Sunday, April 3, 2011

अंगूठे पर ऐसा चिन्ह हो तो, मिलता है पैसा और नाम

हस्तरेखा एक ऐसा विज्ञान है जिसकी मदद से किसी भी व्यक्ति का स्वभाव, भूत, भविष्य और वर्तमान मालुम किया जा सकता है। हाथों की सभी रेखाएं और चिन्हों का गहरा महत्व होता है। कुछ ऐसे चिन्ह होते हैं जो चमकती किस्मत की ओर इशारा करते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के अंगूठे के सबसे ऊपरी भाग पर चक्र जैसा कोई चिन्ह बना हो, तो उसे जीवन में कई उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। वह जीवन में कई उल्लेखनीय कार्य भी करता है।

यदि चक्र जैसा कोई निशान अंगूठे के सबसे ऊपर वाले पोर पर हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली व धनवान होता हैं। यह चक्र व्यक्ति को स्वयं लेने वाले बनाता है। इन्हें अपनी स्वतंत्रता से बहुत प्यार होता है साथ ही स्वभाव से बहुत महत्वाकांक्षी होते हैं। इनके दिमाग में हमेशा कोई न कोई योजना चलती रहती है। यदि चक्र अंगूठे पर हो तो ऐसे व्यक्ति ऐश्वर्यवान, प्रभावशाली, दिमाग कार्य में निपुण, पिता के सहयोगी और धन पाने वाला होता है।

आपके विचार

हस्तरेखा से भविष्य जानना सबसे सटीक उपाय है। हाथों की रेखाओं के सही अध्ययन से हमें सभी छोटी-बड़ी बातें मालुम हो जाती हैं। यदि आप भी इस विद्या के बारे में कुछ जानना चाहते हैं तो यहां कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं।

Wednesday, March 30, 2011

कष्टमुक्ति के उपाय

कष्टमुक्ति  के उपाय
१) प्रथम संतान (पुत्र) की नाल को सुखाकर अन्गुती में रखकर धारण करने से अथवा गल्ले या तिजोरी में रकने से धन सम्पति बढती है .
२) जो व्यक्ति सूती श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत उन से निर्मित आसन पैर उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल मुंगे की बनी माला से निमंलिखित मंतर का जाप करेगा  वर्ष  भर उसे धन का आभाव कभी नहीं रहेगा .

OM HIRM  SHRIM KALIN KRON OM GHANTAKARN MAHAVIR 
LUXMI PURAB PURY SUKHAM SOBHAGY KAROO KARO SVAHA 

३ पीपल के पेड़ के निचे शाम को सात दीपक  जलाकर सात बार परिकर्मा करें . उसके बाद सैट लड्डू काले कुते को खिलाएं . ऐसा करने से मन खुश रहता है और बनते कार्यों में व्यथा विलम्ब  नहीं होता

४ पीपल की लकड़ी को स्टील के गिलास में रात को पानी भर कर रखे और सुबह उस पीपल के पेड़ के तने में डाले . दिम्माग तनाव रहित रहेगा और स्किन प्रॉब्लम भी नहीं होगी
स्मरण शक्ति बदने के लिए लाल हकिक (रत्न) धारण करना आश्चर्यजनक प्रभाव दीखता है .
५ पीलिया रोगी हो जाने पैर कांसे के कटोरे में सरसों का तेल भरकर सैट दीन तक रोगी को रोज दिखने से रोग दूर हो जाता है. 
६ जिन पुरुषो का विवाह काफी आयु तक नहीं होता वे गुरुवार को कुम्हार के चक को घुमाने वाले डंडे की ले आयें .और उसी दिन घर में लीप पोतकर डंडे को लहंगा चुनरी पहनकर उसको सिंदूर] महावर आदि लगाकर दुल्हन के रूप में एक कोने में खड़ा करके गुड चावल से पूजे. कुम्हार जितनी अधिक गली देगा कोसेगा उतना जल्दी शीघ्र विवाह होगा. 
७ किसी विशेष कार्य पैर जाने से पहले चुटी भर नमक अपने दरवाजे पैर गिराकर कार्य पर जाये या देसी घी के दीपक में एक इलायची डालकर दुर्गा के समक्ष लगा दे .


