Friday, October 3, 2014

वास्तुदेव की विशेषताए

वास्तुदेव की विशेषताएँ

वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं  : -
चर वास्तु  : इसमें वास्तु पुरुष की  नजर या रुख  भाद्रपद ( अगस्त, सितम्बर ), आश्विन तथा कार्तिक ( अक्टूबर , नवम्बर ) महीनों के अवधि में दक्षिण की ओर  होता है |  तथा  मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसंबर ), पौष ( दिसंबर – जनवरी ), और माघ (जनवरी-फरवरी ) महीनों में पश्चिम की ओर होता है | फाल्गुन (फरवरी – मार्च ), चैत्र (मार्च – अप्रैल ), और  वैशाख (अप्रैल – मई ) महीनों में उत्तर की ओर होता है | ज्येष्ठ (मई – जून ), आषाढ़ (जून – जुलाई ), तथा  श्रावण (जुलाई – अगस्त ) महीनों की अवधि में पूर्व की ओर होता है | निर्माण कार्य का आरम्भ  या शिलान्यास  और मुख्य द्वार की स्थापना  ऐसे स्थान पर होनी चाहिए जो वास्तुपुरुष की दृष्टी  या नजर की ओर हो , ताकि मनुष्य उस मकान में शान्ति और सुख से रह सके |

स्थिर वास्तु :  वास्तु पुरुष का सिर सदैव उत्तर-पूर्व की ओर  तथा पैर दक्षिण – पश्चिम की ओर , दाहिना हाथ उत्तर-पश्चिम की ओर  एवं बांया  हाथ दक्षिण – पूर्व की ओर रहता है  इस बात को ध्यान में रखते हुए मकान का डिजाइन एवं प्लान  बनाना चाहिए |

नित्य वास्तु : प्रत्येक दिन वास्तु पुरुष की नजर  सुबह प्रथम  तीन घंटे  पूर्व की ओर , इसके पश्चात तीन घंटे दक्षिण  की ओर  तथा उसके बाद तीन घंटे पश्चिम की ओर तथा अंतिम तीन घंटे उत्तर की ओर दृष्टी अथवा नजर रहती है | भवन का निर्माण कार्य इसी प्रकार समयानुसार करना  चाहिए | वास्तु पुरुष की तीन अवसरों पर पूजा अर्चना करनी चाहिये  निर्माण कार्य में  शिलान्यास  करते समय , दूसरी बार  मुख्य द्ववार लगाते  समय , तीसरी बार  गृह प्रवेश के समय पूजा करनी चाहिये | गृह प्रवेश उस समय होना चाहिये जब वास्तुपुरुष की नजर उस ओर हो  ये शुभ रहता है ।

सुकृति एस्ट्रो वास्तु करनाल
मोबाइल 8607627999

Tuesday, September 30, 2014

हर o को करें ये 11 तांत्रिक उपाय, किस्मत चमकते देर नहीं लगेगी...



हर o को करें ये 11 तांत्रिक उपाय, किस्मत चमकते देर

नहीं लगेगी...

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धर्म ग्रंथों के अनुसार चतुर्थी तिथि व बुधवार के स्वामी भगवान

श्रीगणेश ही हैं। यदि इस दिन कोई भक्त भगवान श्रीगणेश

को प्रसन्न करने के लिए कुछ तांत्रिक उपाय करे तो इसका बहुत

ही जल्दी शुभ फल प्राप्त होता है। उस व्यक्ति की हर

मनोकामना पूरी हो जाती है।

1- बुधवार के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद एक कांसे

की थाली लें और उस पर चंदन से ऊँ गं गणपतयै नम: लिखें। इसके बाद

इस थाली में पांच बूंदी के लड्डू रखें व समीप स्थित किसी गणेश

मंदिर में दान कर आएं। इस उपाय से अचानक धन धन लाभ होने

की संभावना बढ़ जाएगी।

2- यंत्र शास्त्र के अनुसार गणेश यंत्र बहुत ही चमत्कारी यंत्र है। घर

में इसकी स्थापना बुधवार, चतुर्थी या किसी शुभ मुहूर्त में करने से

बहुत लाभ होता है। इस यंत्र के घर में रहने से किसी भी प्रकार

की बुरी शक्ति घर में प्रवेश नहीं कर सकती।

3- बुधवार के दिन सुबह स्नान अदि करने के बाद समीप स्थित

किसी गणेश मंदिर जाएं और भगवान श्रीगणेश को 21 गुड़

की ढेली के साथ दूर्वा रखकर चढ़ाएं। इस उपाय को करने से भगवान

श्रीगणेश भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। ये बहुत

ही चमत्कारी उपाय है।

4- अगर आपको धन की इच्छा है तो इसके लिए आप बुधवार

या चतुर्थी तिथि के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान

श्रीगणेश को शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद

घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन

संबंधी समस्या का निदान हो जाता है।

5- शास्त्रों में भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने का विधान

भी बताया गया है। बुधवार के दिन भगवान श्रीगणेश का अभिषेक

करने से विशेष लाभ होता है। यह अभिषेक शुद्ध पानी से करें। साथ

में गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी करें। बाद में मावे का लड्डुओं

का भोग लगाकर सभी में बांट दें।

6- इस दिन किसी गणेश मंदिर जाएं और दर्शन करने के बाद

नि:शक्तों को यथासंभव दान करें। दान से पुण्य

की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीगणेश भी अपने भक्तों पर

प्रसन्न होते हैं।

7- बुधवार के दिन सुबह उठकर नित्य कर्म करने के बाद पीले रंग के

श्रीगणेश भगवान की पूजा करें। पूजन में श्रीगणेश

को हल्दी की पांच गठान श्री गणाधिपतये नम: मंत्र का उच्चारण

करते हुए चढ़ाएं इसके बाद 108 दूर्वा पर गीली हल्दी लगाकर

श्री गजवकत्रम नमो नम: का जप करके चढ़ाएं। यह उपाय

प्रति बुधवार को करने से प्रमोशन होने की संभावनाएं बढ़

जाती हैं।

8- यदि किसी कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा है तो वह

कन्या बुधवार को विवाह की कामना से भगवान श्रीगणेश

को मालपुए का भोग लगाए तो शीघ्र ही उसका विवाह

हो जाता है।

यदि किसी युवक के विवाह में परेशानियां आ रही हैं तो वह

भगवान श्रीगणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं

तो उसका विवाह भी जल्दी हो जाता है।

9- बुधवार को दूर्वा (एक प्रकार की घास) के गणेश बनाकर

उसका पूजा करना बहुत ही शुभ होता है। श्रीगणेश

की प्रसन्नता के उन्हें मोदक, गुड़, फल, मावा-मिïष्ठान

आदि अर्पण करें। ऐसा करने से भगवान गणेश सभी मनोकामनाएं

पूरी करते हैं।

10- अगर आपके जीवन में बहुत परेशानियां हैं और कम नहीं हो रही है

तो आप बुधवार के दिन किसी हाथी को हरा चारा खिलाएं और

गणेश मंदिर जाकर भगवान श्रीगणेश से परेशानियों का निदान

करने के लिए प्रार्थना करें। इससे आपके जीवन की परेशानियां कुछ

ही दिनों में दूर हो जाएंगी।

11- बुधवार के दिन घर में श्वेतार्क गणपति (सफेद आंकडे की जड़ से

बनी गणपति) की स्थापना करने से सभी प्रकार की तंत्र

शक्ति का नाश हो जाता है व ऊपरी हवा का असरभी नहीं होता।

क्या आपके कार्य को किसी की बुरी नजर/बद्नजर लगी है ?

क्या आपके कार्य को किसी की बुरी नजर/बद्नजर लगी है ?


प्रायः सुनने में आता है कि काम, दुकान अथवा भवन किसी ने बांध दिया। अकस्मात् धन की आगत अवरुद्ध हो गयी। कार्य को किसी की बद्नजर लग गयी। बांधना कुछ करने कराने वाली जैसी बातें सामान्यतया मैं नहीं मानता हूॅ। क्योंकि ऐसी बातें अधिकांषतः उस अबौद्धिक वर्ग के तांत्रिक-ज्योतिष द्वारा फैलायी जाती हैं जो पहले तो इन बातों से लोगों में एक अज्ञात भय पैदा करते हैं फिर उसको धन आदि किन्हीं बातों से कैष कराते हैं। ऐसा भी नहीं है कि ‘कुछ’ होता नहीं है, होता अवष्य है परन्तु वह होता केवल 5-10 प्रतिषत ही है। इसलिए सर्वप्रथम तो मन में ऐसी बात पनपने ही न दें। स्वस्थ मानसिकता और प्रभु में अटूट आस्था रख कर अपना कर्म और धर्म करते रहें। फिर भी किन्हीं ऐसी बातों से भयपूर्ण विपरीत स्थति बनने लगे तो एक उपाय अवष्य करें। उन्नति के मार्ग पुनः प्रषस्त होने लगेंगे। दुकानदारों के लिए तो ये प्रयोग बहुत ही प्रभावषाली सिद्ध हुआ है।

किसी भी शनिवार को दुकान बंद करने से पूर्व उसमें एक मुठठी साबुत उड़द की दाल बिखेर दें। दुकान के प्रवेष द्वार पर ( जिससे अधिकांषतः आना-जाना हो) बाहर से अंदर जाते समय बायीं ओर धरती पर हल्दी के घोल से स्वास्तिक बना लें। इस पर कच्चे सूत के एक धागे का छोर रखें। दुकान के अंदर क्रमषः बांये से दांये चलते हुए सूत इस प्रकार छोड़ते चलें कि अंदर से पूरी दुकान सूत से बंध जाये। सूत का दूसरा छोर बांयीं ओर बने स्वास्तिक पर समाप्त करें। धूप-दीप आदि कोई उपक्रम करते हैं तो आपके अपने ऊपर है। अब दुकान को बंद करके निःषब्द घर लौट आयें। अगले दिन अर्थात् रविवार को प्रातः काल 7-8 बजे से पूर्व दुकान खोलें। जिस क्रम से धागा बिछाया था उसके विपरीत क्रम अर्थात् दायें से बायें घूमते हुए धागा उठा कर समेंट लें। जितने बिखरे हुए दाल के दानें मिल सकते हों वह भी जमां करलें। इन्हें हाथ से चुनें, झाड़ू से एकत्र न करें। धागे को वहां ही जला दें। इसकी राख, उड़द की दाल के दानें पहले से क्रय किए हुए 1-2 किलो बाजरे में मिला लें। यह सब लेकर कहीं किसी नदी के किनारे बैठ जाएं। थोड़ा से बाजरा अपने एक हाथ में रखें। दूसरे से बहते हुए पानी को इस पर छोड़ें। बाजरे को धीरे-धीरे उंगलियों के मध्य बनें छिद्रों से गिर कर नदी में बहने दें। जब एक हाथ थक जाए तो यह क्रम हाथ बदल कर तब तक करते रहें जब तक कि सारा बाजरा विसर्जित न हो जाए। इसके बाद निःषब्द घर अथवा दुकान लौट जाएं। इस पूरे काल में कोई भी लक्ष्मी प्रदायक मंत्र निरंतर जपते रहें। ‘‘¬ नमो नारायणाय’’ मंत्र सबसे अधिक प्रभावषाली सिद्ध होता है, ऐसा अनेक दुकान दारों को अनुभूत हुआ है। इस बात का ध्यान अवष्य रखें कि बाजरा बहाने में कुछ समय अवष्य लगे। ऐसा न हो कि जल्दी से वह छोड़ कर आप लौट आएं। एक शब्द पुनः कहूंगा, इस उपाय से आपको अच्छा अवष्य लगेगा।

