Thursday, March 24, 2011

विवाह समय निर्धारण - Calculating the time of marriage through Mahadasha

विवाह समय निर्धारण के लिये सबसे पहले कुण्डली में विवाह के योग देखे जाते है. इसके लिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों का विश्लेषण किया जाता है. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह होकर इन ग्रहों से दृ्ष्टि, युति या स्थिति के प्रभाव से इन ग्रहों से संबन्ध बना रहा होता है. वह ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन रहा होता है.
इसलिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जितना अधिक हो, उतना ही शुभ रहता है (Higher influence of the auspicious planets is good for marriage). तथा अशुभ ग्रहों का प्रभाव न होना भी विवाह का समय पर होने के लिये सही रहता है. क्योकि अशुभ/ पापी ग्रह जब भी इन तीनों को या इन तीनों में से किसी एक को प्रभावित करते है. विवाह की अवधि में देरी होती ही है.

जन्म कुण्डली में जब योगों के आधार पर विवाह की आयु निर्धारित हो जाये तो, उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र (Venus is the Karak planet for marriage) व विवाह के मुख्य भाव व सहायक भावों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है. आईये देखे की दशाएं विवाह के समय निर्धारण में किस प्रकार सहयोग करती है:-

1. सप्तमेश की दशा- अन्तर्दशा में विवाह- (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Seventh Lord)
जब कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, तथा व्यक्ति की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र से हो तों इस अवधि में विवाह होता है. इसके अलावा जब सप्तमेश जब द्वितीयेश के साथ ग्रह दशा में संबन्ध बना रहे हों उस स्थिति में भी विवाह होने के योग बनते है.

2. सप्तमेश में नवमेश की दशा- अन्तर्द्शा में विवाह (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Ninth Lord in Seventh Lord)
ग्रह दशा का संबन्ध जब सप्तमेश व नवमेश का आ रहा हों तथा ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस ग्रह दशा में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

3. सप्तम भाव में स्थित ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of the planets in the seventh house)
सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित हो या उनसे पूर्ण दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह हो सकता है.  इसके अलावा निम्न योगों में विवाह होने की संभावनाएं बनती है:-
  • क)  सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर शुभ भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह संबन्धित ग्रह दशा की आरम्भ की अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनाती है. या
  • ख) शुक्र, सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव या अशुभ ग्रह की राशि में स्थित होने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा के मध्य भाग में विवाह की संभावनाएं बनाता है.
  • ग) इसके अतिरिक्त जब अशुभ ग्रह बली होकर सप्तम भाव में स्थित हों या स्वयं सप्तमेश हों तो इस ग्रह की दशा के  अन्तिम भाग में विवाह संभावित होता है.
4. शुक्र का ग्रह दशा से संबन्ध होने पर विवाह (Marriage in the dasha related to Venus)
जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, शुभ राशि, शुभ ग्रह से युक्त, द्र्ष्ट हों तो गोचर में शनि, गुरु से संबन्ध बनाने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने का संकेत करता है.

5. सप्तमेश के मित्रों की ग्रह दशा में विवाह (Marriage in the dasha of friendly planets of the seventh lord)
जब किसी व्यक्ति कि विवाह योग्य आयु हों तथा महादशा का स्वामी सप्तमेश का मित्र हों, शुभ ग्रह हों व साथ ही साथ सप्तमेश या शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस महाद्शा में व्यक्ति के विवाह होने के योग बनते है.

6. सप्तम व सप्तमेश से दृ्ष्ट ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of planets aspected by the seventh house and lord)
सप्तम भाव को क्योकि विवाह का भाव कहा गया है. सप्तमेश इस भाव का स्वामी होता है. इसलिये जो ग्रह बली होकर इन सप्तम भाव , सप्तमेश से दृ्ष्टि संबन्ध बनाते है, उन ग्रहों की दशा अवधि में विवाह की संभावनाएं बनती है

7.  लग्नेश व सप्तमेश की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the ascendant lord or the seventh lord)
लग्नेश की दशा में सप्तमेश की अन्तर्दशा में भी विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

8. शुक्र की शुभ स्थिति (Auspicious position of Venus in Marriage astrology)
किसी व्यक्ति की कुण्डली में जब शुक्र शुभ ग्रह की राशि तथा शुभ भाव (केन्द्र, त्रिकोण) में स्थित हों, तो शुक्र का संबन्ध अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा से आने पर विवाह हो सकता है. कुण्डली में शुक्र पर जितना कम पाप प्रभाव कम होता है. वैवाहिक जीवन के सुख में उतनी ही अधिक वृ्द्धि होती है

9. शुक्र से युति करने वाले ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of planets in conjunction with Venus)
शुक्र से युति करने वाले सभी ग्रह, सप्तमेश का मित्र, अथवा प्रत्येक वह ग्रह जो बली हों, तथा इनमें से किसी के साथ द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों, उन सभी ग्रहों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

10. शुक्र का नक्षत्रपति की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the Nakshatra lord of Venus)
जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

प्रेम विवाह - Love Marriage analysis through the Birth Chart

प्रेम विवाह करने वाले लडके व लडकियों को एक-दुसरे को समझने के अधिक अवसर प्राप्त होते है. इसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ पाते है. प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओ व स्नेह की प्रगाढ डोर से बंधे होते है. ऎसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी दोनों का साथ बना रहता है.
पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद की स्थिति इसके विपरीत होती है. इस स्थिति में दोनों का प्रेम विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत होता है. आईये देखे कि कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह की संभावनाएं बनाते है.

1. राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं (Yogas of Rahu increase the chances of a love marriage)
  • 1)  जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए बनती है. राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने का सोचता है. राहु को स्वभाव से संस्कृ्ति व लीक से हटकर कार्य करने की प्रवृ्ति  का माना जाता है.
  • 2.) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है. कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व पापी ग्रह माना गया है. इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं बनती है.  
  • 3.) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है. (Aspect of Rahu on the seventh lord, saturn or venus increases chances of love marriage)
  • 4)  जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है.

2. प्रेम विवाह के अन्य योग (Other astrological yogas for love marriage)

  • 1)  जब किसी व्यक्ति कि कुण्ड्ली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है.
  • 2)  इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द लग्न से पंचम भाव में स्थित होंने पर प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  (Venus in fifth or ninth house from ascendant or fifth house from Moon increases love marriage chances)
  • 3)  प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हों तथा पंचमेश व एकादशेश का राशि परिवतन अथवा दोनों कुण्डली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह होने के योग बनते है.  
  • 4)  अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है.
  • 5)  जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है. (When Saturn or ketu are in the seventh house the chances for love marriage increase)
  • 6)  कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों, अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  
  • 7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक -दूसरे से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
  • 8) जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब विवाह का भाव बली होता है. तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर सकता है.
  • 9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृ्ष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है. (Combinatin of fifth and the seventh house and mutual aspect or sign exchange causes love marriage)
  • 10) जब सप्तमेश की दृ्ष्टि, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है.
  • 11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.  (Conjunction of lagna lord seventh house or aspect increases chances of love marriage)
  • 12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते है. तो प्रेम विवाह हो सकता है.

