Thursday, February 14, 2019

धनवान बनने का योग

🏵️ ।।धनवान बनने का योग ।।🏵️

यदि आप धनवान बनने का सपना देखते हैं, तो अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें।

१ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है।

२ मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है।

३ जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है।

४ शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं।

५ जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं।

६ दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है।

७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है।

८ सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने।

९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है।

१० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है।

११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है।

१२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है।

१३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है।

१४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बनाता है

१५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है।

१६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है।

१७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है।

१८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है।

१९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है।

२० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।

*विकास नागपाल*
_ज्योतिष एवं वास्तु सलाहकार_
🎄 *सुकृति एस्ट्रो वास्तु रिसर्च सेंटर*🎄
_समस्या आपकी समाधान हमारे_
करनाल ।
9215588984

वास्तुशास्त्र में ईशान कोण

वास्तुशास्त्र में ईशान कोण का काफी महत्व है। इसे भगवान शंकर का दिशा जोन भी कहा जाता है। इस दिशा जोन को मानसिक स्पष्टता, निर्णय लेने की क्षमता और पूजा स्थल के नाम से भी हम जानते हैं। मस्तिष्क कैसे काम करता है और कैसे उसकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है, ये सब इसी दिशा में पर निर्धारित होता है। इस दिशा जोन का रंग नीला/काला होता है तथा यहां का तत्व मुख्यता जल है। हालांकि यहां पर अग्नि तत्व भी पूर्व की तरफ के हिस्से में प्रबलता से पाया जाता है।
इस देवता का है प्रमुख स्थान
वास्तु देवता यहां पर प्रमुखता से निवास करते हैं। राक्षसों की माता दिति का यहाँ पर मुख्य स्थान है। दिति ऋषि कश्यप की पत्नी थी। उत्तर दिशा के आठवें द्वार को दिति ही निर्धारित करती हैं। (हर दिशा में मुख्यता ८ द्वार होते हैं) बायीं आँख की सेहत और  दूरदृष्टि  यहीं  से निर्धारित होती है  तथा मन की द्विविद्ता (Duality) या द्वैतवाद यहीं पर दूर होते हैं। अगर घर में द्वार यहाँ पर हो तो महिलाओं का घर में वर्चस्व ज़्यादा होता है। दूसरे वास्तु देवता यहां पर शिखी हैं जिनका तत्त्व अग्नि है।  इसी को भगवा  शिव की तीसरी आँख भी कहा जाता है। यहां घर या भवन का पूर्व दिशा की और पहला द्वार भी होता है। मन के सब विचार, नए भाव तथा समझ यहीं पर पैदा होते हैं। यहां द्वार होने से घर में दुर्घटना अथवा आग लगने का ख़तरा रहता है।  

इन बातों का रखें विशेष ख्याल
इस दिशा जोन में कभी भी शौच, सेप्टिक टैंक्स, पानी की टंकी, सीढ़ियां, स्टोर, रसोई आदि का निर्माण नहीं करना चाहिए क्यूंकि इस से मानसिक परेशानी बढ़ती है तथा मस्तिष्क से सम्बंधित रोग होते हैं।  इनसे आपकी निर्णय लेने की क्षमता में रुकावट आती है तथा नकारात्मक सोच का निर्माण होता है। गृहणी के लिए तो ये ख़ास तौर से बहुत कष्टप्रद होता है। यहां की दीवारों पर लाल, गहरा लाल, गुलाबी तथा बैंगनी रंगो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

नहीं होनी चाहिये ये चीजें
उत्तर पूर्व दिशा चुंबकीय और सौर ऊर्जा का मिलान स्थल है इसलिए ये भगवान शंकर का भी स्थान है। इसलिए इस स्थान पर ये सरंचनाएं नहीं होने चाहिए —
•    स्टोर
•    सीढ़ियां
•    छत पर पानी की टाकी
•    शौचालय
•    रसोई
•    सीवर लाइन्स और नालियां
•    बिजली के भरी यंत्र, उपकरण और बिजली के बोर्ड्स
•    भारी  मशीनरी
•    भारी निर्माण