रोजगार प्राप्ति हेतु ये करे उपाय---


रोजगार प्राप्ति हेतु ये करे उपाय---

उपाय 01 ---शनिवार को हनुमान् जी के मन्दिर में जाकर उन्हें सवा किलो मोतीचूर के लड्डुओं का भोग लगाएँ । घी का दीपक जलाकर तथा वहीं बैठकर निम्नलिखित मन्त्र का लाल चन्दन अथवा मूँगे की माला से 108 बार जप करें -

“कवन सो काज कठिन जग माहीँ ।

जो नहीं होय तात तुम पाहिं ।।”

इसके बाद 40 दिनों तक नित्य अपने घर में बने पूजा-स्थल में अथवा हनुमान् जी के मन्दिर में मन-ही-मन इस मन्त्र का 108 बार जप करें । इन 40 दिनों के अन्दर ही अथवा 40 दिन पूरे होने के बाद आपको अच्छे रोजगार की प्राप्ति होगी ।


उपाय 02 ---शनिवार, मंगलवार अथवा अन्य किसी शुभ मुहूर्त में रात्रि 10 बजे के पश्चात् भगवान् श्रीराम, भरत, लक्ष्मण आदि की पूजा करने के पश्चात् भरत जी से रोजगार प्रदान करने की प्रार्थना करें । जब वे किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो अतिशीघ्र अच्छा रोजगार प्राप्त होता है । इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए गाय के घी से 108 आहुतियाँ दें । अब अगले दिन से नित्य इस मन्त्र का प्रातःकाल उठते ही बिना किसी से बोले 21 बार उच्चारण करें, शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी -

“विश्व भरन पोषन कर जोई ।

ताकर नाम भरत अस होई ।।”


उपाय 03 ---मंगलवार को अथवा रात्रिकाल में निम्नलिखित मन्त्र का अकीक की माला से 108 बार जप करें । इसके बाद नित्य इसी मन्त्र का स्नान करने के बाद 11 बार जप करें । इसके प्रभाव से अतिशीघ्र ही आपको मनोनुकूल रोजगार की प्राप्ति होगी ।

यह मन्त्र माँ भवानी को प्रसन्न करता है, अतः जप के दौरान अपने सम्मुख उनका चित्र भी रखें ।

” ॐ हर त्रिपुरहर भवानी बाला

राजा मोहिनी सर्व शत्रु ।

विंध्यवासिनी मम चिन्तित फलं

देहि देहि भुवनेश्वरी स्वाहा ।।”



उपाय 04 ---शनैश्चरी अमावस्या को सन्ध्या के समय एक नींबू लें और उसके चार टुकड़े करके किसी चौराहे पर चारों दिशाओं में फेंक दें । इसके प्रभाव से अतिशीघ्र ही आपको अच्छे रोजगार की प्राप्ति होगी ।

ऐसे करे गोमती चक्र का प्रयोग धन/संपदा प्राप्ति हेतु---


१॰ सात गोमती चक्रों को शुक्ल पक्ष के प्रथम अथवा दीपावली पर लाल वस्त्र में अभिमंत्रित कर पोटली बना कर धन स्थान पर रखें ।

२॰ यदि आपको अचानक आर्थिक हानि होती हो, तो किसी भी मास के प्रथम सोमवार को २१ अभिमन्त्रित गोमती चक्रों को पीले अथवा लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर धन रखने के स्थान पर रखकर हल्दी से तिलक करें । फिर मां लक्ष्मी का स्मरण करते हुए उस पोटली को लेकर सारे घर में घूमते हुए घर के बाहर आकर किसी निकट के मन्दिर में रख दें ।

३॰ यदि आपके परिवार में खर्च अधिक होता है, भले ही वह किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए ही क्यों न हो, तो शुक्रवार को २१ अभिमन्त्रित गोमती चक्र लेकर पीले या लाल वस्त्र पर स्थान देकर धूप-दीप से पूजा करें । अगले दिन उनमें से चार गोमती चक्र उठाकर घर के चारों कोनों में एक-एक गाड़ दें । १३ चक्रों को लाल वस्त्र में बांधकर धन रखने के स्थान पर रख दें और शेष किसी मन्दिर में अपनी समस्या निवेदन के साथ प्रभु को अर्पित कर दें ।

४॰ यदि आप अधिक आर्थिक समृद्धि के इच्छुक हैं, तो अभिमंत्रित गोमती चक्र और काली हल्दी को पीले कपड़े में बांधकर धन रखने के स्थान पर रखें ।

५॰ यदि आपके गुप्त शत्रु अधिक हों अथवा किसी व्यक्ति की काली नज़र आपके व्यवसाय पर लग गई हो, तो २१ अभिमंत्रित गोमती चक्रों व तीन लघु नारियल को पूजा के बाद पीले वस्त्र में बांधकर मुख्य द्वारे पर लटका दें ।

६॰ यदि आपको नजर जल्दी लगती हो, तो पाँच गोमती चक्र लेकर किसी सुनसान स्थान पर जायें । फिर तीन चक्रों को अपने ऊपर से सात बार उसारकर अपने पीछे फेंक दें तथा पीछे देखे बिना वापस आ जायें । बाकी बचे दो चक्रों को तीव्र प्रवाह के जल में प्रवाहीत कर दें ।

७॰ यदि आप कितनी भी मेहनत क्यों न करें, परन्तु आर्थिक समृद्धि आपसे दूर रहती हो और आप आर्थिक स्थिति से संतुष्ट न होते हों, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को २१ अभिमंत्रित गोमती चक्र लेकर घर के पूजा स्थल में मां लक्ष्मी व श्री विष्णु की तस्वीर के समक्ष पीले रेशमी वस्त्र पर स्थान दें । फिर रोली से तिलक कर प्रभु से अपने निवास में स्थायी वास करने का निवेदन तथा समृद्धि के लिए प्रार्थना करके हल्दी की माला से “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की तीन माला जप करें । इस प्रकार सवा महीने जप करने के बाद अन्तिम दिन किसी वृद्ध तथा ९ वर्ष से कम आयु की एक बच्ची को भोजन करवाकर दक्षिणा देकर विदा करें ।

८॰ यदि आपके बच्चे अथवा परिवार के किसी सदस्य को जल्दी-जल्दी नजर लगती हो, तो आप शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि को ११ अभिमंत्रित गोमती चक्र को घर के पूजा स्थल में मां दुर्गा की तस्वीर के आगे लाल या हरे रेशमी वस्त्र पर स्थान दें । फिर रोली आदि से तिलक करके नियमित रुप से मां दुर्गा को ५ अगरबत्ती अर्पित करें । अब मां दुर्गा का कोई भी मंत्र जप करें । जप के बाद अगरबत्ती के भभूत से सभी गोमती चक्रों पर तिलक करें । नवमी को तीन चक्र पीड़ित पर से उसारकर दक्षिण दिशा में फेंक दें और एक चक्र को हरे वस्त्र में बांधकर ताबीज का रुप देकर मां दुर्गा की तस्वीर के चरणों से स्पर्श करवाकर पीड़ित के गले में डाल दें । बाकि बचे सभी चक्रों को पीड़ित के पुराने धुले हुए वस्त्र में बांधकर अलमारी में रख दें ।

९॰ यदि किसी का स्वास्थ्य अधिक खराब रहता हो अथवा जल्दी-जल्दी अस्वस्थ होता हो, तो चतुर्दशी को ११ अभिमंत्रित गोमती चक्रों को सफेद रेशमी वस्त्र पर रखकर सफेद चन्दन से तिलक करें । फिर भगवान् मृत्युंजय से अपने स्वास्थ्य रक्षा का निवेदन करें और यथा शक्ति महामृत्युंजय मंत्र का जप करें । पाठ के बाद छह चक्र उठाकर किसी निर्जन स्थान पर जाकर तीन चक्रों को अपने ऊपर से उसारकर अपने पीछे फेंक दें और पीछे देखे बिना वापस आ जायें । बाकि बचे तीन चक्रों को किसी शिव मन्दिर में भगवान् शिव का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर अर्पित कर दें और प्रणाम करके घर आ जायें । घर आकर चार चक्रों को चांदी के तार में बांधकर अपने पंलग के चारों पायों पर बांध दें तथा शेष बचे एक को ताबीज का रुप देकर गले में धारण करें ।

१०॰ यदि आपका बच्चा अधिक डरता हो, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को हनुमान् जी के मन्दिर में जाकर एक अभिमंत्रित गोमती चक्र पर श्री हनुमानजी के दाएं कंधे के सिन्दूर से तिलक करके प्रभु के चरणों में रख दें और एक बार श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें । फिर चक्र उठाकर लाल कपड़े में बांधकर बच्चे के गले में डाल दें ।

११॰ यदि व्यवसाय में किसी कारण से आपका व्यवसाय लाभदायक स्थिति में नहीं हो, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को ३ गोमती चक्त, ३ कौड़ी व ३ हल्दी की गांठ को अभिमंत्रित कर किसी पीले कपड़े में बांधकर धन-स्थान पर रखें ।

नजर्दोश से बंधी दूकान ( तंत्र-मन्त्र प्रयोग वाली)कैसे खोलें ?


नजर्दोश से बंधी दूकान ( तंत्र-मन्त्र प्रयोग वाली)कैसे खोलें ?–

कभी-कभी देखने में आता है कि खूब चलती हुई दूकान भी एकदम से ठप्प हो जाती है । जहाँ पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ती थी, वहाँ सन्नाटा पसरने लगता है । यदि किसी चलती हुई दुकान को कोई तांत्रिक बाँध दे, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, अतः इससे बचने के लिए निम्नलिखित प्रयोग करने चाहिए -

१॰ दुकान में लोबान की धूप लगानी चाहिए ।

२॰ शनिवार के दिन दुकान के मुख्य द्वार पर बेदाग नींबू एवं सात हरी मिर्चें लटकानी चाहिए ।

३॰ नागदमन के पौधे की जड़ लाकर इसे दुकान के बाहर लगा देना चाहिए । इससे बँधी हुई दुकान खुल जाती है ।

४॰ दुकान के गल्ले में शुभ-मुहूर्त में श्री-फल लाल वस्त्र में लपेटकर रख देना चाहिए ।

५॰ प्रतिदिन संध्या के समय दुकान में माता लक्ष्मी के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए ।

६॰ दुकान अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की दीवार पर शूकर-दंत इस प्रकार लगाना चाहिए कि वह दिखाई देता रहे ।

७॰ व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा दुकान को नजर से बचाने के लिए काले-घोड़े की नाल को मुख्य द्वार की चौखट के ऊपर ठोकना चाहिए ।

८॰ दुकान में मोरपंख की झाडू लेकर निम्नलिखित मंत्र के द्वारा सभी दिशाओं में झाड़ू को घुमाकर वस्तुओं को साफ करना चाहिए । मंत्रः- “ॐ ह्रीं ह्रीं क्रीं”

९॰ शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के सम्मुख मोगरे अथवा चमेली के पुष्प अर्पित करने चाहिए ।

१०॰ यदि आपके व्यावसायिक प्रतिष्ठान में चूहे आदि जानवरों के बिल हों, तो उन्हें बंद करवाकर बुधवार के दिन गणपति को प्रसाद चढ़ाना चाहिए ।

११॰ सोमवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर स्वच्छ जल से धोकर दुकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर टांगना चाहिए । सूती धागे को पीसी हल्दी में रंगकर उसमें अशोक के पत्तों को बाँधकर लटकाना चाहिए ।