शनि एवं विवाह

विवाह एवं वैवाहिक जीवन के विषय में ग्रहों की स्थिति काफी कुछ बताती है.सप्तम भाव को विवाह एवं जीवनसाथी का घर कहा जाता है.इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति को शुभ और अशुभ फल मिलता है.
शनि देव की भूमिका विवाह के विषय में क्या है आइये देखें.
विवाह में सप्तम शनि का प्रभाव: (Impact of Saturn in Seventh House on marriage)
सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है.इस भाव शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है.इस भाव में शनि होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से विलम्ब से होती है.सप्तम भाव में शनि अगर नीच का होता है तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे काफी बड़ा होता है.शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है (If Saturn and Sun are placed in the sventh house, there is no peace in the household).चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं.
शनि और विवाह में विलम्ब: (Saturn and delayed marriage)
नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी की बात 30 वर्ष की आयु के बाद ही सोचनी चाहिए क्योकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है (If there is a combination of Saturn and Moo in the Navamamsh Kundali, there is a delayed marriage). जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है एवं इनकी शादी असफल होने की भी संभावना प्रबल रहती है.जिनकी जन्मपत्री में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है एवं लग्न कमज़ोर उनकी शादी बहुत विलम्ब से होती है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि वह शादी नहीं करते.शनि जिस कन्या की कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है.
शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्टम में और सप्तमेश कमज़ोर अथवा पाप पीड़ित होता है उनकी शादी में भी काफी बाधाएं आती हैं.शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है.इसी प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं.जन्मपत्री में शनि राहु की युति होने पर सप्तमेश व शुक्र अगर कमज़ोर रहता है तो विवाह अति विलम्ब से हो पाता है.
उपाय: (Remedies for Saturn and marriage)
जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण विलम्ब हो रहा है उन्हें हरितालिका व्रत करना चाहिए एवं शनि देव की पूजा करनी चाहिए.पुरूषों को भी शनि देव की पूजा उपासना से लाभ मिलता है एवं उनकी शादी जल्दी हो जाती है.

Tuesday, March 22, 2011

जानिए धन की स्थिति प्रश्न कुण्डली से!

संसार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो धन की अभिलाषा नहीं रखता हो। सन्यासी ही होंगे जिन्हें धन की अभिलाषा नहीं होती है।
गृहस्थ अर्थात सांसारिक जीवन व्यतीत करने वाला हर मनुष्य चाहता है कि उन्हें लक्ष्मी की कृपा दृष्टि प्राप्त हो। लक्ष्मी की कृपा की कामना भले ही हम सभी करें परंतु लक्ष्मी की दया हर किसी को बराबर नहीं मिलती है। अपनी आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित प्रश्नों को लेकर अक्सर हम आप ज्योतिषाचार्यों से सम्पर्क करते हैं। आप जब आर्थिक मुद्दों को लेकर ज्योतिषियों के पास जाते हैं तब वे किस प्रकार से फलादेश (Phaladesh) सुनाते हैं आईये इस पर दृष्टि डालते हैं।
ज्योतिर्विदों के मतानुसार धन के विषय में जब विचार करना होता है तब सभी भावों पर दृष्टि (Importance on all houses for considering wealth) रखनी होती है। धन के सम्बन्ध में हर भाव अलग अलग स्थिति बयां करता है जैसे प्रथम भाव स्वअर्जित धन का संकेत देता है तो द्वितीय भाव जमा पूंजी (Second house says about deposit and capital) के संदर्भ में बताता है.

इसी प्रकार तृतीय भाव (Third house) पराक्रम द्वारा अर्जित धन के विषय में, चतुर्थ भाव (Fourth house) से सम्पत्ति, पंचम भाव (Fifth house) से अकस्मात धन लाभ,षष्टम (Sixth house) से शत्रु से धन लाभ, सप्तम भाव (Seventh house) से व्यवसाय में धन लाभ, अष्टम भाव (8th house) से विरासत में प्राप्त धन, नवम भाव (Ninth house) से भाग्य द्वारा धन, दशम भाव (Tenth house) से नौकरी या सरकार से धन, एकादश भाव (11th house) से कार्य में धन लाभ तथा द्वादश भाव (12th house) से विदेश में धन लाभ का संकेत प्राप्त होता है।
इन तथ्यों से ज्ञात होता है कि हमारी कुण्डली के हर भाव में धन का संकेत होता है। धन का कारक बृहस्पति को (Jupiter is the significator of wealth) माना गया है, कुण्डली के किसी भी भाव में बृहस्पति बलवान होकर स्थित होने से धन का लाभ होता है। 
प्रश्न कुण्डली के अनुसार जब आप जानना चाहते हैं कि किस व्यक्ति से आपको धन लाभ मिलेगा, उस समय द्वितीय भाव(Second house) संकेत देता है कि आपको संयुक्त रूप से कुटुम्ब जन से धन प्राप्त होगा। तृतीय भाव (Third house) बतता है कि छोटे भाई/बहनों से धन मिलेगा। चतुर्थ भाव (4rth house) से माता या ससुर से धन मिलने का भान होता है तो पंचम भाव (5th house) से संतान से धन, षष्टम (Sixth house) से बैंक से कर्ज के रूप में धन, सप्तम (7th house) से पत्नी से धन, अष्टम भाव (8th house) से ससुराल से धन, नवम भाव(Ninth house) से साले/बहनोई से धन, एकादश (11th house) भाव से मित्र का धन तथा द्वादश भाव (12th house) से अनैतिक तरीके से धन लाभ का ज्ञान मिलता है।  
ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि किसी व्यक्ति से धन लाभ के संदर्भ में आपके भाव/भावेश (House/House Lord) के साथ ही कारक ग्रह भी बलवान होकर शुभ होना चाहिए, इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं मान लीजिए आपको अपने बड़े भाई या बड़ी बहन से धन लाभ देखना है तो इसके लिए एकादश भाव एवं एकादशेश के साथ ही इनके कारक गुरू के बल पर भी दृष्टि रखनी होगी।  
धन लाभ के विषय में दूसरे ग्रहों की एकादश भाव पर दृष्टि या भावेश के साथ युति या दृष्टि से भी विचार करना होता है। उपरोक्त भाव/ग्रहों का परिणाम संयुक्त रूप से अनुकूल आता है तो आपको धन का लाभ होता है। इस स्थिति में परिणाम प्रतिकूल आने से धन हानि होने की संभावना रहती है।  
धन लाभ के संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि लग्न/लग्नेश शुभ (Auspiciousnes of Ascendant /Lord of Ascendant) होकर बलवान स्थिति में हों तो व्यक्ति स्वयं ही धन अर्जन करता है। धन लाभ की स्थिति के सम्बन्ध में नवम भाव/नवमेश का बलवान होना भी उत्तम माना जाता है।
तथ्यों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि धन के लाभ के लिए हमारी कुण्डली में काफी संभावनाएं हैं। अपनी प्रश्न कुण्डली को जानकर हम धन के संदर्भ में सकारात्मक प्रयास कर सकते हैं।

Friday, March 18, 2011

विवाह के तीन सूत्र ग्रह : गुरु, शुक्र व मंगल

जब किसी व्यक्ति की कुण्डली से दांपत्य का विचार किया जाता है, तो उसके लिये गुरु, शुक्र व मंगल का विश्लेषण किया जाता है. इन तीनों ग्रहों कि स्थिति को समझने के बाद ही व्यक्ति के दांपत्य जीवन के विषय में कुछ कहना सही रहता है. आईये यहां हम दाम्पत्य जीवन से जुडे तीन मुख्य ग्रहों को समझने का प्रयास करते है.
1. गुरु की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Jupiter in Marriage Astrology)
सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये भावी वर-वधू की कुण्डली में गुरु पाप प्रभाव से मुक्त (Jupiter should be free for malefic influence)  होना चाहिए. गुरु की शुभ दृ्ष्टि सप्तम भाव पर हों तो वैवाहिक जीवन में परेशानियों व दिक्कतों के बाद भो अलगाव की स्थिति नहीं बनती है. अर्थात गुरु की शुभता वर-वधू का साथ व उसके विवाह को  बनाये रखती है. गुरु दाम्पत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह भी है. अगर कुण्डली में गुरु पीडित हों तो सर्वप्रथम तो विवाह में विलम्ब होगा, तथा उसके बाद संतान प्राप्ति में भी परेशानियां आती है.