इन उपायों से मिलेगा शुभ फल
1. बच्चे इस दिशा की और देख कर पढ़ाई करें, इस से उन्हें लाभ होगा।
2.  नव वर-वधू को इस स्थान पर बने कमरे में कभी भी नहीं सोना चाहिए क्यों कि इस से वैवाहिक जीवन में बाधा पड़ती है तथा तलाक़ होने के खतरे बढ़ जाते हैं। 
3. गृहणियों को यहाँ पर गैस के नीचे पीले रंग का संगमरमर का पत्थर रखना चाहिए। 
4. इस स्थान पर हमेशा छोटा सा मंदिर बनाएं। 
5. इस दिशा जोन में कभी भी सीढ़ी, स्टोर या शौचालय न बनायें। इस से मस्तिष्क से सम्बंधित बीमारी होने की सम्भावना हो सकती है जैसे कि पैरालिसिस।
6.  इस दिशा जोन  में लाल, गुलाबी  और बैंगनी रंगो का दीवारों पर इस्तेमाल न करें।  इस रंग की वस्तुएं भी यहाँ से हटा कर दक्षिण पूर्व दिशा जोन में रख दें।  यहाँ पर ज़्यादा करके बिजली के उपकरण  भी न रखें।  इस दिशा जोन में हलके क्रीम कलर या नीले रंग का इस्तेमाल करें।

Thursday, March 23, 2017

कबूतर को दाना खिलाने से पुण्य प्राप्ति

कबूतर को दाना खिलाने से पुण्य प्राप्ति

सभी परिंदें बहुत ही चंचल और मासूम होते है लेकिन कबूतर चंचल कम और मासूम ज्यादा होता है. आराम करने के लिए ऐतिहासिक इमारतें और ऊँचे स्मारक उन्हें बहुत ज्यादा पसंद है. कबूतरों को दाना खिलाना लोगों को बहुत ही अच्छा लगता है, लेकिन इसकी बीट से भी लोग उतने ही परेशान रहते है. कबुअर को शांति का प्रतीक माना गया है, साथ ही कबूतर अपने जीवनसाथी के लिए बहुत ही ईमानदार होता है.

छत पर ना डाले दाना 
 कबूतर को दाना डालना एक पुण्य का काम है. लेकिन इसमें कुछ सावधानी रखनी चाहिए,आपने शायद कभी सुना भी होगा कि घर की छत पर कबूतर को दाना न डालकर,अपने आँगन में या घर के बाहर दाना डालें. लेकिन छत पर दाना बिल्कुल भी न डालें।

बुध और राहू की युति 
ज्योतिष के अनुसार जिस व्यक्ति की कुंडली में बुध और राहू का मेल होता है, तो वहाँ की स्थिति खराब हो जाती है और अगर जन्मकुंडली में ही बुध और राहू का मेल खराब हो तो फिर तो पूछों ही मत इन्सान का हाल पागलों की तरह हो जाता है और व्यक्ति उल्टी हरकतें करने लगता है.व्यक्ति इतना पागल हो जाता है कि वो इस अवस्था में कोई भी बड़ा अपराध कर बैठता है और जेल तक भी जा सकता है. ऐसे में व्यक्ति अपनी हरकतों से बुध और राहू को एक कर दें या फिर इनको और भी खराब कर दें,तो उसका नतीज़ा बुरा ही मिलेगा. 

कबूतर को क्यों डाले दाना
कबूतर को दाना खिलाने का क्या कारण है इस बात को पूछने पर ज्योतिष ने बताया है कि कबूतर माँ लक्ष्मी के भक्त होते है. घर में कबूतरों का वास होने से लक्ष्मी की वृद्धि होती है और सुख शांति में भी वृद्धि होती है. अगर किसी कारण से समय पर उनका दाना नहीं डाला जाता है. तो दाने के लिए उनका शोर अपने आप ही शुरू हो जाता है. 