१२॰ यदि आपको यह शंका हो कि किसी व्यक्ति ने आपके व्यवसाय को बाँध दिया है या उसकी नजर आपकी दुकान को लग गई है, तो उस व्यक्ति का नाम काली स्याही से भोज-पत्र पर लिखकर पीपल वृक्ष के पास भूमि खोदकर दबा देना चाहिए तथा इस प्रयोग को करते समय किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए । यदि पीपल वृक्ष निर्जन स्थान में हो, तो अधिक अनुकूलता रहेगी ।

१३॰ कच्चा सूत लेकर उसे शुद्ध केसर में रंगकर अपनी दुकान पर बाँध देना चाहिए ।

१४॰ हुदहुद पक्षी की कलंगी रविवार के दिन प्रातःकाल दुकान पर लाकर रखने से व्यवसाय को लगी नजर समाप्त होती है और व्यवसाय में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ।

१५॰ कभी अचानक ही व्यवसाय में स्थिरता आ गई हो, तो निम्नलिखित मंत्र का प्रतिदिन ग्यारह माला जप करने से व्यवसाय में अपेक्षा के अनुरुप वृद्धि होती है । मंत्रः- “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवती माहेश्व

नवग्रह शांतिदायक टोटके--–(पंडित आशु बहुगुणा)--- सूर्यः-

१॰ सूर्यदेव के दोष के लिए खीर का भोजन बनाओ और रोजाना चींटी के बिलों पर रखकर आवो और केले को छील कर रखो ।

२॰ जब वापस आवो तभी गाय को खीर और केला खिलाओ ।

३॰ जल और गाय का दूध मिलाकर सूर्यदेव को चढ़ावो। जब जल चढ़ाओ, तो इस तरह से कि सूर्य की किरणें उस गिरते हुए जल में से निकल कर आपके मस्तिष्क पर प्रवाहित हो ।

४॰ जल से अर्घ्य देने के बाद जहाँ पर जल चढ़ाया है, वहाँ पर सवा मुट्ठी साबुत चावल चढ़ा देवें ।

चन्द्रमाः-

१॰ पूर्णिमा के दिन गोला, बूरा तथा घी मिलाकर गाय को खिलायें । ५ पूर्णमासी तक गाय को खिलाना है ।

२॰ ५ पूर्णमासी तक केवल शुक्ल पक्ष में प्रत्येक १५ दिन गंगाजल तथा गाय का दूध चन्द्रमा उदय होने के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य दें । अर्घ्य देते समय ऊपर दी गई विधि का इस्तेमाल करें ।

३॰ जब चाँदनी रात हो, तब जल के किनारे जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को हाथ जोड़कर दस मिनट तक खड़ा रहे और फिर पानी में मीठा प्रसाद चढ़ा देवें, घी का दीपक प्रज्जवलित करें । उक्त प्रयोग घर में भी कर सकते हैं, पीतल के बर्तन में पानी भरकर छत पर रखकर या जहाँ भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पानी में दिख सके वहीं पर यह कार्य कर सकते हैं ।

नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )

नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )

सूर्य ग्रह की शांति के लिए आप शुक्ल पक्ष के रविवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। रविवार को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए और गेहूं की रोटी व गुड़ से अथवा गुड़ से बने दलिया का सेवन करना चाहिए। साथ ही पांच माला सूर्य के बीज मंत्र का जप करें,

ॐ हृं हृं स: सूर्याय नम:।

चंद्रमा की शांति के लिए आप श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक अथवा मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष के सोमवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन “ॐ नम: शिवाय” मंत्र का जप पांच माला करें। सोमवार के दिन पांच माला चंद्रमा के बीज मंत्र का भी जप करना चाहिए। इस दिन शिव-पार्वती पर श्वेत पुष्प, सुपारी, अक्षत, बिल्व पत्र आदि चढ़ाकर ग्रह शांति की प्रार्थना करें।

ऊं श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम

मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार को उपवास करना चाहिए। यह व्रत 21 सप्ताह तक करने से पूर्ण फल मिलता है। इस दिन नमक छोड़ दें और लाल पुष्प, फल, ताम्र बर्तन, नारियल आदि द्वारा हनुमान जी की पूजन करके उन्हें सिंदूर अर्पित करना चाहिए तथा लाल चंदन की माला से पांच माला यह मंत्र जपे।

ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:

बुध की शांति के लिए लिए बुधवार का उपवास रखना चाहिए और भगवान विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। अगर आप 21 या 31 बुधवार के व्रत का संकल्प लें, तो बेहतर होगा। व्रत के दिन श्री विष्णु सहस्रनाम का पांच या ग्यारह बार पाठ करें। यह पाठ प्रतिदिन पांच बार ही करना श्रेयस्कर माना गया है। घी, मूंग की दाल से बने पदार्थ से बुधवार को परहेज करें और इस मंत्र की पाँच माला जपे।

ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:

गुरु या बृहस्पति की शांति के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से उपवास आरंभ किया जाए, तो उपासक की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। व्रत के दिन स्नानादि के बाद पीले वस्त्र धारण करके पीले फूल, पीला नैवेद्य, गुड़, चने की दाल, हल्दी या पीले चंदन से सत्यनारायण भगवान की आराधना करें। साथ ही इस मंत्र का पांच माला जप करें।

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:

शुक्र की शांति के लिए उपवास लक्ष्मी या वैभव लक्ष्मी के समक्ष श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, मावा की मिठाई, दीया, धूप आदि से पूजन करें और इस मंत्र का जप करें। यह व्रत 21 शुक्रवार तक करने तथा प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ करने से लाभ होता है

ऊं द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:

शनि ग्रह की शांति के लिए: शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से यह उपवास आरंभ किया जा सकता है। 11 या 21 शनिवार तक व्रत करें, तो लाभप्रद होगा। इस दिन स्नान से पहले अपने ऊपर से 20-25 ग्राम सरसों या तिल के तेल में काले तिल डालकर सात बार सिर से पांव तक उतार लें और शनिदेव पर अर्पित करें। इसके बाद स्नान करके नीले वस्त्र पहनें। लौह निर्मित शनि प्रतिमा पर पंचामृत से स्नान कराएं तथा इस मंत्र का जप करें।

ॐ शं शनैश्चराय नम:

राहु की शांति के लिए: यह छाया ग्रह है, इसलिए इसके लिए कोई रात या दिन नहीं होता। राहु का उपवास शनिवार को ही करना चाहिए। इस दिन या प्रतिदिन पक्षियों को बाजरा खिलाएं और राहु मंत्र का 21 बार उच्चारण करें। साथ ही इस मंत्र का जप करें।

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:

केतु की शांति के लिए: यह भी एक छाया ग्रह है, इसलिए इसकी कोई राशि या दिन नहीं होता। विद्वानों के अनुसार केतु मंगल के समान ही है। इसलिए इसका व्रत भी मंगलवार को ही करना चाहिए। इस दिन नमक रहित भोजन करें और बीज मंत्र का जप करें।

ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:

अशांत ग्रह को शांत करने के लिए सामान्य गृहस्थों के लिए कठोर तप के विकल्प के रूप में उपवास का विधान शास्त्रों में बताया गया है, जिससे वह किसी ग्रह की भी उपासना कर सकते हैं

पारद शिवलिंग



पारद शिवलिंग ( Parad Shivling )
.
आजकल मान्यता है घर में शिवलिंग नहीं रखते, मै आपको बता दूँ घर मै मार्वेल, पत्थर आदि के शिवलिंग नहीं रखते , हर घर मै "पारद शिवलिंग" जरूर होना चाहिए | पारद शिवलिंग घर की नकारात्मक उर्जा और वास्तुदोष को खत्म करता है | जिनकी जन्मकुंडली मे चंद्रमा , नीच का है , मन अशांत रहता है, मन मे नेगेटिव बिचार ज्यादा आते है, उनको "पारद शिवलिंग" पर नियमित कच्चा दूध - सफ़ेद फुल चढ़ाना चाहिए |

पुरे परिवार की समृधी के लिए प्रत्येक साल इस पर दूध से रुद्राभिषेक करवाना चाहिए | क्योकि शिव स्वयं भूत-प्रेत , तांत्रिक प्रयोगों के स्वामी है , अतः इसकी नियमित आराधना करने से भूत-प्रेत बाधा , नज़र बाधा, आदि तुरंत दूर हो जाती है|

अगर कोई ब्यक्ति लगातार बीमार रहता हो , दवाई का असर न होता हो , निम्न मंत्र का 108 वार पाठ करके, इस पर चढ़ाया हुआ गंगाजल एक चम्मच रोगी को पिला दे , रोगी ठीक होने लगेगा |

." ॐ जूं सः "

ये अवश्य ध्यान रखे , पारद - शिवलिंग उच्च कोटि का ख़रीदे | शुभ- मुहूर्त मे घर मे स्थापित करे|

तुलसी के तंत्रिकीय और औषधीय उपयोग...

तुलसी के तंत्रिकीय और औषधीय उपयोग...

[१] तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ
लेने से शीघ्र वीर्य पतन अथवा वीर्य की कमी की समस्या दूर
होती है |

[२] तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ
लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में
बढोतरि होती है।

[३] मासिक धर्म में अनियमियता:: जिस दिन मासिक आए उस
दिन से जब तक मासिक रहे उस दिन तक तुलसी के बीज 5-5
ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक
की समस्या ठीक होती है और जिन महिलाओ को गर्भधारण में
समस्या है वो भी ठीक होती है

[४] तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर सब्जा शीतल
होता है . इसे फालूदा में इस्तेमाल किया जाता है . इसे भिगाने से
यह जेली की तरह फुल जाता है . इसे हम दूध या लस्सी के
साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां दाल कर ले तो गर्मी में बहुत
ठंडक देता है .इसके अलावा यह पाचन
सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है .यह पित्त घटाता है ये
त्रीदोषनाशक , क्षुधावर्धक है

[५] प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण
करने से मधुमेह,रक्त विकार ,वाट-पित्त दोष आदि दूर होते हैं |

[६] तुलसी के समीप आसन लगाकर कुछ दिन बैठने से श्वास के
रोग ,अस्थमा आदि से जल्दी छुटकारा मिल सकता है |

[७] तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह
समाप्त होती है |

[८] वास्तु दोष दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण
अर्थात दक्षिण पूर्व से लेकर वायव्य अर्थात उत्तर-पश्चिम
तक के खली स्थान में लगा सकते हैं ,अथवा गमले में रख सकते
हैं |

[९] पूर्व दिशा की खिड़की के पास रखने से जिद्दी पुत्र का हठ
दूर होता है |

[१०] पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते कुछ दिन
खिलाने से अनियंत्रित संतान आज्ञानुसार व्यवहार कर
सकती है |

[११] अग्नि कोण में स्थापित तुलसी के पौधे को कन्या अगर
नित्य अगर जल अर्पित कर प्रदक्षिणा करे तो उसके विवाह
की बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र उत्तम विवाह की संभावनाएं
बनती हैं |

[१२] दक्षिण -पश्चिम में रखे तुलसी के गमले पर
प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करने और मिठाई
का भोग लगा किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से
व्यवसाय की सफ़लता बढती है और कारोबार ठीक होता है |

[१३] नित्य पंचामृत में तुलसी मिलाकर शालिग्राम का अभिषेक
करने से घर के वास्तु दोष दूर होते हैं|
[१४] तुलसी के १६ बीज किसी सफ़ेद कपडे में बांधकर सोमवार
को कार्यस्थल पर सुबह दबा देने से वहां सम्मान
की वृद्धि होती है और अधिकारियों की अनुकूलता प्राप्त होती है|

[१५] ८ तुलसी के पत्ते और ८ काली मिर्च की पोटली बनाकर
बांह में बाँधने से भूत-प्रेत आदि की समस्या दूर होती है |

ध्यान रहे तुलसी पूजनीय हें , इसका अपमान / अनादर न करें !

