह मंत्र पढ़ते हुए सिंदूर चढ़ाएं साथ ही गुड़ का भोग भी लगाएं।

- मंत्र जप के समय मूंगे की माला या लाल हकीक की माला का प्रयोग करें।

जानिए, पीपल का पेड़ आपको कैसे बना सकता है धनवान

हिंदू धर्म में पीपल के वृक्ष को बहुत ही पवित्र माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जिसके घर में पीपल का वृक्ष होता है, उसके घर कभी दरिद्रता नहीं आती और सुख-शांति बनी रहती है। विज्ञान ने भी पीपल के वृक्ष के महत्व को माना है। यहां हम आपको बता रहे हैं पीपल के वृक्ष से जुड़े कुछ तंत्र उपाय, जिससे आपकी कई समस्याओं का निदान हो जाएगा।

उपाय

शनि दोष से बचने के लिए

शनि दोष निवारण के लिए भी पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। यदि रोज पीपल पर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है। शनिवार की शाम पीपल के नीचे दीपक लगाएं और पश्चिममुखी होकर शनिदेव की पूजा करना और भी लाभकारी होता है।

धन प्राप्ति के लिए

पीपल के पेड़ के नीचे शिव प्रतिमा स्थापित करके उस पर प्रतिदिन जल चढ़ाएं और पूजन-अर्चन करें। कम से कम 5 या 11 माला मंत्र का जप(ऊँ नम: शिवाय) करें। कुछ दिन नियमित साधना के बाद परिणाम आप स्वयं अनुभव करेंगे। प्रतिमा को धूप-दीप से शाम को भी पूजना चाहिए।

हनुमानजी की कृपा पाने के लिए

हनुमानजी की कृपा पाने के लिए भी पीपल के वृक्ष की पूजा करना शुभ होता है। पीपल के वृक्ष के नीचे नियमित रूप से बैठकर हनुमानजी का पूजन, स्तवन करने से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और साधक की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

बहुत तेज होता है गुस्सा इन लोगों का, नाम के पहले अक्षर से पहचानिए..


जिन लोगों के नाम का पहला अक्षर ई, उ, ए, ओ, वा, वि, वू, वे, वो से शुरू होता है वे वृष राशि वाले माने जाते हैं। इस राशि का चिन्ह बैल है। बैल स्वभाव से ही अधिक परिश्रमी और अधिक वीर्यवान होता है। साधारणत: वह शांत रहता है किन्तु क्रोध आने पर वह उग्र रूप धारण कर लेता है। यह स्वभाव वृष राशि के जातक में भी पाया जाता है। वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। इसके अन्तर्गत कृत्तिका नक्षत्र के तीन चरण, रोहिणी के चारों चरण और मृगशिरा के प्रथम दो चरण आते हैं।

इस राशि के लोगों को पिता-पुत्र का कलह सहन करना पड़ता है। जातक का मन सरकारी कार्यों की ओर रहता है। सरकारी ठेकेदारी का कार्य करवाने की योग्यता रहती है। पिता के पास जमीनी काम या जमीन के द्वारा जीविकोपार्जन का साधन होता है। वृष राशि के अधिकतर लोग शराब और मांसाहार  भोजन में अपनी रूचि को प्रदर्शित करता है।

गुरु का प्रभाव जातक में ज्ञान के प्रति अहम भाव को पैदा करने वाला होता है, वह जब भी कोई बात करता है तो गर्व की बात करता है। सरकारी क्षेत्रों की शिक्षाएं और उनके काम व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यदि इनकी कुंडली में किसी प्रकार से केतु का बल भी मिल जाता है तो व्यक्ति सरकार का मुख्य सचेतक बनने की योग्यता रखता है। मंगल के प्रभाव से व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का हो सकता है। कल-कारखानों का संचालन, स्वास्थ्य कार्यों और जनता के झगड़े सुलझाने का कार्य जातक कर सकता है। इनकी माता को कई प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। ये अधिक सौन्दर्य बोधी और कला प्रिय होते हैं। जातक कला के क्षेत्र में नाम करता है। वृष राशि के लोग अपने जीवन साथी के अधीन रहना पसंद करता है। ये उत्तम श्रेणी के प्रेमी होते हैं।