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये संतान का समय पर होना आवश्यक समझा जाता है. विवाह के बाद सर्वप्रथम संतान का ही विचार किया जाता है. अगर गुरु किसी पापी ग्रह के प्रभाव से दूषित हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है. जब गुरु पर पाप प्रभाव हों तथा गुरु पापी ग्रह की राशि में भी स्थित हों तो निश्चित रुप से दाम्पत्य जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें आने की संभावनाएं बनती है.

2. शुक्र की वैवाहिक जीवन में भूमिका ( Role of Venus in married Life and astrology)
शुक्र विवाह का कारक ग्रह है. वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये शुक्र का कुण्डली में सुस्थिर होना आवश्यक होता है. जब पति-पत्नी दोनों की ही कुण्डली में शुक्र पूर्ण रुप से पाप प्रभाव से मुक्त हो तब ही विवाह के बाद संबन्धों में सुख की संभावनाएं बनती है. इसके साथ-साथ शुक्र का पूर्ण बली व शुभ (Venus should be strong and auspicious) होना भी जरूरी होता है.

शुक्र को वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह कहा जाता है. कुण्डली में शुक्र का किसी भी अशुभ स्थिति में होना पति अथवा पत्नी में से किसी के जीवन साथी के अलावा अन्यत्र संबन्धों की ओर झुकाव होने की संभावनाएं बनाता  है. इसलिये शुक्र की शुभ स्थिति दाम्पत्य जीवन के सुख को प्रभावित करती है.

कुण्डली में शुक्र की शुभाशुभ स्थिति के आधार पर ही दाम्पत्य जीवन में आने वाले सुख का आकलन किया जा सकता है. इसलिये जब शुक्र बली हों, पाप प्रभाव से मुक्त हों, किसी उच्च ग्रह के साथ किसी शुभ भाव में बैठा हों (When Venus is strong, free of malefic influence and situated with exalted planet) तो, अथवा शुभ ग्रह से दृ्ष्ट हों तो दाम्पत्य सुख में कमी नहीं होती है. उपरोक्त ये योग जब कुण्डली में नहीं होते है. तब स्थिति इसके विपरीत होती है. शुक्र अगर स्वयं बली है, स्व अथवा उच्च राशि में स्थित है. केन्द्र या त्रिकोण में हों तब भी अच्छा दाम्पत्य सुख प्राप्त होता है.

इसके विपरीत जब त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु क्षेत्र में बैठा हों, अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तब दाम्पत्य जीवन के लिये अशुभ योग बनता है. यहां तक की ऎसे योग के कारण ं पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. इसके अलावा शुक्र, मंगल का संबन्ध व्यक्ति की अत्यधिक रुचि वैवाहिक सम्बन्धों में होने की सम्भावनाएं बनाती है. यह योग इन संबन्धों में व्यक्ति के हिंसक प्रवृ्ति अपनाने का भी संकेत करता है.

इसलिये विवाह के समय कुण्डलियों की जांच करते समय शुक्र का भी गहराई से अध्ययन  करना चाहिए.

3. मंगल की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Mars in Marriage astrology)
मंगल की जांच किये बिना विवाह के पक्ष से कुण्डलियों का अध्ययन पूरा ही नहीं होता है. भावी वर-वधू की कुण्डलियों का विश्लेषण करते समय सबसे पहले कुण्डली में मंगल की स्थिति पर विचार किया जाता है. मंगल किन भावों में स्थित है, कौन से ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा है (aspect of Mars for marriage), तथा किन ग्रहों से युति संबन्ध में है. इन सभी बातों की बारीकी से जांच की जाती है.

मंगल के सहयोग से मांगलिक योग का निर्माण होता है (mars causes Manglik yoga in marriage). वैवाहिक जीवन में मांगलिक योग को इतना अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि जो लोग ज्योतिष शास्त्र में विश्वास नहीं करते है. अथवा जिन्हें विवाह से पूर्व कुण्डलियों की जांच करना अनुकुल नहीं लगता है वे भी यह जान लेना चाहते है कि वर-वधू की कुण्डलियों में मांगलिक योग बन रहा है या नहीं.

चूंकि विवाह के बाद सभी दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना करते है. जबकि मांगलिक योग से इन इसमें कमी होती है.  जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति मांगलिक होता है. परन्तु मंगल का इन भावों में स्थित होने के अलावा भी मंगल के कारण वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाएं बनती है.

अनेक बार ऎसा होता है कि कुण्डली में मांगलिक योग बनता है. परन्तु कुण्डली के अन्य योगों से इस योग की अशुभता में कमी हो रही होती है. ऎसे में अपूर्ण जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ प्रभाव को लेकर भयभीत होते रहते है. तथा बेवजह की बातों को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम भी बनाये रखते है. जो सही नहीं है.  विवाह के बाद एक नये जीवन में प्रवेश करते समय मन में दाम्पत्य जीवन को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रखना चाहिए.

सोये ग्रह के लिये उपाय

लाल किताब के अनुसार जिस घर में कोई ग्रह न हो तथा जिस घर पर किसी ग्रह की नज़र नहीं पड़ती हो उसे सोया हुआ घर माना जाता है.
लाल किताब का मानना है जो घर सोया  होता है उस घ्रर से सम्बन्धित फल तब तक प्राप्त नहीं होता है जबतक कि वह घर जागता नहीं है. लाल किताब में सोये हुए घरों को जगाने के लिए कई उपाय बताए गये हैं.

जिन लोगों की कुण्डली में प्रथम भाव सोया हुआ हो उन्हें इस घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय करना चाहिए. मंगल का उपाय करने के लिए मंगलवार का व्रत करना चाहिए. मंगलवार के दिन हनुमान जी को लडुडुओं का प्रसाद चढ़ाकर बांटना चाहिए. मूंगा धारण करने से भी प्रथम भाव जागता है.

अगर दूसरा घर सोया हुआ हो तो चन्द्रमा का उपाय शुभ फल प्रदान करता है. चन्द्र के उपाय के लिए चांदी धारण करना चाहिए. माता की सेवा करनी चाहिए एवं उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. मोती धारण करने से भी लाभ मिलता है.

तीसरे घर को जगाने के लिए बुध का उपाय करना लाभ देता है. बुध के उपाय हेतु दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए. बुधवार के दिन गाय को चारा देना चाहिए.

लाल किताब के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली में अगर चौथा घर सोया हुआ है तो चन्द्र का उपाय करना लाभदायी होता है.

पांचवें घर को जागृत करने के लिए सूर्य का उपाय करना फायदेमंद होता है. नियमित आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ एवं रविवार के दिन लाल भूरी चीटियों को आटा, गुड़ देने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है.

छठे घर को जगाने के लिए राहु का उपाय करना चाहिए. जन्मदिन से आठवां महीना शुरू होने पर पांच महीनों तक बादाम मन्दिर में चढ़ाना चाहिए, जितना बादाम मन्दिर में चढाएं उतना वापस घर में लाकर सुरक्षित रख दें. घर के दरवाजा दक्षिण में नहीं रखना चाहिए. इन उपायों से छठा घर जागता है क्योंकि यह राहु का उपाय है.