Src : Internet

सोलह सिद्धिया...

सोलह सिद्धिया...

1. वाक् सिद्धि : जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं!

2. दिव्य दृष्टि: दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं!

3. प्रज्ञा सिद्धि : प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें!

4. दूरश्रवण : इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता!

5. जलगमन : यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो!

6. वायुगमन : इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं!

7. अदृश्यकरण : अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं!

8. विषोका : इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं!

9. देवक्रियानुदर्शन : इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं!

10. कायाकल्प : कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव तोग्मुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं!

11. सम्मोहन : सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं!

12. गुरुत्व : गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं!

13. पूर्ण पुरुषत्व : इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की!

14. सर्वगुण संपन्न : जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं!

15. इच्छा मृत्यु : इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं!

16. अनुर्मि : अनुर्मि का अर्थ हैं-जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो!


Sunday, September 28, 2014

पूर्वजन्म सन्तान फल

पूर्वजन्म सन्तान फल
*पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में
माता-पिता, भाई-बहिन,पति पत्नी- प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते है। सब मिलते है।
क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है।
वेसे ही संतान के रूप में हमारा कोई पूर्व जन्म का सम्बन्धी ही आकर जन्म लेता है।
जिसे शास्त्रों में चार प्रकार का बताया गया है।
1) ऋणानुबन्ध :- पूर्व जन्म का कोई एसा जीव
जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो तो वो आपके घर में संतान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो।
2) शत्रु पुत्र :-पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में संतान बनकर आयेगा औए बडा होने पर माता पिता से मारपीट झगडा या उन्हे सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा !
3) उदासीन :-इस प्रकार की सन्तान माता पिता को न तो कष्ट देती है ओर ना ही सुख। विवाह होने पर यह माता- पिता से अलग होजाते है।
4)सेवक पुत्र :-पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा कि है तो वह अपनी कि हुई सेवा का ऋण उतारने के लियेआपकी सेवा करने के लिये पुत्र/पुत्री बनकर आता है।
आप यह ना समझे कि यह सब बाते केवल मनुष्य पर ही लागु होती है।
इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव भी आ सकता है। जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा कि है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है। यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसके दूध देना बन्द करने के पश्चात उसे घर से निकाल दिया हो तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी।
यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा। इस लिये जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं करे।
क्यों कि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे। उसे वह आपको सौ गुना करके देगी। यदि आपने किसी को एक रूपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रूपये जमा हो गये है।
यदि आपने किसी का एक रूपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रूपये निकल गये।

Saturday, September 27, 2014

नियमों का करेंगे पालन तभी सिद्ध होंगे उपाय

नियमों का करेंगे पालन तभी सिद्ध होंगे उपाय
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कुछ परिस्थितियों में अगर आप बार बार मेहनत करने पर भी कार्य में सफल
नहीं हो पा रहे और आपका आत्मविश्वास बार बार धोखा दे रहा हे
तो ज्योतिष के माध्यम से आप अपने प्रतिकुल ग्रहों को अनुकुल करने
का प्रयास करते हैं। आप उपाय करने की ठान तो लेते हैं आप उपाय
भी करते हो कुछ लोगो को फायदा होता है कुछ लोगो को नहीं -- में
आपसे कहना चाहूंगी की उपाय करने के भी कुछ नियम होते हैंयदि आप उन
नियमो के आधार पर उपाय करे तो अबश्य सिद्ध होंगे उपाय जैसे--
1 अपनी किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए उपाय करें
तो उसके प्रति मन में श्रद्धा रखें।
2 सच्ची भावना से किए गए उपाय अवश्य सिद्ध होते हैं एवं
मनचाही मुरादों की पूर्ति होती है। केवल कार्य की सिद्धि के लिए
अनमने मन से किए गए उपाय अपना प्रभाव नहीं दिखाते।
3 किसी भी उपाय को होंद में लाने के लिए ब्रह्म मूहर्त के बाद एवं सूर्य
अस्त होने से पहले करें, रात को किए गए उपाय विपरीत प्रभाव दे सकते
हैं। जब चन्द्र ग्रहण होता है उस समय जो उपाय होंद में लाए जाते हैं वह
रात के समय ही किए जाते हैं।
5 अगर आप उपाय करने में असमर्थ हैं तो आपका जिन से खून
का रिश्ता हो वह आपके स्थान पर उपाय कर सकते हैं।
ऐसा करना उतना ही फलदाई होगा जितना आपके स्वयं आपने हाथों से
उपाय करना।
6 एक दिन में एक ही उपाय को होंद में लाएं। दो उपाय एक साथ करने से
वह प्रभावहीन हो जाते हैं।
7 उपाय करते समय पंडित जी जो नियम र्निधारित करें उन पर अवश्य अमल
करें अन्यथा उपाय का कोई लाभ नहीं होगा।
8 जितने दिन अथवा जितनी अवधी के लिए उपाय करने को कहा जाए
वैसा ही करें। उस में अपनी सुविधा अनुरूप कोई बदलाव मत लाएं।
10 घर में सूतक अथवा पातक चल रहा हो तो 40 दिन तक उपाय मत करें

Monday, September 22, 2014

22 Reasons To Believe Hinduism Is Based On Science

22 Reasons To Believe Hinduism Is Based On Science

1. वृक्ष
People are advised to worship Neem and Banyan tree in
the morning. Inhaling the air near these trees, is good for
health.
2. योग
If you are trying to look ways for stress management,
there can’t be anything other than Hindu Yoga aasan
Pranayama (inhaling and exhaling air slowly using one of
the nostrils).
3. प्रतिष्ठान
Hindu temples are built scientifically. The place where an
idol is placed in the temple is called ‘Moolasthanam’. This
‘Moolasthanam’ is where earth’s magnetic waves are
found to be maximum, thus benefitting the worshipper.
4.तुलसी
Every Hindu household has a Tulsi plant. Tulsi or Basil
leaves when consumed, keeps our immune system strong
to help prevent the H1N1 disease.
5. मन्त्र
The rhythm of Vedic mantras, an ancient Hindu practice,
when pronounced and heard are believed to cure so many
disorders of the body like blood pressure.
6. तिलक
Hindus keep the holy ash in their forehead after taking a
bath, this removes excess water from your head.
7. कुंकुम
Women keep kumkum bindi on their forehead that protects
from being hypnotised.
8. हस्त ग्रास
Eating with hands might be looked down upon in the west
but it connects the body, mind and soul, when it comes to
food.
9. पत्तल
Hindu customs requires one to eat on a leaf plate. This is
the most eco-friendly way as it does not require any
chemical soap to clean it and it can be discarded without
harming the environment.banana; palash leaves
10. कर्णछेदन
Piercing of baby’s ears is actually part of acupuncture
treatment. The point where the ear is pierced helps in
curing Asthma.
11. हल्दी
Sprinkling turmeric mixed water around the house before
prayers and after. Its known that turmeric has antioxidant,
antibacterial and anti-inflammatory qualities.
12. गोबर
The old practice of pasting cow dung on walls and outside
their house prevents various diseases/viruses as this cow
dung is anti-biotic and rich in minerals.
13. गोमूत्र
Hindus consider drinking cow urine to cure various
illnesses. Apparently, it does balance bile, mucous and
airs and a remover of heart diseases and effect of poison.
14.शिक्षा
The age-old punishment of doing sit-ups while holding the
ears actually makes the mind sharper and is helpful for
those with Autism, Asperger’s Syndrome, learning
difficulties and behavioural problems.
15. दिया
Lighting ‘diyas’ or oil or ghee lamps in temples and house
fills the surroundings with positivity and recharges your
senses.
16.जनोई ‘
Janoyi’, or the string on a Brahmin’s body, is also a part
of Acupressure ‘Janoyi’ and keeps the wearer safe from
several diseases.
17. तोरण
Decorating the main door with ‘Toran’- a string of
mangoes leaves;neem leaves;ashoka leaves actually
purifies the atmosphere.
18.चरणस्पर्श
Touching your elder’s feet keeps your backbone in good
shape.
19. चिताग्नि
Cremation or burning the dead, is one of the cleanest form
of disposing off the dead body.
20. ॐ
Chanting the mantra ‘Om’ leads to significant reduction in
heart rate which leads to a deep form of relaxation with
increased alertness.
21. हनुमान चालीसा
Hanuman Chalisa, according to NASA, has the exact
calculation of the distance between Sun and the Earth.
22.शंख
The ‘Shankh Dhwani’ creates the sound waves by which
many harmful germs, insects are destroyed.The mosquito
breeding is also affected by Shankh blowing and
decreases the spread of malaria.

Sunday, September 21, 2014

लग्न के अनुसार मंत्र का जाप

लग्न के अनुसार मंत्र का जाप
इष्ट को मनाएँ उनके ही मंत्र से ....
इष्ट का बड़ा महत्व होता है। यदि इष्ट का साथ मिल जाए
तो जीवन की मुश्किलें आसान
होता चली जाती हैं। कुंडली में कितने
भी कष्टकर योग हो, इष्ट की कृपा से
जीवन आसान हो जाता है। अतः हर व्यक्ति को अपने इष्ट और
उसके मन्त्र की जानकारी होना जरूरी है।
लग्न कुंडली का नवम भाव इष्ट का भाव होता है और नवम से
नवम होने से पंचम भाव इष्ट का भाव माना जाता है। इस भाव में
जो राशि होती है उसके ग्रह के देवता ही हमारे
इष्ट कहलाते है। उनका मंत्र ही इष्ट मन्त्र कहलाता है।
यहाँ लग्न के अनुसार आपके इष्टदेव और उनके मंत्र
की जानकारी दी जा रही है।
1. मेष लग्न के इष्ट देव हैं विष्णु जी - मंत्र- ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय
2. वृषभ लग्न के इष्ट हैं गणपति जी - मंत्र- ऊँ गं गणपतये
नमः
3. मिथुन लग्न की इष्टदेवी हैं माँ दुर्गा - मंत्र- ऊँ
दुं दुर्गाय नमः
4. कर्क लग्न के इष्ट हैं हनुमान जी - मंत्र- ऊँ हं
हनुमंताय नमः
5. सिंह लग्न के इष्ट है विष्णु जी - मंत्र- ऊँ नमो भगवते
वासुदेवाय
6. कन्या लग्न के इष्ट हैं शिव जी - मंत्र-ऊँ नमः शिवाय
7. तुला लग्न के इष्ट हैं रूद्र जी - मंत्र- ऊँ रुद्राय नमः
8. वृश्चिक लग्न के इष्ट होंगे विष्णु जी - मंत्र- ऊँ गुं गुरुवे
नमः , ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
9. धनु लग्न के इष्ट है हनुमान जी - मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय
नमः
10. मकर लग्न की इष्ट है
देवी भगवती - मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
11. कुम्भ लग्न के इष्ट है गणपति जी - मंत्र- ऊँ गं गणपतये
नमः
12. मीन लग्न के इष्ट हैं शिव जी - मंत्र- ऊँ
नमः शिवाय
विशेष : इष्ट मंत्र का जाप नियमित रूप से और रोज एक निश्चित समय पर
ही करना चाहिये और कम से कम 108 बार.....