इन लोगों को चन्द्र-बुध के प्रभाव से संतान के रूप में कन्या प्राप्त होने के अधिक योग रहते हैं। जीवन में व्यापारिक यात्राएं काफी होती हैं। कभी-कभी व्यक्ति अपने ही बनाए हुए उसूलों पर जीवन चलाता है, वह मकड़ी जैसा जाल बुनता रहता है और अपने ही बुने जाल में फंस जाता है। रोहिणी के चौथे चरण के मालिक चन्द्र-चन्द्र है, जातक के अन्दर हमेशा उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है, वह अपने ही मन का राजा होता है।

यदि इन लोगों की कुंडली में मंगल-सूर्य की युति हो तो व्यक्ति अपने शरीर से दुबले-पतले और गुस्सेवाले हो सकते हैं। इन लोगों में आदेश देने की प्रवृत्ति होती है। जातक अगर राज्य में किसी भी विभाग में काम करते हैं तो सरकारी सम्पत्ति को किसी भी तरह से क्षति नहीं होने देते। मंगल-बुध जातक के अन्दर कभी कठोर और कभी नर्म भावनाएं पैदा करते हैं। इनका मन कम्प्यूटर और इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र की ओर होता है। वृष राशि वाले जातक शांति पूर्वक रहना पसंद करते हैं।

Thursday, April 26, 2012

इस दिशा में वास्तु दोष हो तो संभव है अकाल मृत्यु

भूखण्ड के नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) दिशा में मार्ग हो तो भवन नैऋत्य मुखी होता है। नैऋत्य दिशा का स्वामी राक्षस तथा प्रतिनिधि गृह राहु है। नैऋत्य दिशा स्वयं के व्यवहार व आचार-विचार के लिए उत्तरदायी है। इसमें वास्तु दोष रखना अकाल मृत्यु को बुलावा देना है। ऐसे भूखण्ड पर निर्माण करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए-

1- नैऋत्य दिशा सदैव ऊंची एवं भारी बनाएं, इस दिशा में भवन का भाग ऊंचा व भारी रखें जिससे अन्य दिशाओं का जल इस ओर न आए।

2- नैऋत्य दिशा शुद्ध रखने पर ही भाग्य वृद्धि होगी।

3- यदि भवन के स्वामी ने ईशान व नैऋत्य दिशा को शुद्ध कर लिया तो समझ लें उसने भाग्य व भोग के सभी साधन जुटा लिए हैं।

4- ऐसा नैऋत्य मुखी भूखण्ड कभी न खरीदें जिसमें खाई, गड्ढा या भराव की आवश्यकता हो।

5- नैऋत्य दिशा में भूखण्ड के आसपास ऊंचे वृक्ष हों तो उन्हें कटवाना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर धन हानि होगी।