सोये हुए सातवें घर के लिए शुक्र को जगाना होता है. शुक्र को जगाने के लिए आचरण की शुद्धि सबसे आवश्यक है.

सोये हुए आठवें घर के लिए चन्द्रमा का उपाय शुभ फलदायी होता है.

जिनकी कुण्डली में नवम भाव सोया हो उनहें गुरूवार के दिन पीलावस्त्र धारण करना चाहिए. सोना धारण करना चाहिए व माथे पर हल्दी अथवा केशर का तिलक करना चाहिए. इन उपाय से गुरू प्रबल होता है और नवम भाव जागता है.

दशम भाव को जागृत करने हेतु शनिदेव का उपाय करना चाहिए.

एकादश भाव के लिए भी गुरू का उपाय लाभकारी होता है.

अगर बारहवां घ्रर सोया हुआ हो तो घर मे कुत्ता पालना चाहिए. पत्नी के भाई की सहायता करनी चाहिए. मूली रात को सिरहाने रखकर सोना चाहिए और सुबह मंदिर मे दान करना चाहिए..

ज्योतिष में अशुभ कालसर्प दोष

ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों की स्थिति से बनने वाले शुभ योग हैं तो कुछ अशुभ योग भी हैं.कालसर्प दोष भी प्रमुख अशुभ योगों में से है..राहु केतु की स्थिति के अनुसार कालसर्प योग के कई प्रकार हैं.सभी कालसर्प योग अपने क्षेत्र विशेष में अशुभ परिणाम देते हैं।
तक्षक कालसर्प: (Takshak Kalsarpa Dosha)
यह कालसर्प योग पारिवारिक एवं गृहस्थ सुख के सम्बन्ध में विशेष रूप से अशुभ फल देने वाला होता है.तक्षक कालसर्प योग कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु सप्तम भाव में स्थित हो और केतु लग्न में विराजमान हो (Rahu in Seventh House & Ketu in Lagna) एवं अन्य ग्रह इन दोनों ग्रहों के मध्य स्थित हों तब यह योग बनता है.तक्षक कालसर्प योग से पीड़ित होने पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कम हो जाता है जिससे व्यक्ति को कुण्डली में स्थिति शुभ ग्रह योग का फल अपूर्ण रह जाता है और व्यक्ति को कालसर्प योग का नीच परिणाम भुगतना पड़ता है.

तक्षक कालसर्प योग का परिणाम: (Effect of Takshak Kalsarpa Yoga)
जिनकी कुण्डली में तक्षक कालसर्प योग बनता है वे स्त्री वर्ग के साथ सामंजस्य पूर्ण सम्बन्ध नहीं बना पाते हैं.जीवनसाथी के प्रति उदासीनता के कारण गृहस्थ जीवन का सुख बाधित होता है.यह योग गुप्तांग सम्बन्धी रोग भी देता है जो संतान के सम्बन्ध में शुभ नहीं होता है.संभव है कि इस योग से पीड़ित व्यक्ति संतान सुख के सम्बन्ध में भाग्यशाली नहीं हों.तक्षक कालसर्प चारित्रिक दोष भी देता है जिसके कारण अगर मन पर संयम नहीं रखें तो इस योग वाले व्यक्ति के विवाहेत्तर सम्बन्ध भी हो सकते हैं.

इस योग से प्रभावित व्यक्ति को सदा सावधान और सतर्क रहने की आवश्यकता होती है क्योंकि यह योग मित्रों द्वारा मिलने वाले विश्वासघात की संभावना को प्रबल करता है.धन सम्पत्ति के सम्बन्ध में भी यह योग अशुभ फलदायी है.यह योग पैतृक सम्पत्ति से मिलने वाले सुख में कमी लाता है.व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशान होता है और इन्हें जेल की यात्रा भी करनी पड़ती है.जीवन में उतार चढ़ाव और संघर्षमय स्थिति बनी रहती है.

कर्कोटक कालसर्प योग: (Karkotak Kalsarpa Dosha)
कार्कोटक कालसर्प योग भी अशुभ कालसर्प योगों में से एक है.यह अशुभ योग तब निर्मित होता है जब केतु द्वितीय में होता है और राहु अष्टम में (Ketu in Second House & Rahu in Eighth house) स्थित होकर शेष ग्रहों को निगल लेता है अर्थात इनके बीच में सभी ग्रह होने पर यह योग बनता है.इस योग का अशुभ प्रभाव जीवन में समय समय पर दृष्टिगोचर होता रहता है.व्यक्ति मानसिक तौर पर परेशान रहता है.

कार्कोटक कालसर्प योग का परिणाम: (Effect of Karkotak Kalsarpa Yoga)
जिनकी कुण्डली में कार्कोटक कालसर्प योग होता है उन्हें किसी भी कार्य में जल्दी सफलता नहीं मिलती है क्योंकि इनका भाग्य कमज़ोर होता है.इन्हें जो कुछ भी प्राप्त होता है अपनी मेहनत से मिलता है.अगर इन्हें भाग्य का फल मिलता भी है तो काफी उम्र गुजर जाने के बाद जबकि अवसर सिमित हो जाते हैं.इनका जीवन संघर्षमय रहता है और बार बार असफलता का स्वाद चखना होता है.इनके मित्रों की संख्या सीमित होती है और जो भी मित्र होते हैं वे अवसर का लाभ उठाने की ताक में रहते हैं जिसके कारण मित्रों से भी इन्हें सहयोग एवं समर्थन नहीं मिल पाता है.आर्थिक विषयों में भी यह योग अशुभ फलदायी होता है.रोजी रोजगार में नुकसान और परेशानी बनी रहती है.पैतृक सम्पत्ति से मिलने वाले सुख में भी यह कमी लाता है.इनके साथ दुर्घटना होने की संभावना भी प्रबल रहती है।

शंखनाद कालसर्प: (Shankhnaad Kalsarpa Dosha)
शंखनाद कालसर्प योग को शंखचूड़ कालसर्प योग (Shankchood Kalsarpa Yoga) के नाम से भी जाना जाता है.कुण्डली में यह योग तब उपस्थित होता है जबकि राहु नवम भाव में होता है और केतु तृतीय (Rahu in ninth house and Ketu in Third) भाव में स्थित होता है एवं शेष ग्रह इनके मध्य स्थित होते हैं.इस योग को दुर्भाग्य सूचक माना जाता है क्योकि राहु केतु की इस स्थिति से भाग्य को ग्रहण लगता है.यह योग कामयाबी के सफर में बाधक होता है.