Sunday, May 4, 2014

लाल किताब के अचूक उपाय धन संपत्ति दिलाएं

लाल किताब के अचूक उपाय धन संपत्ति दिलाएं
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Photo: लाल किताब के अचूक उपाय धन संपत्ति दिलाएं
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1 लोहे के पात्र में जल, चीनी, घी तथा दूध का मिश्रण बना कर पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करने से घर में लक्ष्मी का वास होता है।

2 कच्ची धानी के तेल से दीपक जलाएं, उसमें लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें। समस्त विध्नों का नाश होगा और धन प्राप्ती के साधन बनने लगेंगे।

3 धनहानि हो रही हो तो बृहस्पतिवार के दिन मुख्य द्वार पर गुलाल से सुंदर रंगोली बनाएं अथवा गुलाल का छिड़काव करके देसी घी का दो मुख वाला दीपक जलाएं। जब दीपक बढ़ जाए तो उसे चलते हुए पानी में परवाह कर दें।

4 मुट्ठी भर काले तिल लेकर परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर से सात बार फेर कर घर की उत्तर दिशा में फेंक दें। धनहानि समाप्त हो जाएगी।

5 घर से धन का अभाव दूर करने के लिए घर में सोने का चौरस सिक्का रखें, प्रतिदिन कुत्ते को दूध पिलाएं। घर के सभी कमरों में मोर पंख रखें।

6 आर्थिक तंगी से परेशान हों तो मन्दिर में केले के दो पौधे (नर-मादा) का रोपण करें।

7 मां लक्ष्मी के श्री स्वरूप के समक्ष नौ बत्तियों का घी का दीपक जलाने से धन लाभ होने लगता है।

8 कारोबार में दिन दुगुनी रात चौगुणी तरक्की करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को सफेद कपड़े के झंडे को पीपल के वृक्ष पर लगाएं।

9 घर में सुख समृद्धि का समावेश करवाने के लिए उत्तर पश्चिमी कोण में मिट्टी के बर्तन में थोड़े से सोने-चांदी के सिक्के किसी लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर उस बर्तन को गेहूं अथवा चावलों से भर दें।

10 कलह क्लेश से निजात पाने के लिए पके हुए मिट्टी के घड़े पर लाल रंग का पेंट करके उसके मुख पर मोली बांधें और उसके बीच जटायुक्त नारियल रखकर बहते हुए पानी में प्रवाहित कर दें।1 लोहे के पात्र में जल, चीनी, घी तथा दूध का मिश्रण बना कर पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करने से घर में लक्ष्मी का वास होता है।

2 कच्ची धानी के तेल से दीपक जलाएं, उसमें लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें। समस्त विध्नों का नाश होगा और धन प्राप्ती के साधन बनने लगेंगे।

3 धनहानि हो रही हो तो बृहस्पतिवार के दिन मुख्य द्वार पर गुलाल से सुंदर रंगोली बनाएं अथवा गुलाल का छिड़काव करके देसी घी का दो मुख वाला दीपक जलाएं। जब दीपक बढ़ जाए तो उसे चलते हुए पानी में परवाह कर दें।

4 मुट्ठी भर काले तिल लेकर परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर से सात बार फेर कर घर की उत्तर दिशा में फेंक दें। धनहानि समाप्त हो जाएगी।

5 घर से धन का अभाव दूर करने के लिए घर में सोने का चौरस सिक्का रखें, प्रतिदिन कुत्ते को दूध पिलाएं। घर के सभी कमरों में मोर पंख रखें।

6 आर्थिक तंगी से परेशान हों तो मन्दिर में केले के दो पौधे (नर-मादा) का रोपण करें।

7 मां लक्ष्मी के श्री स्वरूप के समक्ष नौ बत्तियों का घी का दीपक जलाने से धन लाभ होने लगता है।

8 कारोबार में दिन दुगुनी रात चौगुणी तरक्की करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को सफेद कपड़े के झंडे को पीपल के वृक्ष पर लगाएं।

9 घर में सुख समृद्धि का समावेश करवाने के लिए उत्तर पश्चिमी कोण में मिट्टी के बर्तन में थोड़े से सोने-चांदी के सिक्के किसी लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर उस बर्तन को गेहूं अथवा चावलों से भर दें।

10 कलह क्लेश से निजात पाने के लिए पके हुए मिट्टी के घड़े पर लाल रंग का पेंट करके उसके मुख पर मोली बांधें और उसके बीच जटायुक्त नारियल रखकर बहते हुए पानी में प्रवाहित कर दें।

ऊपरी हवा पहचान और निदान

ऊपरी हवा पहचान और निदान
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हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं किंतु बहुधा हम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। इन अदृश्य शक्तियों को ही आम जन ऊपरी बाधाओं की संज्ञा देते हैं। भारतीय ज्योतिष में ऐसे कतिपय योगों का उल्लेख है जिनके घटित होने की स्थिति में ये शक्तियां शक्रिय हो उठती हैं और उन योगों के जातकों के जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल देती हैं।
ज्योतिश सिद्धांत के अनुसार गुरु पित्रदोश, शनि यमदोष, चन्द्र व शुक्र जल देवी दोष, राहु सर्प व प्रेत दोष, मंगल शाकिनी दोष, सूर्य देव दोष एवं बुध कुल देवता दोष का कारक होता है। राहु, शनि व केतु ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह हैं। जब किसी व्यक्ति के लग्न (शारीर), गुरु (ज्ञान), त्रिकोण (धर्म भाव) तथा द्विस्वभाव राशियों पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, तो उस पर ऊपरी हवा क़ी संभावना होती है।
प्राय: सभी धर्मग्रंथों में ऊपरी हवाओं, नज़र दोषों आदि का उल्लेख है। कुछ ग्रंथों में इन्हें बुरी आत्मा कहा गया है तो कुछ अन्य में भूत-प्रेत और जिन्न।

कब और किन परिस्थितियों में डालती हैं ऊपरी हवाओं किसी व्यक्ति पर अपना प्रभाव?
जब कोई व्यक्ति दूध पीकर या कोई सफ़ेद मिठाई खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तब ऊपरी हवाएं उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गन्दी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है, इसीलिए ऐसे जगहों पर जाने वाले लोगों को ये हवाएं अपने प्रभाव में ले लेती हैं। इन हवाओं का प्रभाव रजस्वला स्त्रियों पर भी पड़ता है। कुएं, बावड़ी आदि पर भी इनका वास होता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के अवसर पर ये हवाएं सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त रात और दिन के 12 बजे दरवाजे क़ी चौखट पर इनका प्रभाव होता है।

दूध व सफ़ेद मिठाई चन्द्र के घोतक हैं। चौराहा राहु का घोतक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, अतः जब कोई व्यक्ति उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है, तो उस पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव क़ी संभावना रहती है।

कोई स्त्री जब राजस्वला होती है, तब उसका चन्द्र व मंगल दोनों दुर्बल हो जाते हैं। ये दोनों राहु व शनि के शत्रु हैं। रजस्वलावस्था में स्त्री अशुद्ध होती है और अशुद्धता राहु क़ी घोतक है। ऐसे में उस स्त्री पर ऊपरी हवाओं के प्रकोप क़ी संभावना रहती है। कुएं एवं बावड़ी का अर्थ होता है जल स्थान और चन्द्र जल स्थान का कारक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, इसलिये ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।
मनुष्य क़ी दायीं आँख पर सूर्य का और बायीं पर चन्द्र का नियंत्रण होता है। इसलिए ऊपरी हवाओं का प्रभाव सबसे पहले पहले आँखों पर ही पड़ता है।

किसी स्त्री के सप्तम भाव में शनि, मंगल और राहु या केतु क़ी युति हो, तो उसके उसके पिशाच पीड़ा से ग्रस्त होने की संभावना रहती है। गुरु नीच राशि अथवा नीच राशि के नवांश में हो, या राहु सेयुत हो और उस पर पाप ग्रहों क़ी दृष्टी हो, तो जातक क़ी चंडाल प्रवति होती है।

पंचम भाव में शनि का सम्बन्ध बने तो व्यक्ति प्रेत एवं क्षुद्र देवियों क़ी भक्ति करता है।

* उपरी हवाओं से मुक्ति हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अग्नि तथा लाल मिर्ची जलानी चाहिए।

* रोज़ सूर्यास्त के समय एक साफ़- सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो कच्चा दूध लेकर उसमें शुद्ध शहद क़ी 9 बूँदें मिला लें। फिर स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर मकान क़ी छत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तक और बस हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें। क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरण करते रहे। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी उपरी हवाएं दूर हो जायेंगी।

* रविवार को बांह पर काले धतूरे क़ी जड़ बांधें, उपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी ।
* लहसून के रस में हींग घोलकर आँख में डालने या सुंघाने से पीड़ित व्यक्ति को उपरी हवाओं से मुक्ति मिल जाती है।

* उपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए। "ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रुदाय नम: सिद्धि स्वाहा।"

* घर के मुख्य द्वार के समीप श्वेतार्क का पौधा लगायें, घर उपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।
* उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी क़ी विशिष्ट वस्तुएं डालें और उससे उत्पन्न होने वाला धुंआ पीड़ित व्यक्ति को सुंघाएं। यह क्रिया किसी ऐसे व्यक्ति से करवाएं जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।

* प्रातः काल बीज मंत्र 'क्लीं' का उच्चारण करते हुए काली मिर्च के 9 दाने सिर पर से घुमाकर दक्षिण दिशा क़ी और फेंक दें, उपरी बला दूर हो जायेगी।

* रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपडे क़ी छोटी थैली में तुलसी के 8 पत्ते, 8 काली मिर्च और सहदेई क़ी जड़ बंधकर गले में धारण करें, नजर दोष बाधा से मुक्ति मिलेगी।

* निम्नोक्त मंत्र का 108 बार जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उससे पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर मालिश करें, व्यक्ति पीडामुक्त हो जाएगा। मंत्र : ॐ नमोह काली कपाला देहि देहि स्वाहा ।
उपरी हवाओं के शक्तिशाली होने क़ी स्थिति में शाबर मन्त्रों का जप एवं प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मन्त्रों का दीपावली क़ी रात को अथवा होलिका दहन क़ी रात को जलती हुई होली के सामने या फिर शमशान में 108 बार जप कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। यहाँ यह उल्लेख कर देना आवश्यक है क़ी इन्हें सिद्ध करने के इच्छुक साधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।

* थोड़ी सी हल्दी को 3 बार निम्नलिखित मंत्र से अभिमंत्रित करके अग्नि में इस तरह चोदें क़ी उसका धुंआ रोगी के मुख क़ी और जाए। इसे हल्दी बाण मंत्र कहते हैं।

हल्दी गीरी बाण बाण को लिया हाथ उठाय ।

हल्दी बाण से नीलगिरी पहाड़ थहराय ॥

यह सब देख बोलत बीर हनुमान ।

डाइन योगिनी भूत प्रेत मुंड काटौ तान ॥

आज्ञा कामरू कामाक्षा माई ।

आज्ञा हाडि की चंडी की दोहाई ॥
* एक मुठ्ठी धुल को निम्नोक्त मंत्र से 3 बार अभिमंत्रित करें और नज़र दोष से ग्रस्त व्यक्ति पर फेकें, व्यक्ति को दोष से मुक्ति मिलेगी।
ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्ति के सरल उपाय
ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताए गए हैं। अथर्ववेद में इस हेतु कई मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है। आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुक्ति के उपायों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों का विवरण प्रस्तुत है।

ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अग्नि तथा लाल मिर्ची जलानी चाहिए।
रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो कच्चा दूध लेकर उसमें शुद्ध शहद की नौ बूंदें मिला लें। फिर स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर मकान
की छत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तक आएं और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें। क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरण करते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएं दूर हो जाएंगी।
रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।
लहसुन के रस में हींग घोलकर आंख में डालने या सुंघाने से पीड़ित व्यक्ति को ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिल जाती है।
ऊपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।
" ओम नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रुद्राय नमः सिद्धि स्वाहा।''
घर के मुख्य द्वार के समीप श्वेतार्क का पौधा लगाएं, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।
उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएं डालें और उससे उत्पन्न होने वाला धुआं पीड़ित व्यक्त्ि को सुंघाएं। यह क्रिया किसी ऐसे व्यक्ति से करवाएं जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।
प्रातः काल बीज मंत्र ÷क्लीं' का उच्चारण करते हुए काली मिर्च के नौ दाने सिर पर से घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें, ऊपरी बला दूर हो जाएगी।
रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठ पत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेई की जड़ बांधकर गले में धारण करें, नजर दोष बाधा से मुक्ति मिलेगी।
निम्नोक्त मंत्र का १०८ बार जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उससे पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जाएगा।
मंत्र : ओम नमो काली कपाला देहि देहि स्वाहा।
ऊपरी हवाओं के शक्तिषाली होने की स्थिति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहन की रात को जलती हुई होली के सामने या फिर श्मषान में १०८ बार जप कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। यहां यह उल्लेख कर देना आवष्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुक साधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।
निम्न मंत्र से थोड़ा-सा जीरा ७ बार अभिमंत्रित कर रोगी के शरीर से स्पर्श कराएं और उसे अग्नि में डाल दें। रोगी को इस स्थिति में बैठाना चाहिए कि उसका धूंआ उसके मुख के सामने आये। इस प्रयोग से भूत-प्रेत बाधा की निवृत्ति होती है।

मंत्र : जीरा जीरा महाजीरा जिरिया चलाय। जिरिया की शक्ति से फलानी चलि जाय॥ जीये तो रमटले मोहे तो मशान टले। हमरे जीरा मंत्र से अमुख अंग भूत चले॥ जाय हुक्म पाडुआ पीर की दोहाई॥
एक मुट्ठी धूल को निम्नोक्त मंत्र से ३ बार अभिमंत्रित करें और नजर दोष से ग्रस्त व्यक्ति पर फेंकें, व्यक्ति को दोष से मुक्ति मिलेगी।
मंत्र : तह कुठठ इलाही का बान। कूडूम की पत्ती चिरावन। भाग भाग अमुक अंक से भूत। मारुं धुलावन कृष्ण वरपूत। आज्ञा कामरु कामाख्या। हारि दासीचण्डदोहाई।
थोड़ी सी हल्दी को ३ बार निम्नलिखित मंत्र से अभिमंत्रित करके अग्नि में इस तरह छोड़ें कि उसका धुआं रोगी के मुख की ओर जाए। इसे हल्दी बाण मंत्र कहते हैं।
हल्दी गीरी बाण बाण को लिया हाथ उठाय। हल्दी बाण से नीलगिरी पहाड़ थहराय॥ यह सब देख बोलत बीर हनुमान। डाइन योगिनी भूत प्रेत मुंड काटौ तान॥ आज्ञा कामरु कामाक्षा माई। आज्ञा हाड़ि की चंडी की दोहाई॥
जौ, तिल, सफेद सरसों, गेहूं, चावल, मूंग, चना, कुष, शमी, आम्र, डुंबरक पत्ते और अषोक, धतूरे, दूर्वा, आक व ओगां की जड़ को मिला लें और उसमें दूध, घी, मधु और गोमूत्र मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। फिर संध्या काल में हवन करें और निम्न मंत्रों का १०८ बार जप कर इस मिश्रण से १०८ आहुतियां दें।
मंत्र : ओम नमः भवे भास्कराय आस्माक अमुक सर्व ग्रहणं पीड़ा नाशनं कुरु-कुरु स्वाहा।

मानसिक तनाव से मुक्ति का अचूक मंत्र ....... तनाव से देता है छुटकारा, यह चमत्कारी मंत्र

मानसिक तनाव से मुक्ति का अचूक मंत्र ....... तनाव से देता है छुटकारा, यह चमत्कारी मंत्र
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यदि आप किसी वजह से मानसिक तनाव में रहते हैं अथवा किसी अज्ञात भय से पीड़ित हैं, अपने आपको असु‍रक्षित महसूस करते हैं तो उसके लिए 11 बुधवार लगातार 1 नारियल नीले वस्त्र में लपेटकर किसी भिखारी को दान करें।

अपने शयनकक्ष में तांबे का एक पिरामिड स्थापित करें।
नित्य मानसिक रूप से निम्न मंत्र का जाप अवश्य किया करें।

मंत्र :
ॐ अतिक्रकर महाकाय, कल्पान्त दहनोपम
भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमहसि!!

इस उपरोक्त उपाय से एक ओर जहां आपको मानसिक तनाव/ भय/ दबाव इत्यादि से मुक्ति मिलेगी वहीं परिवार में अगर कोई नकारात्मक‍ विचारधारा का है तो उसके विचारों में भी परिवर्तन आना आरंभ होगा।

वैदिक ज्योतिष »----ज्योतिष--कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम

वैदिक ज्योतिष »----ज्योतिष--कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम
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Photo: वैदिक ज्योतिष »----ज्योतिष--कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम
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ज्योतिष को संसार में विज्ञान का दर्जा देने से कितने ही विज्ञान-कर्ता कतराते है. कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है, जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये. वातावरण के परिवर्तन जैसे तूफ़ान आना,चक्रवात का पैदा होना और हवाओं का रुख बदलना,भूकम्प आना,बाढ की सूचना देना आदि मौसम विज्ञान के अनुसार कथित किया जाता है.
पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के द्वारा ब्रहमाण्ड से आने वाली अनन्त शक्तियों का प्रवाह का कथन पुराणो मे भी मिलता है. जिन्हे धनात्मक शक्तियों का रूप प्रदान किया गया है और दक्षिणी ध्रुव से नकारात्मक शक्तियों का प्रवाह पृथ्वी पर प्रवाहित होने से ही वास्तु-शास्त्र को कथित करने में वैज्ञानिकों को सहायता मिली है.कहावत है कि जब हवायें थम जाती है तो आने वाले किसी तूफ़ान का अंदेशा रहता है. यह सब प्राथमिक सूचनायें भी हमें ज्योतिष द्वारा ही मिलती है. वातावरण की जानकारी और वातावरण के द्वारा प्रेषित सूचनाओं के आधार पर ही प्राचीन समय से ही वैज्ञानिक अपने कथनो को सिद्ध करते आये है,जो आज तक भी सत्यता की कसौटी पर सौ प्रतिशत खरे उतरते है. अगर आज का मानव अनिष्ट सूचक घटनाओ को इस विज्ञान के माध्यम से जान ले तो वह मानव की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि होगी.
ब्रह्माजी से जब सर्व प्रथम यह विद्या गर्ग ऋषि ने प्राप्त की और उसके बाद अन्य लोग इस विद्या को जान सके. प्राचीन काल से ही ऋषियों-मुनियों ने अपनी खोजबीन और पराविज्ञान की मदद से इस विद्या का विकास किया, उन रहस्यों को जाना जिन्हे आज का मानव अरबों-खरबों डालर खर्च करने के बाद भी पूरी तरह से प्राप्त नही कर सका है. तल,वितल,सुतल,तलातल,पाताल,धरातल और महातल को ऋषियों ने पहले ही जान लिया था उनकी व्याख्या "सुखसागर" आदि ग्रंथों में बहुत ही विस्तृत रूप से की गई है. प्राकृतिक रहस्यों को सुलझाने के लिये परा और अपरा विद्याओं को स्थापित कर दिया था. परा विद्याओं का सम्बन्ध वेदों में निहित किया था. ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत खगोलशास्त्र,पदार्थ विज्ञान,आयुर्वेद और गणित का अध्ययन प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है. उस समय के एक डाक्टर को ज्योतिषी और अध्यापक होना अनिवार्य माना जाता था और ज्योतिषी को भी डाक्टरी और अध्यापन मे प्रवीण होना जरूरी था. कालान्तर के बाद आर्यभट्ट और बाराहमिहिर ने शास्त्र का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किये.
"भास्कराचार्य" ने तो न्यूटन से बहुत पहले ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था,जिसे उन्होने अपने ग्रंथ "सिद्धान्तशिरोमणि" में प्रस्तुत किया है. "आकृष्ट शक्ति च महीतया,स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या" अर्थात पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है,जिससे वह अपने आस पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है.
आज से २२०० साल पहले बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्रों और ७ ग्रहों तथा ध्रुव तारे का को वेधने के लिये एक बडे जलाशय में स्तम्भ का निर्माण करवाया था,जिसकी चर्चा "भागवतपुराण" मे की गई है. स्तम्भ मे सात ग्रहों के लिये सात मंजिले,और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाये थे. इसके चारों तरफ़ २७ वेधशालायें मन्दिरों के रूप में बनी थीं. प्राचीन भारतीय शासक कुतुब्द्दीन ऐबक ने उन सब वेधशालाओं को तुडवाकर वहाँ मस्जिद बनवा दी थी और रही सही कसर अन्ग्रेजी शासन नें निकाल दी, जिन्होने इस स्तम्भ के ऊपरी भाग को भी तुडवा दिया था. हालॉकि आज भी वह ७६ फ़ुट शेष है. यह वही दिल्ली की प्रसिद्ध "कुतुबमीनार" है, जिसे सारी दुनिया जानती है.
ज्योतिष विज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी है,जितना कि कभी पुरातन काल में था. मुस्लिम ज्योतिषी इब्बनबतूता और अलबरूनो ने भारत मे रह कर संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया और अनेक ज्योतिष ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया और अरब देशों में इसका प्रचार प्रसार किया. "अलबरूनो" ने "इन्डिका" नामक ग्रन्थ लिखा जिसका अनुवाद बाद में जर्मन भाषा में किया गया था. जर्मन विद्वानो ने जब यह पुस्तक पढी तो उनका ध्यान भारत की ओर आकर्षित हुआ और उन लोगो ने यहां के अनेक प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद किया. यूनान के प्रसिद्ध "यवनाचार्य" ने भारत मे ही रह कर कई ग्रन्थ ज्योतिष के लिखे.
लन्दन के प्रसिद्ध विद्वान "फ़्रान्सिस हचिंग" ने शोध द्वारा यह सिद्ध किया कि मिश्र के "पिरामिड" और उनमे रखे जाने वाले शवों का स्थान ज्योतिषीय रूप रेखा के द्वारा ही तय किया जाता था
कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम:---
ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है. सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है. सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है. जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है. पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है. मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानवी प्रकृति पर भी पडता है. पूर्णिमा के दिन होने वाली अपराधों में बढोत्तरी को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है. जो लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त होते हैं, उनकी विक्षिप्तता भी इसी तिथि को अधिक रहती है. आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक देखने को मिलते है. इस दिन सामान्यत: स्त्रियों में मानसिक तनाव भी कुछ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक तीव्रता से बढती है. सूर्योदय के पश्चात वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है. आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है. कहा भी जाता है कि "संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है. प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है. बस आवश्यकता महज उसे पहचानने की होती है".
’ग्रहाधीन जगत सर्वम". विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससे सभी ग्रह पैदा हुए है. गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है. रूस के वैज्ञानिक "चीजेविस्की" ने सन १९२० में अन्वेषण किया था कि हर ११ वर्ष के अन्तराल पर सूर्य में एक विस्फ़ोट होता है जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है. इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल, लडाई झगडे, मारकाट होती है. युद्ध भी इसी समय मे अधिक होते है. पुरुषों का खून पतला हो जाता है. पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है. आमतौर पर आप देखें तो पायेंगें कि श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक अधिक रूप से बढ जाता है. मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है.
बताईये क्या इतने सब कारण क्या ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये पर्याप्त नही है?ज्योतिष को संसार में विज्ञान का दर्जा देने से कितने ही विज्ञान-कर्ता कतराते है. कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है, जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये. वातावरण के परिवर्तन जैसे तूफ़ान आना,चक्रवात का पैदा होना और हवाओं का रुख बदलना,भूकम्प आना,बाढ की सूचना देना आदि मौसम विज्ञान के अनुसार कथित किया जाता है.
पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के द्वारा ब्रहमाण्ड से आने वाली अनन्त शक्तियों का प्रवाह का कथन पुराणो मे भी मिलता है. जिन्हे धनात्मक शक्तियों का रूप प्रदान किया गया है और दक्षिणी ध्रुव से नकारात्मक शक्तियों का प्रवाह पृथ्वी पर प्रवाहित होने से ही वास्तु-शास्त्र को कथित करने में वैज्ञानिकों को सहायता मिली है.कहावत है कि जब हवायें थम जाती है तो आने वाले किसी तूफ़ान का अंदेशा रहता है. यह सब प्राथमिक सूचनायें भी हमें ज्योतिष द्वारा ही मिलती है. वातावरण की जानकारी और वातावरण के द्वारा प्रेषित सूचनाओं के आधार पर ही प्राचीन समय से ही वैज्ञानिक अपने कथनो को सिद्ध करते आये है,जो आज तक भी सत्यता की कसौटी पर सौ प्रतिशत खरे उतरते है. अगर आज का मानव अनिष्ट सूचक घटनाओ को इस विज्ञान के माध्यम से जान ले तो वह मानव की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि होगी.