Saturday, March 26, 2011

मंगली दोष

मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है.
मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.
मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार (Astrological analysis of Manglik Dosha)
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे:
लग्न भाव में मंगल (Mangal in Ascendant )
लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.
द्वितीय भाव में मंगल (Mangal in Second Bhava)
भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.
चतुर्थ भाव में मंगल (Mangal in Fourth Bhava)
चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.
सप्तम भाव में मंगल (Mangal in Seventh Bhava)
सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.
अष्टम भाव में मंगल (Mangal in Eigth Bhava)
अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।
द्वादश भाव में मंगल (Mangal in Twelth Bhava)
कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है

बृहस्पति एवं शुक्र का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव

बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं.
बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं .सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है .इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.

ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है (Jupiter has bad effect on the house it is in) और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची  रहती है.

दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है.जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.

शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव को देखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है.

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ज्योतिषीय सलाह

कुण्डली मिलान से पहले (Before kundle Milan)
विवाह से पूर्व इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वर और कन्या की आयु में अधिक अंतर नहीं हो.आर्थिक स्थिति के कारण भी पारिवारिक जीवन में कलह उत्पन्न होता है अत: आर्थिक मामलों की अच्छी तरह जांच पड़ताल करने के बाद ही विवाह की बात आगे चलाना चाहिए.संभव हो तो वर और वधू की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की भी जांच करवा लेनी चाहिए इससे विवाह के पश्चात आने वाली बहुत सी उलझनें सुलझ जाती हैं.

कुण्डली और गुण मिलान (Kundli and Guna milan)
उपरोक्त बातों की जांच पड़ताल करने के बाद वर और वधू की कुण्डली मिलान (Birth Chart Matching)  कराना चाहिए.कुण्डली मिलान (marriage Match Making)  करते समय जन्म कुण्डली की सत्यता पर भी ध्यान देना चाहिए.मेलापक में 36 गुणों में से कम से कम 18 गुण मिलना शुभ होता है.मेलपाक में 18 गुण होने पर इस इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गण मैत्री और नाड़ी दोष नहीं हो.वर वधू की राशि का मिलान भी करना चाहिए.राशि मिलान के अनुसार वर और कन्या क्रमश: अग्नि एवं वायु तत्व तथा भूमि एवं जल तत्व के होने पर वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है.

मेलापक में राशि विचार (Melapak Rashi Vichar)
वर और कन्या की राशियों के बीच तालमेल का वैवाहिक जीवन पर काफी असर होता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.दोनों की राशियां एक दूसरे से चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.तृतीय और एकादश राशि होने पर गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है.ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो.

वर और कन्या की राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है.अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.

कुण्डली में दोष विचार (Kundli Dosha Vichar)
विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग (Baidhavya Yoga), व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग (Daridra Yoga) हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग, व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग (Vish Kanya Yoga)  होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.हलांकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है.

Thursday, March 24, 2011

शुभ और अशुभ भकूट

ज्योतिष के अनुसार वर और कन्या की कुण्डली मिलायी जाती है। कुण्डली मिलान से पता चलता है कि वर कन्या की कुण्डली मे कितने गुण मिलते हैं, कुल 36 गुणों में से 18 से अधिक गुण मिलने पर यह आशा की जाती है कि वर वधू का जीवन खुशहाल और प्रेमपूर्ण रहेगा.
भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है। यह 6 प्रकार का होता है जो क्रमश: इस प्रकार है:-

कुण्डली में गुण मिलान के लिए अष्टकूट से विचार किया जाता है इन अष्टकूटों में एक है भकूट (Bhakoot)। भकूट अष्टकूटो में 7 वां है,भकूट निम्न प्रकार के होते हैं.
1. प्रथम - सप्तक 2. द्वितीय - द्वादश 3. तृतीय - एकादश 4. चतुर्थ - दशम 5. पंचम - नवम 6. षडष्टक