शंखनाद कालसर्प योग का परिणाम: (Result of Shanknaad Kalsarpa Yoga)
शंखनाद कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति गृहस्थ जीवन में असंतुष्ट और दु:खी रहता है.भाग्य से इन्हें लाभ नहीं मिल पाता है, कार्यों में बार बार असफलता और अपमान भी इन्हें झेलना पड़ता है.कारोबार एवं नौकरी के सम्बन्ध में भी यह योग विपरीत प्रभाव देता है जिसके कारण व्यक्ति को अपनी मेहनत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पाता है.शत्रुओं का भय बना रहता है.शुभ ग्रह योग से अगर ये उच्च स्थिति को प्राप्त कर भी लेते हैं तो इस  अशुभ योग के कारण इन्हें अवनति का मुंह देखना होता है

लाल किताब में कालसर्प दोष

वैदिक ज्योतिष के समान लाल किताब भी भविष्य जानने की एक विधा है.लाल किताब में ग्रहों के योग और उनके फल के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएं है.ज्योतिष की इस विधा में भी कालसर्प है और इसका फल एवं उपाय है लेकिन कालसर्प को देखने का नजरिया अलग है.आइये हम भी लाल किताब से कालसर्प को जानें.
लाल किताब (Lalkitab - The astrology wonderbook)  कालसर्प को दोष मानता है बल्कि इसे योग मानता है.राहु और केतु विभिन्न खानों में बैठकर 12 तरह के विशेष योग बनाते हैं.जिस प्रकार अन्य ग्रह अलग अलग खानो में बैठकर शुभ और अशुभ फल देते हैं उसी प्रकार राहु केतु भी शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देते हैं.ज्योतिष की इस विधा में राहु को सांप का सिर और केतु को उसका दुम माना गया है.कुण्डली में सूर्य से लेकर शनि तक सभी सात ग्रह जब राहु और केतु के बीच होते हैं तब कालसर्प योग बनता है.
लाल किताब के अनुसार जब मंगल और शनि जन्म कुण्डली में एक साथ हों अथवा द्वादश में और चन्द्रमा चतुर्थ भाव में तब राहु अशुभ फल नहीं देता है एवं कालसर्प बाधक नहीं होता है.राहु के अशुभ होने पर दक्षिण की ओर अगर घर का मुख्यद्वारा हो तो आर्थिक परेशानी बनी रहती है.आर्थिक नुकसान और कई प्रकार की उलझनें एक के बाद एक आती रहती है.कालसर्प में इस प्रकार की स्थिति में लाल किताब यह उपाय बताता है कि व्यक्ति को मसूर की दाल अथवा कुछ धन सफाई कर्मी को देना चाहिए.
लाल किताब में ग्रहों के उपाय और टोटकों को विशेष रूप से बताया गया है.राहु केतु से पीड़ित होने पर स्वास्थ्य लाभ हेतु रात को साते समय सिरहाने में जौ रखकर सोना चाहिए और इसे सुबह पंक्षियों को देना चाहिए.सरकारी पक्ष से परेशानी होने पर एवं रोजी रोजगार और व्यापार में कठिनाई आने पर अपने वजन के बराबर लकड़ी का कोयला चलते पानी में प्रवाहित करना चाहिए.केतु के अशुभ स्थिति से बचाव हेतु दूध में अंगूठा डालकर उसे चूसना चाहिए.सूर्य और चन्द्र की वस्तु यथा स्वेत वस्त्र, चांदी और तांबा दान करना चाहिए.
लाल किताब से कालसर्प के उपाय (Lalkitab Kalsarp remedies)
लाल किताब के अनुसार कालसर्प योग में राहु खाना नम्बर एक में हो और केतु खाना नम्बर सात में तब अपने पास चांदी की ठोस गोली रखनी चाहिए.राहु दो में और केतु आठ में तब दो रंगा का कम्बल दान करना चाहिए.तीन और नौ में क्रमश: राहु केतु हो तो चने की दाल नदी अथवा तलाब में प्रवाहित करना चाहिए.सोना धारण करने से भी लाभ मिलता है.चतुर्थ भाव में राहु हो और दशम भाव में केतु तब चांदी की डिब्बी में शहद भरकर घर के बाहर ज़मीन में दबाना लाभप्रद होता है.खाना नम्बर पांच में राहु हो और केतु खाना नम्बर ग्यारह में और सभी ग्रह इनके बीच में तब घर में चांदी का ठोस हाथी रखने से कालसर्प का विपरीत प्रभाव कम होता है.षष्टम में राहु और द्वादश में केतु होने पर कुत्ता पालने एवं बहन की सेवा करने से लाभ मिलता है. सप्तम में राहु हो और प्रथम में केतु तब लाल रंग की लोहे की गोली सदैव साथ रखना चाहिए एवं चांदी की डिब्बी में नदी का जल भरकर उसमें चांदी का एक टुकड़ा डालकर घर में रखना चाहिए.नवम में राहु हो और खाना नम्बर तीन में केतु हो तब चने की दाल बहते पानी में प्रवाहित करना चाहिए.
जिनकी कुण्डली में दसम खाने में राहु हो और केतु चौथे खाने में उन्हें पीतल के बर्तन में नदी या तालब का जल भरकर घर के अंधेरे कोने में रखना चाहिए.एकादश और पंचम में क्रमश: इस प्रकार की स्थिति हो तो 43 दिनों तक देव स्थान में मूली दान करना चाहिए.द्वादश खाने में राहु हो और षष्टम में केतु हो तो स्वर्ण धारण करने से लाभ होता है.

Thursday, March 17, 2011

लाल किताब में शनि का प्रत्येक भाव के लिए उपाय

शनि देव के प्रकोप से हम सभी भयभीत रहते हैं। शनि की साढ़े साती हो या ढईया इनका नाम सुनते ही घबराहट सी महसूस होने लगती है। लाल किताब में शनि के प्रकोप से बचने के लिए आसान उपाय दिये गये हैं। इस लेख में इन्हीं उपायों के बारे में जिक्र किया जा रहा है।

आमतौर पर वैदिक ज्योतिष में जब ग्रह कमजोर या अशुभ स्थिति  मे होते है तब उनका उपाय किया जाता है।परन्तु लाल किताब के अनुसार ग्रह चाहे शुभ स्थिति में हो या अशुभ उसका उपाय करने से जहाँ उसके फल में स्थायित्व रहता हें, वही दूसरी तरफ अशुभ ग्रह का उपाय करने से उसके विपरीत प्रभाव में कमी आती है।

कुण्डली में शनि जिस भाव में है उस भाव के अनुसार हमें किस प्रकार का उपाय करना चाहिए, यहां लाल किताब के सिद्धान्तों के अनुसार हम इसे जानने की कोशिश करेंगे।

आपकी कुण्डली में शनि प्रथम भाव में स्थित हों तो आपको इस प्रकार के उपाय करने चाहिए।

1) जमीन पर तेल गिराएं.

2) 48 वर्ष की आयु तक मकान न बनाएं.

3) रूके हुये पानी में काला सुरमा दबाएं.

4) बन्दर पालें.

5) मांगने वाले को लोहे की अगींठी, तवा, चिमटा इत्यादि दान में दें.

6) वट बृक्ष की पेड़ की जड़ में दूध डालकर उसकी गीली मिट्टी का तिलक माथे पर लगाएं.




द्वितीय भाव में स्थित शनि के उपाय 

1) भूरे रंग की भेंस पालें.

2) साँप को दूध पिलाएं.

3) मन्दिर में उड़द काली मिर्च, काले चने व चन्दन की लकडी दान में दें.

4) प्रतिदिन मन्दिर में दर्शन करें.


तृतीय भाव में स्थित शनि के उपाय 

1) अलग-अलग रंग के (सफेद, लाल, काला, ) तीन कुत्ते पालें.

2) मकान की दहलीज में लोहे की कील लगाएं.


चतुर्थ भाव में स्थित शनी के उपाय 

1) साँप को दूध पिलाएं.

2) मछ्ली को चावल, दाना आदी डालें

3) डा़क्टरी का कार्य करें और इलाज के तौर खुश्क दवा दें.

4) रात को दूध न पिये.

5) श्रमिक वर्ग से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखें.

6) भैस पालें.

7) दवाईयों व्यापार करें.