 छत पर दाना क्यों ना डालें
 ज्योतिष के अनुसार कबूतर तो है बुध और छत है राहू अब ऐसे में लोग जब अपनी छत पर दाना डालते है, तो कबूतर छत पर दाना खाने के लिए आते है. इसके द्वारा बुध और राहू का मेल हो जाता है.लेकिन कबूतर तो दाना खाकर चलें जाते है ये कोई परेशानी की बात नहीं है.लेकिन परेशानी की बात तब शुरू होती है. जब वहाँ कबूतर आते है तो छत को गन्दी भी तो कर देते है और छत का मतलब राहू है अगर राहू खराब हो जाएगा तो उसका रिजल्ट बुरा ही मिलेगा. ये तो इसका कारण हो गया कि इसलिए छत पर दाना नहीं डालना चाहिए।

विकास नागपाल
ज्योतिष एवं वास्तु सलाहकार
सुकृति एस्ट्रो वास्तु रिसर्च सेंटर
करनाल ।
9215588984

Friday, December 16, 2016

ज्योतिष में मंगल

ज्योतिष में मंगल
ज्योतिष में मंगल नवग्रहों में अपनी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है मंगल को हिम्मत शक्ति पराक्रम, उत्साह, बल, प्रतिस्पर्धा की क्षमता, स्पोर्ट्स, अग्नि, रक्त मांसपेशिया आदि का कारक माना गया है और इन घटकों का नियंत्रक होने से मंगल की हमारी जन्मकुंडली में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पर स्त्रियों की जन्म-कुण्डली में "मंगल" कहीं अधिक विशेष भूमिका निभाता है नाड़ी ज्योतिष के गूढ़ नियमों में मंगल को स्त्रियों के लिए पति और पति सुख का कारक ग्रह माना गया है और स्त्रियों के लिए विशेष रूप से मंगल ही उनके वैवाहिक जीवन की स्थिति को नियंत्रित करने वाला ग्रह होता है और स्त्रियों की कुंडली में मंगल ही उनके माँगल्य और सौभाग्य का कारक होता है अतः स्त्रियों की कुण्डली में मंगल की बली या निर्बल स्थिति ही उनके पति सुख और वैवाहिक जीवन की शुभता या संघर्ष को निश्चित करती है।

स्त्री की कुण्डली में मंगल का बलवान होना जहाँ अच्छा पति सुख और वैवाहिक जीवन देता है तो वहीँ मंगल पीड़ित या कमजोर होने पर विवाह में विलब, पति सुख और वैवाहिक जीवन में बहुत सी समस्याएं और उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। स्त्री की कुंडली में मंगल यदि स्व उच्च राशि (मेष, वृश्चिक, मकर) में हो, केंद्र (1,4,7,10) त्रिकोण (1,5,9) आदि शुभ भावों में हो और पाप प्रभाव से मुक्त हो तो ऐसे में अच्छा पति सुख और वैवाहिक जीवन प्राप्त होता है दीर्घ काल तक माँगल्य और सौभाग्य बना रहता है, पर स्त्री की कुण्डली में मंगल यदि नीच राशि (कर्क) में हो, दुःख भाव (6,8,12) में हो विशेषकर आठवे भाव में हो, मंगल, राहु या शनि के साथ होने से पीड़ित हो या मंगल पर राहु या शनि की दृष्टि हो तो ऐसे में पति सुख बाधित होता है और वैवाहिक जीवन में संघर्ष और समस्याओं की स्थिति उत्पन्न होती है, पति का स्वास्थ बाधित और जीवन संघर्षमय रहता है,  स्त्रियों की कुंडली में मंगल का पीड़ित होना विवाह में विलम्ब का भी कारण बनता है, यदि स्त्री की कुंडली में पीड़ित मंगल पर बलवान बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो वैवाहिक जीवन की समस्याओं का कोई ना कोई समाधान मिल जाता है और बाधायें बड़ा रूप नहीं लेती।

कुण्डली में मंगल पीड़ित होने पर यदि पति सुख और वैवाहिक जीवन बाधित हो रहा हो तो निम्न उपाय करना लाभदायक होगा -

1. ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।

2. प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।

3. ताम्र पत्र का बना "मंगल यन्त्र" अपने पूजास्थल में स्थापित करके उसकी उपासना करें।

4. किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बाद यदि आपके लिए शुभ हो तो 'मूँगा' भी धारण कर सकती हैं।

।। श्री हनुमते नमः।।

ज्योतिष विज्ञान में गंड मूल नक्षत्

ज्योतिष विज्ञान में गंड मूल नक्षत्र

27 नक्षत्रों में 6 नक्षत्र- अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, अश्विनी, मूल तथा रेवती नक्षत्रों को गंड मूल नक्षत्र के नाम से जाना जाता है। इन नक्षत्रों में जन्म होने पर 27 दिनों के पश्चात जब वही नक्षत्र आता है। तब मूल शांति करायी जाती है। ज्योतिष विज्ञान में मूल नक्षत्र में जन्मे बालक को पिता के लिये कष्टकारी बताया गया है। यदि शांति नहीं करायी जाय तो बच्‍चा बीमार रहता है, लेकिन प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते है। बालक का जन्म नक्षत्र के किस चरण में हुआ है यह जानना अतिआवश्यक है, क्योंकि उक्त नक्षत्रों के सभी चरण अशुभ नहीं होते है वरन शुभ व फलदायी भी होते हैं। यदि बालक का जन्म शुभ चरण में हुआ है तो बालक धन, पद, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य से परिपूर्ण होता है। 

नक्षत्रों के निम्न चरणों में भेद का फलः 

अश्विनी

प्रथम चरण - पिता को कष्ट तथा भय रहेगा

द्वितीय चरण - सुख सम्पत्ति में वृद्धि होगी

तृतीय चरण - राजकीय कार्यो में विजय तथा नौकरी में प्रगति होगी

चतुर्थ चरण - धन का लाभ तथा परिवार में कोई मांगलिक कार्य होगा

अश्लेषा

प्रथम चरण - शांति कराने से शुभ फल प्राप्त होगा

द्वितीय चरण - अचानक धन की हानि हो सकती है

तृतीय चरण - माता के लिये अनिष्टकारी रहेगा

चतुर्थ चरण - पिता के धन का अपव्यय होगा एंव बच्चों की शिक्षा में व्यवधान आयेगा

मघा 

प्रथम चरण - माता के लिये कष्टकारी रहेगा

द्वितीय चरण - पिता के लिये अनिष्टकारी रहेगा

तृतीय चरण - सुख व समृद्धि आयेगी

चतुर्थ चरण - परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी तथा भौतिक संसाधनों में वृद्धि होगी

ज्येष्ठा 

प्रथम चरण - बड़े भाई के लिये अनिष्टकारी रहेगा

द्वितीय चरण - छोटे भाई के लिये अशुभ प्रतीत होगा

तृतीय चरण - माता को मानसिक व शारीरिक पीड़ा रहेगी

चतुर्थ चरण - स्वंय को शारीरिक कष्ट रहेगा

मूल 

प्रथम चरण - पिता को शारीरिक कष्ट तथा धन की हानि होगी

द्वितीय चरण - माता को शारीरिक कष्ट रहेगा

तृतीय चरण - धन का व्यय तथा आपस में विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होगी

चतुर्थ चरण - शांति कराने से लाभ होगा

रेवती 

प्रथम चरण - राज्य से सम्मान तथा परिवार में धन का आगमन

द्वितीय चरण - परिवार में वैभव तथा प्रसन्नता रहेगी

तृतीय चरण - नौकरी व व्यवसाय में लाभ होगा। मन प्रसन्नचित्त रहेगा

चतुर्थ चरण - विविध प्रकार के कष्ट आ सकते हैं

मूल नक्षत्र 

मूल नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र के अन्तर्गत आता है। यह नक्षत्र बहुत ही अशुभ माना जाता है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु होता है। इस नक्षत्र के चारों चरण धनु राशि में होते हैं। इस नक्षत्र के विषय में यह धारणा है कि जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं उनके परिवार के सदस्यों को इसके दोष का सामना करना पड़ता है। दोष पर विशेष चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति में कई गुण होते हैं, हमें इन गुणों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 