ज्योतिष के अनुसार निम्न भकूट अशुभ  हैं.
  • द्विर्द्वादश,
  • नवपंचक  एवं
  • षडष्टक
शेष निम्न तीन भकूट शुभ   हैं. इनके रहने पर भकूट दोष  माना जाता है.
  • प्रथम-सप्तक,
  • तृतीय-एकादश
  • चतुर्थ-दशम 
भकूट जानने के लिए वर की राशि से कन्या की राशि तक तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक गणना करनी चाहिए। यदि दोनों की राशि आपस में एक दूसरे से द्वितीय एवं द्वादश भाव में पड़ती हो तो द्विर्द्वादश भकूट होता है। वर कन्या की राशि परस्पर पांचवी व नवी में पड़ती है तो नव-पंचम भकूट होता है, इस क्रम में अगर वर-कन्या की राशियां परस्पर छठे एवं आठवें स्थान पर पड़ती हों तो षडष्टक भकूट बनता है। नक्षत्र मेलापक में द्विर्द्वादश, नव-पंचक एवं षडष्टक ये तीनों भकूट अशुभ माने गये हैं। द्विर्द्वादश को अशुभ की इसलिए कहा गया है क्योंकि द्सरा स्थान(12th place) धन का होता है और बारहवां स्थान व्यय का होता है, इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तो पारिवारिक जीवन में अधिक खर्च होता है।
नवपंचक (Navpanchak) भकूट को अशुभ कहने का कारण यह है कि जब राशियां परस्पर पांचवें तथा नवमें स्थान (Fifth and Nineth place) पर होती हैं तो धार्मिक भावना, तप-त्याग, दार्शनिक दृष्टि तथा अहं की भावना जागृत होती है जो दाम्पत्य जीवन में विरक्ति तथा संतान के सम्बन्ध में हानि देती है। षडष्टक भकूट को महादोष की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि कुण्डली में 6ठां एवं आठवां स्थान मृत्यु का माना जाता हैं। इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तब दाम्पत्य जीवन में मतभेद, विवाद एवं कलह ही स्थिति बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप अलगाव, हत्या एवं आत्महत्या की घटनाएं भी घटित होती हैं। मेलापक के अनुसार षडष्टक में वैवाहिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।

शेष तीन भकूट- प्रथम-सप्तम, तृतीय - एकादश तथा चतुर्थ -दशम शुभ होते हैं।  शुभ भकूट  का फल निम्न हैं
  • मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
  • वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,
  • जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।

इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:
  • 1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों।
  • 2. यदि दोनों के राशीश एक हों।
  • 3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों।
  • 4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो।

विवाह के लिए प्रश्न कुण्डली में ग्रह स्थिति

विवाह के लिए प्रश्न कुण्डली में सप्तम, द्वितीय और एकादश भाव को देखा जाता है.विवाह के कारक ग्रह के रूप में पुरूष की कुण्डली में शुक्र और चन्द्रमा (Venus are Moon are the karakas for marriage for males) को देखा जाता है जबकि स्त्री की कुण्डली में मंगल और सूर्य को देखा जाता है (Mars and Sun are marriage karakas for females)
.गुरू भी स्त्री की कुण्डली में विवाह के विषय में महत्वपूर्ण होता है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह स्थित हो और एकादश एवं द्वितीय भाव भी शुभ प्रभाव में हो तो विवाह लाभप्रद और सुखमय होने का संकेत माना जाता है.अगर नवम भाव का स्वामी सप्तम भाव में शुभ प्रभाव में होता है तो विवाह के पश्चात व्यक्ति को अधिक कामयाबी मिलती है.नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा अगर सप्तम में गुरू से युति सम्बन्ध बनता है चन्द को देखता है तो विवाह के पश्चात जीवन अधिक सुखमय हो सकता है ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है.