पंचम भाव में स्थित शनी के उपाय 

1) 48 वर्ष आयु से पहले मकान न वनाएं.

2) मन्दिर में बादाम चढाए़ व उनमें से आधे वाप़स लाकर घरमें रखें.

3) पुत्र के जन्म दिन पर मिठाई न बाटें.

4) कुत्ता पालें.

5) काले सुरमें को बहते जल में प्रवाहित करें.

छटे भाव में स्थित शनि के उपाय 

1) भूरे व काले रंग का कुत्ता पालें.

2) सरसो का तेल मिट्टी या शीशी के बर्तन में बन्द करके तालाब के पानी के अन्दर दबाएं.

3) साँप को दूध पिलाएं.

4) रात के समय किया गया काम लाभदायक होगा.

सप्तम भाव में स्थित शनि के उपाय

1) 22 वर्ष की आयु से पहले विवाह न करें.

2) देशी खाण्ड मिटटी के बर्तन में भरकर श्मशान में दवाएं.

3) पत्नी के बालों में सोना लगाएं.

4) किसी भी रिश्तेदार से साझें में कार्य न करें.

5) पत्नी की सलाह से काम करें.

अष्टम भाव में स्थित शनि के उपाय

1) शराब, अण्डे, मांस से परहेज करें.

2) मकान न खरीदें.

3) भारी मशीनरी का व्यबसाय न करें.

4) लोहे की अंगीठी, तवा, चिमटा आदि दान करें.

5) भुमि पर नगें पाँव ना चलें.

6) आठ किलो साबुत उड़त चलते पानी में प्रवाहित करें.


नवम भाव में स्थित शनि के उपाय 
1) शराब, अण्डा, मांस का सेवन ना करें.

2) चलते पानी में चावल प्रवाहित करें.

3) पिता, दादा के साथ रहें.

4) बूढे ब्राह्मण को बृहस्पति की वस्तुएँ दान करें .

5) छत पर इंधन (चूल्हा) न जलाएँ.

6) सोना, चांदी व कपडे़ का व्यबसाय लाभ देगा.


द्शम भाव में स्थित शनि के उपाय 
1) रात को दूध ना पिये.

2) सिर ढक कर रखें .

3) दस अन्धों को भोजन करायें.

4) शराब, अण्डा, मांस का सेवन ना करें.5) मन्दिर में दर्शन हेतु जाते रहें.


एकादश भाव में स्थित शनि के उपाय 
1) शराब, अण्डा, मांस का सेवन ना करें.

2) 48 वर्ष आयु के पश्चात मकान बनाऎं.

3) जमीन पर तेल गिराऎं.

4) मकान में दक्षिण दिशा की ओर दरवाजा ना रखें.

5) शुभ काम करने से पहले मिट्टी का घडा़ पानी से भरकर रखें.


द्वादश भाव में स्थित शनि के उपाय
1) झूठ बोलने से बचे.

2) मकान की पिछली दीवार में रोशनदान ना बनाएं.

3) शराब, अण्डा, मांस से परहेज करें.

4) धर्म, कर्म करते रहें.


लाल किताब के अनुसार शनि के उपरोक्त उपाय  करने से तुरन्त लाभ मिलता हैं.

ध्यान रखें:

1) एक समय में केवल एक ही उपाय करें.

2) उपाय कम से कम 40 दिन या 43 दिनो तक करें.

3) उपाय में नागा ना करें यदि किसी कारणवश नागा हो तो उपाय फिर से प्रारम्भ करें.

4) उपाय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक करें.

5) उपाय खून का रिश्तेदार ( भाई, पिता, पुत्र इत्यादि) भी कर सकता है.

लाल किताब एवं संतान योग

कुण्डली का पांचवा घर संतान भाव के रूप में विशेष रूप से जाना जाता है (The fifth house of the Lal Kitab stands for progeny). ज्योतिषशास्त्री इसी भाव से संतान कैसी होगी, एवं माता पिता से उनका किस प्रकार का सम्बन्ध होगा इसका आंकलन करते हैं.
 इस भाव में स्थित ग्रहों को देखकर व्यक्ति स्वयं भी काफी कुछ जान सकता है जैसे

पांचवें घर में सूर्य (Sun in Fifth House)
लाल किताब के नियमानुसार पांचवें घर में सूर्य का नेक प्रभाव होने से संतान जब गर्भ में आती है तभी से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होना शुरू हो जाता है. इनकी संतान जन्म से ही भाग्यवान होती है. यह अपने बच्चों पर जितना खर्च करते हैं उन्हें उतना ही शुभ परिणाम प्राप्त होता है. इस भाव में सूर्य अगर मदा (Weak sun in Lal kitab gives unhappiness from children) होता है तो माता पिता को बच्चों से सुख नहीं मिल पाता है. वैचारिक मतभेद के कारण बच्चे माता पिता के साथ नहीं रह पाते हैं.

पांचवें घर में चन्द्रमा (Moon in fifth house)
चन्द्रमा पंचवें घर में संतान का पूर्ण सुख देता है. संतान की शिक्षा अच्छी होती है. व्यक्ति अपने बच्चों के भविष्य के प्रति जागरूक होता है. व्यक्ति जितना उदार और जनसेवी होता है बच्चों का भविष्य उतना ही उत्तम होता है. इस भाव का चन्द्रमा अगर मंदा हो तो संतान के विषय मे मंदा फल देता है (Weak Moon in fifth house causes problems from children). लाल किताब का उपाय है कि बरसात का जल बोतल में भरकर घर में रखने से चन्द्र संतान के विषय में अशुभ फल नहीं देता है.

पांचवें घर में मंगल (Mars in the fifth house of Lal kitab kundali)
लाल किताब के अनुसार मंगल अगर खाना संख्या पांच में है तो संतान मंगल के समान पराक्रमी और साहसी होगी (Mars in fifth house gives a child as brave as Mars) संतान के जन्म के साथ व्यक्ति का पराक्रम और प्रभाव बढ़ता है. शत्रु का भय इन्हें नहीं सताता है. इस खाने में मंगल अगर मंदा है तो व्यक्ति को अपनी चारपायी या पलंग के सभी पायों में तांबे की कील ठोकनी चाहिए. इस उपाय से संतान सम्बन्धी मंगल का दोष दूर होता है.

पांचवें घर में बुध (Mercury in fifth house)
बुध का पांचवें घर में होना इस बात का संकेत है कि संतान बुद्धिमान और गुणी होगी (Mercury in the fifth house of lal kitab kundali gives an intelligent child). संतान की शिक्षा अच्छी होगी. अगर व्यक्ति चांदी धारण करता है तो यह संतान के लिए लाभप्रद होता है. संतान के हित में पंचम भाव में बुध वाले व्यक्ति को अकारण विवादों में नहीं उलझना चाहिए अन्यथा संतान से मतभेद होता है.

पांचवें घर में गुरू (Jupiter in the fifth house)
पंचम भाव में गुरू शुभ होने से संतान के सम्बन्ध में शुभ परिणाम प्राप्त होता है. संतान के जन्म के पश्चात व्यक्ति का भाग्य बली होता है और दिनानुदिन कामयाबी मिलती (A person gains success after birth of child if Jupiter is in fifth house) है. संतान बुद्धिमान और नेक होती है. अगर गुरू मंदा हो तो संतान के विषय में शुभ फल प्राप्त नहीं होता है. मंदे गुरू वाले व्यक्ति को गुरू का उपाय करना चाहिए.