ज्योतिषशास्त्र कहता है जो व्यक्ति मूल नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे ईमानदार होते हैं। इनमें ईश्वर के प्रति आस्था होती है। ये बुद्धिमान होते हैं। ये न्याय के प्रति विश्वास रखते हैं। लोगों के साथ मधुर सम्बन्ध रखते हैं और इनकी प्रकृति मिलनसार होती है। स्वास्थ्य के मामले में ये भाग्यशाली होते हैं, ये सेहतमंद होते हैं। ये मजबूत व दृढ़ विचारधारा के स्वामी होते हैं। ये सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं। ये अपने गुणों एवं कार्यो से काफी प्रसिद्धि हासिल करते हैं। 

मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति के कई मित्र होते हैं क्योंकि इनमें वफादारी होती है। ये पढ़ने लिखने में अच्छे होते हैं तथा दर्शन शास्त्र में इनकी विशेष रूचि होती है। इन्हें विद्वानों की श्रेणी में गिना जाता है। ये आदर्शवादी और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति होते हैं अगर इनके सामने ऐसी स्थिति आ जाए जब धन और सम्मान मे से एक को चुनना हो तब ये धन की जगह सम्मान को चुनना पसंद करते हैं। 

जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे व्यवसाय एवं नौकरी दोनों में ही सफल होते हैं, परंतु व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी करना इन्हें अधिक पसंद है। ये जहां भी होते हैं अपने क्षेत्र में सर्वोच्च होते हैं। ये शारीरिक श्रम की अपेक्षा बुद्धि का प्रयोग करना यानी बुद्धि से काम निकालना खूब जानते हैं। 

अध्यात्म में विशेष रूचि होने के कारण धन का लोभ इनके अंदर नहीं रहता। ये समाज में पीड़ित लोगों की सहायता के लिए कई कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लेते हैं। समाज में इनका काफी सम्मान होता है तथा ये प्रसिद्ध होते हैं। इनका सांसारिक जीवन खुशियों से भरा होता है। ये सुख सुविधाओं से युक्त जीवन जीने वाले होते हैं। समाज के उच्च वर्गों से इनकी मित्रता रहती है। 

ये ईश्वरीय सत्ता में हृदय से विश्वास रखते हैं। इस नक्षत्र के जातक को मूल शांति करा लेनी चाहिए, इससे उत्तमता में वृद्धि होती है और अशुभ प्रभाव में कमी आती है। 

Friday, September 23, 2016

वास्तु टिप्स – घर के पुराने सामानों का आप पर प्रभाव

वास्तु टिप्स – घर के पुराने सामानों का आप पर प्रभाव

आध्यात्मिक, योग, असि—मसि—कृषि, कला, ज्योतिष, वास्तु आदि ६४ विद्याओं के जनक आदिब्रह्मा (भ.ऋषभदेव) हैं। गृहशिल्प और देवशिल्प(वास्तु टिप्स) का ज्ञान आदिब्रह्मा ने अनन्तवीर्य एवं विश्वकर्मा जी को दिया । सम्पूर्ण विश्व ने भारत को आध्यात्मिक गुरु माना है।

इस शास्त्र को उजागर करने तथा जन—जन तक पहुँचाने में दूरदर्शन एवं समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं का बहुत बड़ा योगदान है। ये विज्ञजन प्राणी मात्र को जीवन जीने की शैली का ज्ञान प्रदान कराते हैं। इस युग में विद्याओं के द्वारा आदिब्रह्मा ने विश्व कल्याण हेतु इनकी जानकारियाँ प्रदान की। गुरुजनों को कोटि—कोटि प्रणाम करते हुए मैं इस शास्त्र के एक पहलू के बारे में चर्चा करने का प्रयास कर रहा हूँ।

