Sunday, April 3, 2011

अंगूठे पर ऐसा चिन्ह हो तो, मिलता है पैसा और नाम

हस्तरेखा एक ऐसा विज्ञान है जिसकी मदद से किसी भी व्यक्ति का स्वभाव, भूत, भविष्य और वर्तमान मालुम किया जा सकता है। हाथों की सभी रेखाएं और चिन्हों का गहरा महत्व होता है। कुछ ऐसे चिन्ह होते हैं जो चमकती किस्मत की ओर इशारा करते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के अंगूठे के सबसे ऊपरी भाग पर चक्र जैसा कोई चिन्ह बना हो, तो उसे जीवन में कई उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। वह जीवन में कई उल्लेखनीय कार्य भी करता है।

यदि चक्र जैसा कोई निशान अंगूठे के सबसे ऊपर वाले पोर पर हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली व धनवान होता हैं। यह चक्र व्यक्ति को स्वयं लेने वाले बनाता है। इन्हें अपनी स्वतंत्रता से बहुत प्यार होता है साथ ही स्वभाव से बहुत महत्वाकांक्षी होते हैं। इनके दिमाग में हमेशा कोई न कोई योजना चलती रहती है। यदि चक्र अंगूठे पर हो तो ऐसे व्यक्ति ऐश्वर्यवान, प्रभावशाली, दिमाग कार्य में निपुण, पिता के सहयोगी और धन पाने वाला होता है।

आपके विचार

हस्तरेखा से भविष्य जानना सबसे सटीक उपाय है। हाथों की रेखाओं के सही अध्ययन से हमें सभी छोटी-बड़ी बातें मालुम हो जाती हैं। यदि आप भी इस विद्या के बारे में कुछ जानना चाहते हैं तो यहां कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं।

Wednesday, March 30, 2011

कष्टमुक्ति के उपाय

कष्टमुक्ति  के उपाय
१) प्रथम संतान (पुत्र) की नाल को सुखाकर अन्गुती में रखकर धारण करने से अथवा गल्ले या तिजोरी में रकने से धन सम्पति बढती है .
२) जो व्यक्ति सूती श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत उन से निर्मित आसन पैर उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल मुंगे की बनी माला से निमंलिखित मंतर का जाप करेगा  वर्ष  भर उसे धन का आभाव कभी नहीं रहेगा .

OM HIRM  SHRIM KALIN KRON OM GHANTAKARN MAHAVIR 
LUXMI PURAB PURY SUKHAM SOBHAGY KAROO KARO SVAHA 

३ पीपल के पेड़ के निचे शाम को सात दीपक  जलाकर सात बार परिकर्मा करें . उसके बाद सैट लड्डू काले कुते को खिलाएं . ऐसा करने से मन खुश रहता है और बनते कार्यों में व्यथा विलम्ब  नहीं होता

४ पीपल की लकड़ी को स्टील के गिलास में रात को पानी भर कर रखे और सुबह उस पीपल के पेड़ के तने में डाले . दिम्माग तनाव रहित रहेगा और स्किन प्रॉब्लम भी नहीं होगी
स्मरण शक्ति बदने के लिए लाल हकिक (रत्न) धारण करना आश्चर्यजनक प्रभाव दीखता है .
५ पीलिया रोगी हो जाने पैर कांसे के कटोरे में सरसों का तेल भरकर सैट दीन तक रोगी को रोज दिखने से रोग दूर हो जाता है. 
६ जिन पुरुषो का विवाह काफी आयु तक नहीं होता वे गुरुवार को कुम्हार के चक को घुमाने वाले डंडे की ले आयें .और उसी दिन घर में लीप पोतकर डंडे को लहंगा चुनरी पहनकर उसको सिंदूर] महावर आदि लगाकर दुल्हन के रूप में एक कोने में खड़ा करके गुड चावल से पूजे. कुम्हार जितनी अधिक गली देगा कोसेगा उतना जल्दी शीघ्र विवाह होगा. 
७ किसी विशेष कार्य पैर जाने से पहले चुटी भर नमक अपने दरवाजे पैर गिराकर कार्य पर जाये या देसी घी के दीपक में एक इलायची डालकर दुर्गा के समक्ष लगा दे .


Saturday, March 26, 2011

मंगली दोष

मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है.
मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.
मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार (Astrological analysis of Manglik Dosha)
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे:
लग्न भाव में मंगल (Mangal in Ascendant )
लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.
द्वितीय भाव में मंगल (Mangal in Second Bhava)
भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.
चतुर्थ भाव में मंगल (Mangal in Fourth Bhava)
चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.
सप्तम भाव में मंगल (Mangal in Seventh Bhava)
सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.
अष्टम भाव में मंगल (Mangal in Eigth Bhava)
अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।
द्वादश भाव में मंगल (Mangal in Twelth Bhava)
कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है