6- नैऋत्य दिशा में ऊंचा चबूतरा बनाना उन्नतिकारक है।

7- नैऋत्य दिशा का भाग ऊंचा रखना यश, समृद्धि व धन कारक है।

8- मुख्य द्वार पश्चिम में और कुआं ईशान दिशा में बनाना शुभ है।

9- नैऋत्य दिशा में स्नानागार व शौचालय न बनवाएं।

Sunday, April 1, 2012

बगलामुखी महामंत्रम

बगलामुखी महामंत्रम
     बगलमुखी की पूजा पीतांबरा विध्या के रूप में प्रसिध्द् हैं|(इनकी पूजा में प्रमुखता से पीले रंग का उपयोग किया जाता है)|इनकी पूजा से शत्रुओं से रक्षा तथा उन्हें परास्त करने,कोर्ट केश मे विजयी दिलाने,धनार्जन,ऋण से मुक्ति तथा वाक्-चातुर्य की शक्ति का प्राप्ति होता है|
     इनकी पूजा पीले वस्त्र,हल्दी से बने माला,पीले आसन और पीले पुष्प का उपयोग किया जाता है|यह पीठासीन देवी हैं जो अपनी दिव्य शक्तिओं से असुरों को विनाश करतीं हैं|उनका निवास अमृत की सागर के मध्य है,जहॉ उनके निवास स्थान को हीरों से सजाया गया है तथा उनका सिंहासन् गहनों से जड़ित है|
     उनके आकृति से स्वर्ण आभा आती है|वह पीले परिधान,स्वर्ण आभूषण तथा पीला माला धारण करतीं हैं|उनके वाएँ हाथ मे शत्रु के जीभ और दाहिने हाथ मे गदा है|इनकी उत्पत्ति के बारे मे एक कहानी का वर्णन किया गया है|सतयुग मे एक् बार पूरी सृष्टि भयानक चक्रवात मे फँसी थी,तब भगवान विष्णु संपूर्ण मानव जगत के सुरक्षा हेतु सॉराष्ट् मे स्थित हरिद्रा सरोवर के पास देवी भगवती को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगें|
     श्रीविधा उनके सम्मुख हरिद्रा सरोवर के जल से स्वर्ण आभा लिए प्रकट हुई|उन्होनें सृष्टि विनाशक तूफान को नियंत्रित कीं तथा सृष्टि को बर्वाद होने से बचाई|
     देवी बगलामुखी प्रकृति में अतिचार करने वाली बुरी शक्तियों को नियंत्रित करने मे सहायता करती हैं|वह हमारी वाक् ज्ञान और गति को नियंत्रित करने मे मदद करती हैं|वह अपने भक्तों को शक्ति और सिद्दि देती हैं तथा सभी ईच्छाओं की पूर्ति करती हैं,जैसा-कि उन्होने अपने भक्त 'कल्पतरू' को दिए|
!!ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं
स्तम्भय जिह्वां किलय बुध्दिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा!!
बगलामुखी महामंत्र का अर्थ इस प्रकार हैं-
हे देवी मेरे सारे दुश्मनों को बेवस और लाचार कीजिए.उनके बुध्दि और गति को नष्ट कीजिए.
ध्यान देः- बिना सही निर्देश और सहायता के बगलामुखी मंत्र का उच्चारण ना करें.इस साधना के पहले बगलामुखी दीक्षा ले लें.

Thursday, March 22, 2012

इसे पहनने से हो सकता है आपका प्रमोशन

अगर लंबे समय से किसी कंपनी में काम रह हैं और आपका प्रमोशन नहीं हो रहा है तो आप बिल्कुल भी निराश न हों क्योंकि हम आपको एक ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसके करते ही धीरे-धीरे आपके प्रमोशन के योग बनने लगेंगे।

ज्योतिष के अनुसार प्रमोशन के लिए गणेश रुद्राक्ष धारण करना एक बहुत ही सरल उपाय है। जिन लोगों को लगातार करियर में रुकावटें आ रही है या व्यापार में घाटा हो रहा है, तो ऐसे लोगों के लिए गणेश रुद्राक्ष धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। स्मरण शक्ति में वृद्धि , प्रमोशन व व्यवसायिक योजनाओं में सफलता के लिए गणेश रुद्राक्ष बहुत लाभदायक होता है। इस रुद्राक्ष के बीच से तार निकालकर और दोनों और चांदी का आवरण चढ़ाकर इसे लाल धागे में पहनने से प्रमोशन व व्यापार में आ रही रुकावटें शीघ्र ही दूर हो जाती हैं।