पुराने मकान से निकली हुई या बाजार से पुरानी सामग्री लाकर नव निर्वाण कराना निषेध है। आज आर्थिक युग में अर्थ की कमी के कारण मध्यमवर्गीय लोग मकान की लागत कम करने के लिए सस्ते एवं पुराने समानों का प्रयोग करने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य है कम कीमत में गृह का निर्माण करना। लेकिन मनुष्य पुराने सामानों के प्रयोग से मिलने वाले दूषित परिणामों की जानकारी से वंचित है।

पुराने मकान को खण्डित करके नव निर्वाण करना या भूखण्ड पर नव निर्माण करना हो तो मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों(वास्तु टिप्स) का ध्यान रखना चाहिए।

१. पुरानी र्इंट, लोहा, पत्थर नये मकान में लगाने से मकान की आयु निम्न हो जाती है।

२. एक मकान में प्रयोग की हुई लकड़ी नव निर्मित मकान में लगाने से धन—सम्पत्ति का पलायन एवं अशांति का आगमन होने की संभावना अत्यधिक हो जाती है। गृह स्वामी की आयु क्षीण होती है।

३. इस द्वार में पुरानी और नई लकड़ी लगाने से उस मकान की मालकियत में परिवर्तन होता रहता है।

४. किसी भी घर की पुरानी शैय्या खरीदकर उस पर शयन करने से पति पत्नी के रिश्ते में मधुरता का ह्रास हो जाता है।

प्रासादे च मठे नरेन्द्रभवने शैल: शुभो नो गृहे।
तस्मिन भित्तिषु बाह्यकासु शुभद: प्राग्भूमिकुम्भ्यां तथा।।(वास्तुराज, ५/ ३६)

मकानों के पुराने सामान जैसे— मोटरसाइकिल, स्कूटर , गाड़ियाँ, प्रज, टी०वी० , कूलर, ए.सी. इत्यादि जो मकानों में खराब हो जाने के बाद उनका प्रयोग नहीं किया जाता मगर उनको अपने घर से निकाला नहीं जाता । जहाँ पर ये सामान एकत्रित हो जाते हैं वहाँ नकारात्मक ऊर्जाओं की उत्पत्ति चालू हो जाती है एवं घर में धन—सम्पत्ति एवं शांति के वातावरण को दूषित कर देती है। कई मकानों से इन सामानों की (कबाड़ी वालों के यहाँ) विदाई कराकर उस घर में सुख—शांति लाने का प्रयास सफल रहा है

कई सामानों की सीएनएफ कं. के गोदाम में जाना पड़ा। उनके गौदामों में कंपनी से रिप्लेसमेंट के लिए सामान रखे हुए थे रिप्लेस्मेंट का सामान टूटा—फूटा,लीकेज वाला था मैंने उस सामान को गोदाम से हटाने के लिये कहा—सामान हटने के साथ—साथ ही उनके व्यापार में सकारात्मक परिवर्तन का आरंभ हो गया।

कई पैक्ट्रियों में भी बेकार के सामान का इकट्ठा करने या हो जाने से पैक्ट्रियों के काम में रूकावटें आना चालू हो जाती है। कहने का उद्देश्य है घर, पैक्ट्री, दुकान, गोदाम इत्यादि की सफाई पूर्ण रूप से रखनी चाहिये । जो सामान प्रयोग में न आने वाला हो या भविष्य में प्रयोग में आने की उम्मीद न हो उसे तत्काल विदा कर देना चाहिए। उसकी कीमत कम—ज्यादा मिलती हो तो भी उसका ध्यान नहीं रखते हुए हटा देना चाहिए।

नीतिकारों का वचन है— जहाँ सफाई रहती है वहाँ आदमी मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। यही सबसे अच्छी वास्तु टिप्स हें

आचार्य चाणक्य ने लिखा है— जहां पर गंदगी होती है वहाँ लक्ष्मी का निवास नहीं होता है। सुजान पुरुषों को उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुये घर में सुख—शांति, समृद्धि लाने का सफल प्रयोग करना चाहिए।