ब्रह्माजी से जब सर्व प्रथम यह विद्या गर्ग ऋषि ने प्राप्त की और उसके बाद अन्य लोग इस विद्या को जान सके. प्राचीन काल से ही ऋषियों-मुनियों ने अपनी खोजबीन और पराविज्ञान की मदद से इस विद्या का विकास किया, उन रहस्यों को जाना जिन्हे आज का मानव अरबों-खरबों डालर खर्च करने के बाद भी पूरी तरह से प्राप्त नही कर सका है. तल,वितल,सुतल,तलातल,पाताल,धरातल और महातल को ऋषियों ने पहले ही जान लिया था उनकी व्याख्या "सुखसागर" आदि ग्रंथों में बहुत ही विस्तृत रूप से की गई है. प्राकृतिक रहस्यों को सुलझाने के लिये परा और अपरा विद्याओं को स्थापित कर दिया था. परा विद्याओं का सम्बन्ध वेदों में निहित किया था. ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत खगोलशास्त्र,पदार्थ विज्ञान,आयुर्वेद और गणित का अध्ययन प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है. उस समय के एक डाक्टर को ज्योतिषी और अध्यापक होना अनिवार्य माना जाता था और ज्योतिषी को भी डाक्टरी और अध्यापन मे प्रवीण होना जरूरी था. कालान्तर के बाद आर्यभट्ट और बाराहमिहिर ने शास्त्र का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किये.
"भास्कराचार्य" ने तो न्यूटन से बहुत पहले ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था,जिसे उन्होने अपने ग्रंथ "सिद्धान्तशिरोमणि" में प्रस्तुत किया है. "आकृष्ट शक्ति च महीतया,स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या" अर्थात पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है,जिससे वह अपने आस पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है.
आज से २२०० साल पहले बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्रों और ७ ग्रहों तथा ध्रुव तारे का को वेधने के लिये एक बडे जलाशय में स्तम्भ का निर्माण करवाया था,जिसकी चर्चा "भागवतपुराण" मे की गई है. स्तम्भ मे सात ग्रहों के लिये सात मंजिले,और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाये थे. इसके चारों तरफ़ २७ वेधशालायें मन्दिरों के रूप में बनी थीं. प्राचीन भारतीय शासक कुतुब्द्दीन ऐबक ने उन सब वेधशालाओं को तुडवाकर वहाँ मस्जिद बनवा दी थी और रही सही कसर अन्ग्रेजी शासन नें निकाल दी, जिन्होने इस स्तम्भ के ऊपरी भाग को भी तुडवा दिया था. हालॉकि आज भी वह ७६ फ़ुट शेष है. यह वही दिल्ली की प्रसिद्ध "कुतुबमीनार" है, जिसे सारी दुनिया जानती है.
ज्योतिष विज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी है,जितना कि कभी पुरातन काल में था. मुस्लिम ज्योतिषी इब्बनबतूता और अलबरूनो ने भारत मे रह कर संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया और अनेक ज्योतिष ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया और अरब देशों में इसका प्रचार प्रसार किया. "अलबरूनो" ने "इन्डिका" नामक ग्रन्थ लिखा जिसका अनुवाद बाद में जर्मन भाषा में किया गया था. जर्मन विद्वानो ने जब यह पुस्तक पढी तो उनका ध्यान भारत की ओर आकर्षित हुआ और उन लोगो ने यहां के अनेक प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद किया. यूनान के प्रसिद्ध "यवनाचार्य" ने भारत मे ही रह कर कई ग्रन्थ ज्योतिष के लिखे.
लन्दन के प्रसिद्ध विद्वान "फ़्रान्सिस हचिंग" ने शोध द्वारा यह सिद्ध किया कि मिश्र के "पिरामिड" और उनमे रखे जाने वाले शवों का स्थान ज्योतिषीय रूप रेखा के द्वारा ही तय किया जाता था
कसौटी पर खरे उतरते वैज्ञानिक नियम:---
ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है. सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है. सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है. जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है. पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है. मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानवी प्रकृति पर भी पडता है. पूर्णिमा के दिन होने वाली अपराधों में बढोत्तरी को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है. जो लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त होते हैं, उनकी विक्षिप्तता भी इसी तिथि को अधिक रहती है. आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक देखने को मिलते है. इस दिन सामान्यत: स्त्रियों में मानसिक तनाव भी कुछ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक तीव्रता से बढती है. सूर्योदय के पश्चात वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है. आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है. कहा भी जाता है कि "संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है. प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है. बस आवश्यकता महज उसे पहचानने की होती है".
’ग्रहाधीन जगत सर्वम". विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससे सभी ग्रह पैदा हुए है. गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है. रूस के वैज्ञानिक "चीजेविस्की" ने सन १९२० में अन्वेषण किया था कि हर ११ वर्ष के अन्तराल पर सूर्य में एक विस्फ़ोट होता है जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है. इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल, लडाई झगडे, मारकाट होती है. युद्ध भी इसी समय मे अधिक होते है. पुरुषों का खून पतला हो जाता है. पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है. आमतौर पर आप देखें तो पायेंगें कि श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक अधिक रूप से बढ जाता है. मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है.
बताईये क्या इतने सब कारण क्या ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये पर्याप्त नही है?

रावण सहिंता के ये उपाय चमका देंगे आपकी किस्मत को

रावण सहिंता के ये उपाय चमका देंगे आपकी किस्मत को 
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बहुत कम लोग जानते हैं। रावण सभी शास्त्रों का जानकार और श्रेष्ठ विद्वान था।
रावण ने भी ज्योतिष और तंत्र शास्त्र की रचना की है। दशानन ने ऐसे कई उपाय बताए हैं जिनसे किसी भी व्यक्ति की किस्मत रातोंरात बदल सकती है।

यहां जानिए रावण संहिता के अनुसार कुछ ऐसे तांत्रिक उपाय जिनसे किसी भी व्यक्ति की किस्मत चमक सकती है...
महाज्ञानी रावण कई चीजों में पारंगत था। ज्योतिष शास्त्र में भी उसे महारत हासिल थी। तंत्र शास्त्र का भी वह महाज्ञाता था। इसी वजह से जो भी दशानन के संपर्क में आता था वह सहसा ही उससे मोहित हो जाता था।

बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रावण का प्रभाव उसकी तांत्रिक साधना के बल पर था। रावण कई ऐसे उपाय भी करता था जिससे जो भी सामान्य इंसान उसे देखता था वह आकर्षित हो जाता था।

रावण संहिता में कुछ ऐसे ही खास प्रकार के तांत्रिक तिलक की चर्चा की गई है। जो भी व्यक्ति यह तिलक लगाता है सहज ही लोग उसकी तरफ खिंचे चले आते हैं। यहां जानिए कि कौन-कौन से हैं वह तांत्रिक तिलक......

1. धन प्राप्ति का उपाय: किसी भी शुभ मुहूर्त में या किसी शुभ दिन में सुबह जल्दी उठें। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी पवित्र नदी या जलाशय के किनारे जाएं। किसी शांत एवं एकांत स्थान पर वट वृक्ष के नीचे चमड़े का आसन बिछाएं। आसन पर बैठकर धन प्राप्ति मंत्र का जप करें।

धन प्राप्ति का मंत्र: ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं नम: ध्व: ध्व: स्वाहा।

इस मंत्र का जप आपको 21 दिनों तक करना चाहिए। मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें। 21 दिनों में अधिक से अधिक संख्या में मंत्र जप करें।
जैसे ही यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा आपको अचानक धन प्राप्ति अवश्य कराएगा।

2.यदि किसी व्यक्ति को धन प्राप्त करने में बार-बार रुकावटें आ रही हों तो उसे यह उपाय करना चाहिए।
यह उपाय 40 दिनों तक किया जाना चाहिए। इसे अपने घर पर ही किया जा सकता है। उपाय के अनुसार धन प्राप्ति मंत्र का जप करना है। प्रतिदिन 108 बार।
मंत्र: ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा।
इस मंत्र का जप नियमित रूप से करने पर कुछ ही दिनों महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो जाएगी और आपके धन में आ रही रुकावटें दूर होने लगेंगी।

3. यदि आप दसों दिशाओं से यानी चारों तरफ से पैसा प्राप्त करना चाहते हैं तो यह उपाय करें। यह उपाय दीपावली के दिन किया जाना चाहिए।
दीपावली की रात में विधि-विधान से महालक्ष्मी का पूजन करें। पूजन के सो जाएं और सुबह जल्दी उठें। नींद से जागने के बाद पलंग से उतरे नहीं बल्कि यहां दिए गए मंत्र का जप 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ नमो भगवती पद्म पदमावी ऊँ ह्रीं ऊँ ऊँ पूर्वाय दक्षिणाय उत्तराय आष पूरय सर्वजन वश्य कुरु कुरु स्वाहा।
शय्या पर मंत्र जप करने के बाद दसों दिशाओं में दस-दस बार फूंक मारें। इस उपाय से साधक को चारों तरफ से पैसा प्राप्त होता है

4.सफेद आंकड़े को छाया में सुखा लें। इसके बाद कपिला गाय यानी सफेद गाय के दूध में मिलाकर इसे पीस लें और इसका तिलक लगाएं। ऐसा करने पर व्यक्ति का समाज में वर्चस्व हो जाता है।