Monday, February 27, 2012

सुखी होगा दांपत्य जीवन

पति-पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। यानी एक-दूसरे के बिना वे अधूरे हैं। इसके बाद भी पति-पत्नी में विवाद होते रहते हैं। कई बार विवाद काफी बड़ भी जाते हैं। गुप्त नवरात्रि में कुछ साधारण उपाय करने से दाम्पत्य जीवन में आ रही परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

उपाय



- यदि जीवनसाथी से अनबन होती रहती है तो गुप्त नवरात्रि में नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार अग्नि में घी से आहुतियां दें। इससे यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। अब नित्य सुबह उठकर पूजा के समय इस मंत्र को 21 बार पढ़ें। यदि संभव हो तो अपने जीवनसाथी से भी इस मंत्र का जप करने के लिए कहें-

सब नर करहिं परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

- गुप्त नवरात्रि के दौरान यदि रोज सुबह-शाम यदि घर में शंख बजाया जाए अथवा गायत्री मंत्र का जप करें गृहक्लेश समाप्त हो जाता है।

चाहिए मनचाही दुल्हन तो आज ये उपाय करें

गुप्त नवरात्रि में की गई पूजा विशेष फलदाई रहती है। यदि आप चाहते हैं कि आपका विवाह आपकी मनचाही लड़की से हो तो नीचे लिखा उपाय करें। आपकी मनोकामना जरुर पूरी होगी।

उपाय

नवरात्रि के दौरान जो भी सोमवार (30 जनवरी) आए। उस दिन सुबह किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर चढ़ाते हुए उसे अच्छी तरह से साफ करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं और पूरे मंदिर में झाड़ू लगाकर उसे साफ करें। अब भगवान शिव की चंदन, पुष्प एवं धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करें। रात्रि 10 बजे के पश्चात अग्नि प्रज्वलित कर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए घी से 108 आहुति दें। अब 40 दिनों तक नित्य इसी मंत्र का पांच माला जप भगवान शिव के सम्मुख करें। इससे शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी और आपको मनचाही दुल्हन मिलेगी।

चाहते हैं कोर्ट केस जीतना तो यह टोटका करें

क्या आपका कोई कोर्ट केस लंबे समय से चल रहा है जिसके कारण आप अक्सर परेशान रहते हैं तो अब आपको कोर्ट केस को लेकर परेशान होने की जरुरत बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि नीचे लिखे एक साधारण उपाय करने से कोर्ट केस का फैसला आपके पक्ष में हो सकता है। यह उपाय करते समय मन में पूर्ण श्रृद्धा का होना बहुत जरुरी है।

टोटका

मंगलवार के दिन से शुरु करके हर रोज शाम को चार-पांच बजे के करीब गेहूं की रोटी के चूरे में देशी घी और चीनी मिलाकर कौओं को खिलाएं। ऐसा तबतक करते रहें जब तक कि मुकद्मा चलता रहे। तारीख वाले दिन उन्हीं कौओं में से किसी का एक पंख अपनी दाईं तरफ की जेब में डालकर अदालत में हाजिर हों। इसके प्रभाव से केस का फैसला आपके पक्ष में हो जाएगा। जब मुकद्मा जीत जाएं तो कौओं को रोटी खिलाने का प्रयोग कम से कम एक हफ्ते तक और करते रहें।

जल्दी हो जाएगी शादी

वर्तमान समय में समय पर विवाह न हो पाना एक आम समस्या बन चुकी है। इसके कई कारण हो सकते हैं। जैसे-जैसे विवाह योग्य युवक-युवती की उम्र बढ़ती जाती है। माता-पिता की चिंता भी बढ़ती जाती है। इस समस्या के निदान के लिए यदि नीचे लिखा छोटा सा उपाय किया जाए तो अतिशीघ्र विवाह हो जाता है। उपाय इस प्रकार है-

उपाय

विवाह योग्य युवक-युवती शुक्रवार के दिन भगवान शंकर के मंदिर में जाकर जलाभिषेक करें यानी जल चढ़ाएं। इसके बाद 108 आंकड़े के फूल चढ़ाते हुए ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप मन ही मन में करें। इसके बाद 21 बेलपत्र चढ़ा कर शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करें। यह उपाय कम से कम 7 शुक्रवार तक नियमित रूप से करें तो जल्दी ही विवाह संपन्न हो जाता है।