पांचवें घर में शुक्र (Venus is in fifth house of Lal kitab kundali)
पांचवें घर में शुक्र का प्रभाव शुभ होने से संतान के विषय में शुभ फल प्राप्त होता है. इनके घर संतान का जन्म होते ही धन का आगमन तेजी से होता है (Person gains money when a child is born and Venus is in the fifth house). व्यक्ति अगर सद्चरित्र होता है तो उसकी संतान पसिद्ध होती है. अगर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और चरित्र का ध्यान नहीं रखता है तो संतान के जन्म के पश्चात कई प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना होता है. शुक्र अगर इस भाव में मंदा हो तो दूध से स्नान करना चाहिए।

पांचवें घर में शनि (Saturn in the fifth house)
शनि पांचवें घर में होने से संतान सुख प्राप्त होता है. शनि के प्रभाव से संतान जीवन में अपनी मेहनत और लगन से उन्नति करती है (Saturn in fifth house of lal kitab gives success with own efforts). इनकी संतान स्वयं काफी धन सम्पत्ति अर्जित करती है. अगर शनि इस खाने में मंदा होता है तो कन्या संतान की ओर से व्यक्ति को परेशानी होती है. इस भाव में शनि की शुभता के लिए व्यक्ति को मंदिर में बादाम चढ़ाने चाहिए और उसमें से 5-7 बादाम वापस घर में लाकर रखने चाहिए.

पांचवें घर में राहु (Rahu in the fifth house)
खाना नम्बर पांच में राहु होने से संतान सुख विलम्ब से प्राप्त होता है. अगर रहु शुभ स्थिति में हो तो पुत्र सुख की संभावना प्रबल रहती है. मंदा राहु पुत्र संतान को कष्ट देता है. लाल किताब के अनुसार मंदा राहु होने पर व्यक्ति को संतान के जन्म के समय उत्सव नहीं मनाना चाहिए. अगर संतान सुख में बाधा आ रही हो तो व्यक्ति को अपनी पत्नी से दुबारा शादी करनी चाहिए.

पांचवें घर में केतु (Ketu in the fifth house)
केतु भी राहु के समान अशुभ ग्रह है लेकिन पंचम भाव में इसकी उपस्थिति शुभ हो तो संतान के जन्म के साथ ही व्यक्ति को आकस्मिक लाभ मिलना शुरू हो जाता है. यदि केतु इस खाने में मंदा हो तो व्यक्ति को मसूर की दाल का दान करना चाहिए. इस उपाय से संतान के विषय में केतु का मंदा प्रभाव कम होता है.

सू्र्य को बनाएं बली

अगर मंदा हो तो जीवन में रोजी रोजगार के क्षेत्र में कठिनाईयों का सामना करना होता है. राजकीय पक्ष से सहायता नहीं मिल पाती है. इस स्थिति में जिनकी कुण्डली में सूर्य मंदा हो उसे लाल किताब के अनुसार सूर्य को जगाना चाहिए।
प्रथम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the First House)
लाल किताब के अनुसार ग्रह को जगाने का अर्थ है उसे शुभ फलदायी बनाना.  अगर सूर्य मंदा हो तो उसे शुभ फलदायी बनाने के लिए 24 वर्ष के बाद शादी करनी चाहिए. व्यक्ति को अपने मान मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए किसी के आगे व्यर्थ नहीं झुकना चाहिए. इस खाने में स्थित सूर्य के मन्दे फल से बचाव के लिए व्यवहार एवं चरित्र का भी ख्याल रखना चाहिए.
द्वितीय भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Second House)
सूर्य द्वितीय भाव में मंदा हो तो मंदे प्रभाव से बचाव हेतु कुटुम्बीजनों से आशीर्वाद लेना चाहिए. व्यक्ति को दूसरे का धन नहीं लेना चाहिए. अगर उपहार में भी धन प्राप्त हो तो उससे भी परहेज रखना चाहिए. इस भाव में सूर्य वाले व्यक्ति के लिए लालच हानिकारक होता है.
तृतीय भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Third House)
लाल किताब की कुण्डली मे सूर्य तीसरे घर में अशुभ होकर बैठा हो तो चारित्रिक दुर्बलताओं से स्वयं को बचाकर रखना चाहिए. रविवार के दिन तांबे का पात्र मन्दिर में दान करने से सूर्य का मन्दा फल दूर होता है. रविवार के दिन चांदी का चौकोर टुकड़ा धारण करने से भी सूर्य नेक होता है.

चतुर्थ भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Fourth House)
सूर्य अगर चौथे खाने में अशुभ होकर बैठा हो तो व्यक्ति को अपना मन शांत रखना चाहिए. कलह और विवाद में उलझना हानिप्रद होता है. बुजुर्गों का अशीर्वाद लेना चाहिए. किसी भी व्यक्ति को कष्ट अथवा नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए अन्यथा सूर्य का फल और भी मंदा हो जाता है.  लोहे और मशीनरी के काम में लाभ की संभावना नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति को नुकसान होता है अत: इन वस्तुओं के कारोबार से बचना चाहिए.

पांचवे भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Fifth House)
पांचवें भाव में मंदे सूर्य को नेक बनाने के लिए घर में पूर्व और उत्तर दिशा में रोशनदान रखना चाहिए. सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को दसरों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए. जिद्द और हठी होना इस भाव में मंदे सूर्य को और भी मंदा करता है अत: इनसे बचना चाहिए.
छठे भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Sixth House)
छठे भाव में सूर्य मंदा होने पर सूर्य के मंदे प्रभाव को दूर करने के लिए रात्रि के समय दूध डालकर अग्नि को बुझाना चाहिए.बन्दर को गुड़ खिलाने से भी छठे भाव में सूर्य का मंदा फल प्रभावी नहीं होता है. घर में नदी का जल रखने से सूर्य का शुभ फल प्राप्त होता है. चीटियों को चीनी डालने से सूर्य का मंदा प्रभाव नहीं प्राप्त होता है.
सातवें भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Seventh House)
सूर्य सातवें घर में मंदा होकर बैठा हो तो चांदी का चौकोर टुकड़ा ज़मीन में दबाने से मंदा फल दूर होता है.इस भाव में मंदे सूर्य को नेक बनाने के लिए आदित्य हृदयस्तोत्र एवं हरिवंश पुरण का पाठा करना चाहिए. सींग वाली गाय की सेवा करनी चाहिए. बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए.
आठवें भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Eighth House)
अगर सूर्य आठवें घर में मदा होकर अशुभ फल दे रहा हो तो इसे नेक बनाने के लिए बरसात का पानी जमा करके घर के पूर्व दिशा में रखना चाहिए. किसी कार्य को शुरू करने से पहले मीठी वस्तुओं का सेवन करना चाहिए. किसी भी काम में असामाजिक और अनैतिक आचरण वाले लोगों की सहायता नहीं लेनी चाहिए.
नवम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Ninth House)
सूर्य अगर नवम खाने में मंदा हो तो मनोकामना पूर्ति के लिए भूमि पर सोना चाहिए. सूर्य के मंदे प्रभाव से बचाव हेतु घर में टूटे फूटे बर्तनो को नहीं रखना चाहिए. (घर के बड़े और आदरणीय व्यक्तियों से आशीर्वाद लेना चाहिए. अपने स्वभाव को सामान्य रखना चाहिए न तो अधिक क्रोध करना चाहिए और न ही अधिक शांत होना चाहिए.
दशम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Tenth House)
दसवें घर में बैठा सूर्य अगर मंदा फल दे रहा हो तो सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए 43 दिनो तक तांबे का सिक्का नदी मे प्रवाहित करना चाहिए. आदित्य हृदय स्तोत्र और हरिवंश पुराण का पाठ शुभ फलदायी होता है. सूर्य को नियमित जल देने से भी इस भाव मे स्थित सूर्य का मंदा फल दूर होता है.
एकादश भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Eleventh House)
सूर्य एकादश भाव में अशुभ हो तो लाल किताब के अनुसार इसे नेक बनाने के लिए व्यक्ति को मांस मदिरा के सेवन से परहेज रखना चाहिए. कल पूर्जे वाले सामान, मशीन आदि खराब हो गए हों तो उसे ठीक करा लेना चाहिए अन्यथा घर में नहीं रखना चाहिए इससे भी सूर्य मंदा फल देता है. सूर्य मंदा होने पर घर में काला पत्थर रखना भी अशुभ फल देता है.
द्वादश भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Twelfth House)
खाना नम्बर 12 में सूर्य मंदा हो तो नेक प्रभाव पाने के लिए नदी में कच्चा जल प्रवाहित करना चाहिए. मंदे सूर्य से नेक फल पाना हो तो 43 दिनों तक नदी में गुड़ प्रवाहित करना चाहिए. 24 वर्ष के बाद विवाह करना से एवं तीन माला गायत्री मंत्र का जप करना भी मंदे सूर्य के मंदे फल को दूर करने में सहायक होता है.