प्रश्न कुण्डली में लाभप्रद वैवाहिक सम्बन्ध के लिए ग्रह स्थिति (Astrological Combinations for a fruitful married life)
जब प्रश्नकर्ता प्रश्न कुण्डली से यह पूछता है कि वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होगा अथवा नहीं.इस प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कुण्डली में अगर चन्द्रमा तृतीय, पंचम, दशम अथवा एकादश भाव में हो और गुरू चन्द्र को देखता है तो वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होने की पूरी संभावना व्यक्त की जाती है (Marriage is fruitful if the Moon is in 3rd, 5th, 10th or 11th houses and aspecting jupiter).लग्न स्थान में चन्द्रमा अथवा शुक्र तुला, वृष या कर्क राशि हो बैठा हो और गुरू  गुरू अपनी शुभ दृष्टि से लग्न को देखता हो तो वैवाहिक सम्बन्ध फायदेमंद हो सकता है.अष्टम भाव का स्वामी प्रश्न कुण्डली में अगर पीड़ित नहीं हो तो आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार में विवाह होता है और सम्बन्ध से लाभ मिलता है.अष्टम भाव में अगर गुरू, शुक्र या राहु भी हो तो इसे और भी शुभ संकेत माना जाता है.

प्रश्न कुण्डली में लाभप्रद वैवाहिक सम्बन्ध का उदाहरण (Example of astrological combinations for fruitful marriage)
अतुल का अपना कारोबार है.इनकी शादी की बात चल रही है.इनके मन में इस बात को लेकर आशंका है कि जो वैवाहिक सम्बन्ध होने जा रहा है क्या वह इनके लिए लाभप्रद होगा.अपनी जिज्ञासा लेकर अतुल 23 मई 2009 को 1 बजकर 5 सेकेण्ड पर प्रश्न कुण्डली से सवाल पूछते हैं कि, क्या यह वैवाहिक सम्बन्ध फायदेमंद होगा.लग्न निर्धारण हेतु इन्होंने कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार दिये गये 1से 249 अंक में अंक 15 का चयन किया और वैदिक पद्धति के अनुसार 1 से 108 में 16 अंक का चयन किया.इस प्रकार प्रश्न की कुण्डली तैयार हुई.इस कुण्डली में  सिह  लग्न उपस्थित है जिसका स्वामी सूर्य है.राशि है कन्या जिसका स्वामी बुध है.नक्षत्र है भरणी जिसका स्वामी है शुक्र.कुण्डली का विश्लेषण करने से मालूम होता है कि अतुल के लिए यह वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होने की संभावना कम है क्योकि लग्न में पाप ग्रह शनि बैठा है (the malefic planet saturn is in the ascendant).दूसरी स्थिति यह भी है कि दशमेश शनि लग्न में शत्रु ग्रह की राशि में है अत: अनुकूल परिणाम की संभावना कम दिखाई देती है.प्रश्न की कुण्डली में अष्टमेश गुरू और द्वितीयेश बुध दोनों एक दूसरे से 90 डिग्री पर हैं जो इस विवाह सम्बन्ध से लाभ की संभावना से इंकार कर रहे हैं

विवाह समय निर्धारण - Calculating the time of marriage through Mahadasha

विवाह समय निर्धारण के लिये सबसे पहले कुण्डली में विवाह के योग देखे जाते है. इसके लिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों का विश्लेषण किया जाता है. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह होकर इन ग्रहों से दृ्ष्टि, युति या स्थिति के प्रभाव से इन ग्रहों से संबन्ध बना रहा होता है. वह ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन रहा होता है.
इसलिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जितना अधिक हो, उतना ही शुभ रहता है (Higher influence of the auspicious planets is good for marriage). तथा अशुभ ग्रहों का प्रभाव न होना भी विवाह का समय पर होने के लिये सही रहता है. क्योकि अशुभ/ पापी ग्रह जब भी इन तीनों को या इन तीनों में से किसी एक को प्रभावित करते है. विवाह की अवधि में देरी होती ही है.