यदि आप चाहती हैं कि आपको मनचाहा पति मिले तो इसके लिए आपको रामचरित मानस की नीचे लिखी चौपाई का विधि-विधान से जप करना होगा। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने ऐसी कई चौपाइयां लिखी हैं जिनका जप करने से मनुष्य की कई परेशानियां समाप्त हो जाती हैं। उन्हीं में से एक चौपाई यह भी है, जिसका जप करने से मनचाहा वर प्राप्त होता है। यह चौपाई बालकाण्ड में सीताजी के गौरी पूजन प्रसंग की है।



चौपाई

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।

जप विधि

- सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन करें।

- इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें।

- तत्पश्चात रुद्राक्ष की माला से ऊपर लिखी चौपाई का जप करें। कम से कम 5 माला जप अवश्य करें।

- इस प्रकार प्रतिदिन इस चौपाई का जप करने से मनचाहा वर प्राप्त होता है।




जानिए, कैसे लोगों को दिखाई देते हैं भूत-प्रेत

हमारे आस-पास कई ऐसी अदृश्य शक्तियां उपस्थित रहती है जिन्हें हम देख नहीं पाते। यह शक्तियां नकारात्मक भी होती है और सकारात्मक भी। सिर्फ कुछ लोग ही इन्हें देख या महसूस कर पाते हैं। राक्षस गण वाले लोगों को भी इन शक्तियों का अहसास तुरंत हो जाता है। ऐसे लोग भूत-प्रेत व आत्मा आदि शक्तियों को तुरंत ही भांप जाते हैं।

क्या हैं राक्षस गण?

राक्षस गण, यह शब्द जीवन में कई बार सुनने में आता है लेकिन कुछ ही लोग इसका मतलब जानते हैं। यह शब्द सुनते ही मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा भय भी उत्पन्न होने लगता है और हमारा मन राक्षस गण वाले लोगों के बारे में कई  कल्पनाएं भी करने लगता है। जबकि सच्चाई काफी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रत्येक मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है। मनुष्य गण, देव गण व राक्षस गण।

कैसे पहचाने गण को?

कौन सा व्यक्ति किस गण का है यह कुंडली के माध्यम से जाना जा सकता है। मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।

इन छोटे उपायों से भी दूर हो सकता है वास्तु दोष

वास्तु न सिर्फ आपके घर को बल्कि आपके जीवन को भी प्रभावित करता है। जीवन में आने वाली परेशानियों का कारण घर का वास्तु दोष भी हो सकता है। नीचे लिखे कुछ सरल उपाय कर इन वास्तु दोषों को दूर किया जा सकता है-

1- डाइनिंग हॉल की दीवारों पर फल-फूलों व प्राकृतिक दृश्यों के अच्छे चित्र लगाए जा सकते हैं।

2- अनुपयोगी वस्तुएं घर में न रखें। उन्हें घर से निकालते रहें।

3- यदि जनरेटर सेट अथवा इन्वर्टर ईशान में हो तो उसे वहां से हटाकर आग्नेय कोण में स्थापित करें।

4- स्वस्तिक, मंगल कलश, ओम, 786 आदि मंगल चिन्हों की तस्वीरें घर  में अवश्य लगाएं। इनसे घर में सुख-शांति बढ़ती है।

5- पूर्वजों के चित्र, देवी-देवताओं के साथ कभी न लगाएं।

6- शयन कक्ष में सदैव सुंदर, कलात्मक फूलों या हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें लगाने से नींद भी बेहतर आती है।

7- डाइनिंग हॉल की दीवारों का रंग हल्का व शांत व शीतलता प्रदान करने वाला हो। भारी सजावट से भी बचें।