5.यदि आपको ऐसा लगता है कि किसी स्थान पर धन गढ़ा हुआ है और आप वह धन प्राप्त करना चाहते हैं तो यह उपाय करें।
गड़ा धन प्राप्त करने के लिए यहां दिए गए मंत्र का जप दस हजार बार करना होगा।
मंत्र: ऊँ नमो विघ्नविनाशाय निधि दर्शन कुरु कुरु स्वाहा।
गड़े हुए धन के दर्शन करने के लिए विधि इस प्रकार है। किसी शुभ दिवस में यहां दिए गए मंत्र का जप हजारों की संख्या करें। मंत्र सिद्धि हो जाने के बाद जिस स्थान पर धन गड़ा हुआ है वहां धतुरे के बीज, हलाहल, सफेद घुघुंची, गंधक, मैनसिल, उल्लू की विष्ठा, शिरीष वृक्ष का पंचांग बराबर मात्रा में लें और सरसों के तेल में पका लें। इसके बाद इस सामग्री से गड़े धन की शंका वाले स्थान पर धूप-दीप ध्यान करें। यहां दिए गए मंत्र का जप हजारों की संख्या में करें।
ऐसा करने पर उस स्थान से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का साया हट जाएगा। भूत-प्रेत का भय समाप्त हो जाएगा। साधक को भूमि में गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगेगा।
ध्यान रखें तांत्रिक उपाय करते समय किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी का परामर्श अवश्य लें।

6.शास्त्रों के अनुसार दूर्वा घास चमत्कारी होती है। इसका प्रयोग कई प्रकार के उपायों में भी किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति सफेद दूर्वा को कपिला गाय यानी सफेद गाय के दूध के साथ पीस लें और इसका तिलक लगाएं तो वह किसी भी काम में असफल नहीं होता है।

7.महालक्ष्मी की कृपा तुरंत प्राप्त करने के लिए यह तांत्रिक उपाय करें।
किसी शुभ मुहूर्त जैसे दीपावली, अक्षय तृतीया, होली आदि की रात यह उपाय किया जाना चाहिए। दीपावली की रात में यह उपाय श्रेष्ठ फल देता है। इस उपाय के अनुसार आपको दीपावली की रात कुमकुम या अष्टगंध से थाली पर यहां दिया गया मंत्र लिखें।
मंत्र: ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी, महासरस्वती ममगृहे आगच्छ-आगच्छ ह्रीं नम:।
इस मंत्र का जप भी करना चाहिए। किसी साफ एवं स्वच्छ आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला या कमल गट्टे की माला के साथ मंत्र जप करें। मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए। अधिक से अधिक इस मंत्र की आपकी श्रद्धानुसार बढ़ा सकते हैं।
इस उपाय से आपके घर में महालक्ष्मी की कृपा बरसने लगेगी।

8.अपामार्ग के बीज को बकरी के दूध में मिलाकर पीस लें, लेप बना लें। इस लेप को लगाने से व्यक्ति का समाज में आकर्षण काफी बढ़ जाता है। सभी लोग इनके कहे को मानते हैं।

9.यदि आप देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की कृपा से अकूत धन संपत्ति चाहते हैं तो यह उपाय करें।
उपाय के अनुसार आपको यहां दिए जा रहे मंत्र का जप तीन माह तक करना है। प्रतिदिन मंत्र का जप केवल 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवाणाय, धन धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।
मंत्र जप करते समय अपने पास धनलक्ष्मी कौड़ी रखें। जब तीन माह हो जाएं तो यह कौड़ी अपनी तिजोरी में या जहां आप पैसा रखते हैं वहां रखें। इस उपाय से जीवनभर आपको पैसों की कमी नहीं होगी।

10.यदि आप घर या समाज या ऑफिस में लोगों को आकर्षित करना चाहते हैं तो बिल्वपत्र तथा बिजौरा नींबू लेकर उसे बकरी के दूध में मिलाकर पीस लें। इसके बाद इससे तिलक लगाएं। ऐसा करने पर व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है।

(मोटापा) घटाने में अत्यंत सहायक हैं. सूर्य मुद्रा :- हस्त-मुद्रा-चिकित्सा

(मोटापा) घटाने में अत्यंत सहायक हैं. सूर्य मुद्रा :- हस्त-मुद्रा-चिकित्सा
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मानव-सरीर अनन्त रहस्योंसे भरा हुआ है । शरीरकी अपनी एक मुद्रामयी भाषा है । जिसे करनेसे शारीरिक स्वास्थ्य-लाभ में सहयोग होता है । यह शरीर पंचतत्त्वोंके योगसे बना है । पाँच तत्त्व ये हैं-
(1) पृथ्वी, (2) जल, (3) अग्नि, (4) वायु, एवं (5) आकाश । शरीर में जब भी इन तत्त्वोंका असंतुलन होता है, तो रोग पैदा हो जाते हैं । यदि हम इनका संतुलन करना सीख जायँ तो बीमार हो ही नहीं सकते एवं यदि हो भी जायँ तो इन तत्त्वोंको संतुलित करके आरोग्यता वापस ला सकते हैं ।

हस्त-मुद्रा-चिकित्साके अनुसार हाथ तथा हाथोंकी अँगुलियों और अँगुलियोंसे बननेवाली मुद्राओंमें आरोग्यका राज छिपा हुआ है । हाथकी अँगुलियोंमें पंचतत्त्व प्रतिष्ठित हैं ।

ऋषि-मुनियोंने हजारों साल पहले इसकी खोज कर ली थी एवं इसे उपयोगमें बराबर प्रतिदिन लाते रहे, इसीलिये वे लोग स्वस्थ रहते थे । ये शरीरमें चैतन्यको अभिव्यक्ति देनेवाली कुंजियाँ हैं ।

मनुष्यका मस्तिष्क विकसित है, उसमें अनंत क्षमताएँ हैं । ये क्षमताएँ आवृत हैं, उन्हें अनावृत करके हम अपने लक्ष्यको पा सकते हैं ।

नृत्य करते समय भी मुद्राएँ बनायी जाती हैं, जो शरीर हजारों नसों एवं नाडियोंको प्रभावित करती हैं और उनका प्रभाव भी शरीरपर अच्छा पड़ता है ।

हस्त-मुद्राएँ तत्काल ही असर करना शुरू कर देती हैं । जिस हाथमें ये मुद्राएँ बनाते हैं, शरीरके विपरीत भागमें उनका तुरंत असर होना शुरू हो जाता है । इन सब मुद्राओंका प्रयोग करते समय वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासनका प्रयोग करना चाहिये ।

इन मुद्राओंको प्रतिदिन तीससे पैंतालीस मिनटतक करनेसे पूर्ण लाभ होता है । एक बारमें न कर सके तो दो-तीन बारमें भी किया जा सकता है ।

किसी भी मुद्राको करते समय जिन अँगुलियोंका कोई काम न हो उन्हें सीधी रखे ।
सूर्य मुद्रा हमारे भीतर के अग्नि तत्व को संचालित करती है। सूर्य की अँगुली अनामिका को रिंग फिंगर भी कहते हैं। इस अँगुली का संबंध सूर्य और यूरेनस ग्रह से है। सूर्य ऊर्जा स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करती है और यूरेनस कामुकता, अंतर्ज्ञान और बदलाव का प्रतीक है।

विधि : अंगूठे से तीसरी अंगुली अनामिका (रिंग फिंगर) को मोड़कर उसके ऊपरी नाखून वाले भाग को अंगूठे के जड़ (गद्देदार भाग) पर दवाब(हल्का) डालें और अंगूठा मोड़कर अनामिका पर निरंतर दवाब(हल्का) बनाये रखें तथा शेष अँगुलियों को अपने सीध में सीधा रखें.....इस तरह जिस मुद्रा का निर्माण होगा उसे सूर्य मुद्रा कहते हैं...

लाभ : इस मुद्रा का रोज दो बार 5 से 15 मिनट के लिए अभ्यास करने से शरीर का कोलेस्ट्रॉल घटता है। वजन कम करने के लिए भी इस मुद्रा का उपयोग किया जाता है। पेट संबंधी रोगों में भी यह मुद्रा लाभदायक है। बेचैनी और चिंता कम होकर दिमाग शांत बना रहता है। यह मुद्रा शरीर की सूजन मिटाकर उसे हलका बनाती है।
यह मुद्रा शारीरिक स्थूलता (मोटापा) घटाने में अत्यंत सहायक होता है...जो लोग मोटापे से परेशान हैं,इस मुद्रा का प्रयोग कर फलित होते देख सकते हैं..

( अनामिका को महत्त्व लगभग सभी धर्म सम्प्रदाय में दिया गया है.इसे बड़ा ही शुभ और मंगलकारी माना गया है.हिन्दुओं में पूजा पाठ उत्सव आदि पर मस्तक पर जो तिलक लगाया जाता है,वह इसलिए कि ललाट में जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है योग के अनुसार मस्तक के उस भाग में द्विदल कमल होता है और अनामिका द्वारा उस स्थान के स्पर्श से मस्तिष्क की अदृश्य शक्ति जागृत हो जाती हैं,व्यक्तित्व तेजोमय हो जाता है)

हाथ में कौन सी अंगुली पर तिल हो तो क्या होता है?

हाथ में कौन सी अंगुली पर तिल हो तो क्या होता है?
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Photo: हाथ में कौन सी अंगुली पर तिल हो तो क्या होता है?
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिल भी हमारे स्वभाव और भविष्य को प्रभावित करते हैं। शरीर के अलग-अलग अंगों पर तिल होना अलग-अलग प्रभाव देता है। ऐसा माना जाता है कि पुरुषों के लिए दाएं अंग पर तिल होना शुभ है और बाएं अंग पर तिल होना अशुभ। जबकि स्त्रियों के लिए बाएं अंग पर तिल होना शुभ है तो दाएं अंग पर तिल होना अशुभ माना जाता है।
जिन लोगों के हाथों पर तिल होते हैं वे चतुर होते हैं। गुरु पर्वत यानि इंडेक्स फिंगर के नीचे वाले भाग पर तिल हो तो व्यक्ति धार्मिक हो सकता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति बलवान होता है। कुछ परिस्थितियों में दायीं हथेली का तिल व्यक्ति को धनवान भी बनाता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति खर्चीला तथा कंजूस हो सकता है।
तर्जनी यानि इंडेक्स फिंगर पर तिल:जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीडि़त होता है।
अनामिका या रिंग फिंगर पर तिल:जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।
कनिष्ठका या लिटिल फिंगर पर तिल:कनिष्ठका पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।
अंगूठे या थम्ब पर तिल: अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।
मध्यमा या मीडिल फिंगर पर तिल:मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिल भी हमारे स्वभाव और भविष्य को प्रभावित करते हैं। शरीर के अलग-अलग अंगों पर तिल होना अलग-अलग प्रभाव देता है। ऐसा माना जाता है कि पुरुषों के लिए दाएं अंग पर तिल होना शुभ है और बाएं अंग पर तिल होना अशुभ। जबकि स्त्रियों के लिए बाएं अंग पर तिल होना शुभ है तो दाएं अंग पर तिल होना अशुभ माना जाता है।

जिन लोगों के हाथों पर तिल होते हैं वे चतुर होते हैं। गुरु पर्वत यानि इंडेक्स फिंगर के नीचे वाले भाग पर तिल हो तो व्यक्ति धार्मिक हो सकता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति बलवान होता है। कुछ परिस्थितियों में दायीं हथेली का तिल व्यक्ति को धनवान भी बनाता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति खर्चीला तथा कंजूस हो सकता है।


तर्जनी यानि इंडेक्स फिंगर पर तिल:जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीडि़त होता है।


अनामिका या रिंग फिंगर पर तिल:जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।


कनिष्ठका या लिटिल फिंगर पर तिल:कनिष्ठका पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।


अंगूठे या थम्ब पर तिल: अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।


मध्यमा या मीडिल फिंगर पर तिल:मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।