जन्म कुण्डली में जब योगों के आधार पर विवाह की आयु निर्धारित हो जाये तो, उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र (Venus is the Karak planet for marriage) व विवाह के मुख्य भाव व सहायक भावों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है. आईये देखे की दशाएं विवाह के समय निर्धारण में किस प्रकार सहयोग करती है:-

1. सप्तमेश की दशा- अन्तर्दशा में विवाह- (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Seventh Lord)
जब कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, तथा व्यक्ति की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र से हो तों इस अवधि में विवाह होता है. इसके अलावा जब सप्तमेश जब द्वितीयेश के साथ ग्रह दशा में संबन्ध बना रहे हों उस स्थिति में भी विवाह होने के योग बनते है.

2. सप्तमेश में नवमेश की दशा- अन्तर्द्शा में विवाह (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Ninth Lord in Seventh Lord)
ग्रह दशा का संबन्ध जब सप्तमेश व नवमेश का आ रहा हों तथा ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस ग्रह दशा में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

3. सप्तम भाव में स्थित ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of the planets in the seventh house)
सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित हो या उनसे पूर्ण दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह हो सकता है.  इसके अलावा निम्न योगों में विवाह होने की संभावनाएं बनती है:-
  • क)  सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर शुभ भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह संबन्धित ग्रह दशा की आरम्भ की अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनाती है. या
  • ख) शुक्र, सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव या अशुभ ग्रह की राशि में स्थित होने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा के मध्य भाग में विवाह की संभावनाएं बनाता है.
  • ग) इसके अतिरिक्त जब अशुभ ग्रह बली होकर सप्तम भाव में स्थित हों या स्वयं सप्तमेश हों तो इस ग्रह की दशा के  अन्तिम भाग में विवाह संभावित होता है.
4. शुक्र का ग्रह दशा से संबन्ध होने पर विवाह (Marriage in the dasha related to Venus)
जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, शुभ राशि, शुभ ग्रह से युक्त, द्र्ष्ट हों तो गोचर में शनि, गुरु से संबन्ध बनाने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने का संकेत करता है.

5. सप्तमेश के मित्रों की ग्रह दशा में विवाह (Marriage in the dasha of friendly planets of the seventh lord)
जब किसी व्यक्ति कि विवाह योग्य आयु हों तथा महादशा का स्वामी सप्तमेश का मित्र हों, शुभ ग्रह हों व साथ ही साथ सप्तमेश या शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस महाद्शा में व्यक्ति के विवाह होने के योग बनते है.

6. सप्तम व सप्तमेश से दृ्ष्ट ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of planets aspected by the seventh house and lord)
सप्तम भाव को क्योकि विवाह का भाव कहा गया है. सप्तमेश इस भाव का स्वामी होता है. इसलिये जो ग्रह बली होकर इन सप्तम भाव , सप्तमेश से दृ्ष्टि संबन्ध बनाते है, उन ग्रहों की दशा अवधि में विवाह की संभावनाएं बनती है

7.  लग्नेश व सप्तमेश की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the ascendant lord or the seventh lord)
लग्नेश की दशा में सप्तमेश की अन्तर्दशा में भी विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

8. शुक्र की शुभ स्थिति (Auspicious position of Venus in Marriage astrology)
किसी व्यक्ति की कुण्डली में जब शुक्र शुभ ग्रह की राशि तथा शुभ भाव (केन्द्र, त्रिकोण) में स्थित हों, तो शुक्र का संबन्ध अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा से आने पर विवाह हो सकता है. कुण्डली में शुक्र पर जितना कम पाप प्रभाव कम होता है. वैवाहिक जीवन के सुख में उतनी ही अधिक वृ्द्धि होती है

9. शुक्र से युति करने वाले ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of planets in conjunction with Venus)
शुक्र से युति करने वाले सभी ग्रह, सप्तमेश का मित्र, अथवा प्रत्येक वह ग्रह जो बली हों, तथा इनमें से किसी के साथ द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों, उन सभी ग्रहों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

10. शुक्र का नक्षत्रपति की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the Nakshatra lord of Venus)
जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

प्रेम विवाह - Love Marriage analysis through the Birth Chart

प्रेम विवाह करने वाले लडके व लडकियों को एक-दुसरे को समझने के अधिक अवसर प्राप्त होते है. इसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ पाते है. प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओ व स्नेह की प्रगाढ डोर से बंधे होते है. ऎसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी दोनों का साथ बना रहता है.
पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद की स्थिति इसके विपरीत होती है. इस स्थिति में दोनों का प्रेम विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत होता है. आईये देखे कि कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह की संभावनाएं बनाते है.

1. राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं (Yogas of Rahu increase the chances of a love marriage)
  • 1)  जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए बनती है. राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने का सोचता है. राहु को स्वभाव से संस्कृ्ति व लीक से हटकर कार्य करने की प्रवृ्ति  का माना जाता है.
  • 2.) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है. कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व पापी ग्रह माना गया है. इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं बनती है.  
  • 3.) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है. (Aspect of Rahu on the seventh lord, saturn or venus increases chances of love marriage)
  • 4)  जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है.

2. प्रेम विवाह के अन्य योग (Other astrological yogas for love marriage)

  • 1)  जब किसी व्यक्ति कि कुण्ड्ली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है.
  • 2)  इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द लग्न से पंचम भाव में स्थित होंने पर प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  (Venus in fifth or ninth house from ascendant or fifth house from Moon increases love marriage chances)
  • 3)  प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हों तथा पंचमेश व एकादशेश का राशि परिवतन अथवा दोनों कुण्डली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह होने के योग बनते है.  
  • 4)  अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है.
  • 5)  जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है. (When Saturn or ketu are in the seventh house the chances for love marriage increase)
  • 6)  कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों, अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  
  • 7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक -दूसरे से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
  • 8) जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब विवाह का भाव बली होता है. तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर सकता है.
  • 9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृ्ष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है. (Combinatin of fifth and the seventh house and mutual aspect or sign exchange causes love marriage)
  • 10) जब सप्तमेश की दृ्ष्टि, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है.
  • 11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  (Conjunction of lagna lord seventh house or aspect increases chances of love marriage)
  • 12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते है. तो प्रेम विवाह हो सकता है.

शनि एवं विवाह

विवाह एवं वैवाहिक जीवन के विषय में ग्रहों की स्थिति काफी कुछ बताती है.सप्तम भाव को विवाह एवं जीवनसाथी का घर कहा जाता है.इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति को शुभ और अशुभ फल मिलता है.
शनि देव की भूमिका विवाह के विषय में क्या है आइये देखें.
विवाह में सप्तम शनि का प्रभाव: (Impact of Saturn in Seventh House on marriage)
सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है.इस भाव शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है.इस भाव में शनि होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से विलम्ब से होती है.सप्तम भाव में शनि अगर नीच का होता है तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे काफी बड़ा होता है.शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है (If Saturn and Sun are placed in the sventh house, there is no peace in the household).चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं.
शनि और विवाह में विलम्ब: (Saturn and delayed marriage)
नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी की बात 30 वर्ष की आयु के बाद ही सोचनी चाहिए क्योकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है (If there is a combination of Saturn and Moo in the Navamamsh Kundali, there is a delayed marriage). जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है एवं इनकी शादी असफल होने की भी संभावना प्रबल रहती है.जिनकी जन्मपत्री में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है एवं लग्न कमज़ोर उनकी शादी बहुत विलम्ब से होती है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि वह शादी नहीं करते.शनि जिस कन्या की कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है.
शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्टम में और सप्तमेश कमज़ोर अथवा पाप पीड़ित होता है उनकी शादी में भी काफी बाधाएं आती हैं.शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है.इसी प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं.जन्मपत्री में शनि राहु की युति होने पर सप्तमेश व शुक्र अगर कमज़ोर रहता है तो विवाह अति विलम्ब से हो पाता है.
उपाय: (Remedies for Saturn and marriage)
जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण विलम्ब हो रहा है उन्हें हरितालिका व्रत करना चाहिए एवं शनि देव की पूजा करनी चाहिए.पुरूषों को भी शनि देव की पूजा उपासना से लाभ मिलता है एवं उनकी शादी जल्दी हो जाती है.