Tuesday, March 8, 2011

पितृ दोष

मृत्यु के पश्चात संतान अपने पिता का श्राद्ध नहीं करते हैं एवं उनका जीवित अवस्था में अनादर करते हैं तो पुनर्जन्म में उनकी कुण्डली में पितृदोष ( Pitra dosha) लगता है. सर्प हत्या या किसी निरपराध की हत्या से भी यह दोष लगता है.पितृ दोष को अशुभ प्रभाव देने वाला माना जाता है. इस दोष की स्थिति एवं उपचार क्या है आइये देखते हैं.
कुण्डली में पितृ दोष: (Pitra Dosha in the Kundali)
सूर्य को पिता माना जाता है. राहु छाया ग्रह है (Rahu is a shadow planet). जब यह सूर्य के साथ युति (combination of Rahu and Sun) करता है तो सूर्य को ग्रहण लगता है इसी प्रकार जब कुण्डली में सूर्य चन्द्र और राहु मिलकर किसी भाव में युति बनाते हैं ( conjunction of Rahu, Sun and Moon) तब पितृ दोष लगता है. पितृ दोष होने पर संतान के सम्बन्ध में व्यक्ति को कष्ट भोगना पड़ता है. इस दोष में विवाह में बाधा, नौकरी एवं व्यापार में बाधा एवं महत्वपूर्ण कार्यों में बार बार असफलता मिलती है.
कुण्डली में पितृ दोष के कई लक्षण बताए जाते हैं जैसे चन्द्र लग्नेश (Moon’s lord of the ascendant) और सूर्य लग्नेश (Sun’s lord of the ascendant) जब नीच राशि (Debilitated sign) में हों और लग्न में या लग्नेश के साथ युति (combination) या दृष्टि (aspect) सम्बन्ध बनाते हों और उन पर पापी ग्रहों (malefic planet) का प्रभाव होता है तब पितृ दोष लगता है. लग्न व लग्नेश कमज़ोर (combusted ascendant or lord of the ascendant) हो और नीच लग्नेश के साथ राहु और शनि का युति और दृष्टि सम्बन्ध होने पर भी यह स्थिति बनती है. अशुभ भावेश (inauspicious lord of a house) शनि चन्द्र से युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाता है अथवा चन्द्र शनि के नक्षत्र या उसकी राशि में हो तब व्यक्ति की कुण्डली पितृ दोष से पीड़ित होती है.
लग्न में गुरू नीच (combusted Jupiter) का हो और उस पर पापी ग्रहों का प्रभाव पड़ता हो अथवा त्रिक भाव (trine house) के स्वामियो से बृहस्पति दृष्ट या युति बनाता हो तब पितर व्यक्ति को पीड़ा देते हैं. नवम भाव में बृहस्पति और शुक्र की युति बनती हो एवं दशम भाव में चन्द्र पर शनि व केतु का प्रभाव हो तो पितृ दोष वाली स्थिति बनती है. शुक्र अगर राहु अथवा शनि और मंगल द्वारा पीड़ित होता है तब पितृ दोष का संकेत समझना चाहिए. अष्टम भाव में सूर्य व पंचम में शनि हो तथा पंचमेश राहु से युति कर रहा हो और लग्न पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो तब पितृ दोष समझना चाहिए.
पंचम अथवा नवम भाव में पापी ग्रह हो या फिर पंचम भाव में सिंह राशि हो और सूर्य भी पापी ग्रहों से युत या दृष्ट हो तब पितृ दोष की पीड़ा होती है. कुण्डली में द्वितीय भाव, नवम भाव, द्वादश भाव और भावेश पर पापी ग्रहों का प्रभाव होता है या फिर भावेश अस्त या कमज़ोर होता है और उनपर केतु का प्रभाव होता है तब यह दोष बनता है. जिनकी कुण्डली में दशम भाव का स्वामी त्रिक भाव (trikha house)में होता है और बृहस्पति पापी ग्रहों के साथ स्थित होता है एवं लग्न और पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है उन्हें भी पितृ दोष के कारण कष्ट भोगना होता है.
पितृ दोष उपचार (Remedies of Pitra Dosha)
जिनकी कुण्डली में पितृ दोष है उन्हें इसकी शांति और उपचार कराने से लाभ मिलता है. पितृ दोष शमन के लिए नियमित पितृ कर्म करना चाहिए अगर यह संभव नहीं हो तो पितृ पक्ष में श्राद्ध करना चाहिए. नियमित कौओं और कुत्तों का खाना देना चाहिए. पीपल में जल देना चाहिए. ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए. गौ सेवा और गोदान करना चाहिए. विष्णु भगवान की पूजा लाभकारी है.

अंक ज्योतिष से विवाह


अंकशास्त्र में मुख्य रूप से नामांक (Name Number), मूलांक (Root Number) और भाग्यांक (Destiny Number) इन तीन विशेष अंकों को आधार मानकर फलादेश किया जाता है. विवाह के संदर्भ में भी इन्हीं तीन प्रकार के अंकों के बीच सम्बन्ध को देखा जाता है.
अंक ज्योतिष (Numerology) भविष्य जानने की एक विधा है. अंक ज्योतिष से ज्योतिष की अन्य विधाओं की तरह भविष्य और सभी प्रकार के ज्योंतिषीय प्रश्नों का उत्तर ज्ञात किया जा सकता है. विवाह जैसे महत्वपूर्ण विषय में भी अंक ज्योतिष और उसके उपाय काफी मददगार साबित होते हैं.
अंक ज्योंतिष अपने नाम के अनुसार अंक पर आधारित है. अंक शास्त्र के अनुसार सृष्टि के सभी गोचर और अगोचर तत्वों अपना एक निश्चत अंक होता है. अंकों के बीच जब ताल मेल नहीं होता है तब वे अशुभ या विपरीत परिणाम देते हैं. अंकशास्त्र में मुख्य रूप से नामांक, मूलांक और भाग्यांक इन तीन विशेष अंकों को आधार मानकर फलादेश किया जाता है. विवाह के संदर्भ में भी इन्हीं तीन प्रकार के अंकों के बीच सम्बन्ध को देखा जाता है. अगर वर और वधू के अंक आपस में मेल खाते हैं तो विवाह हो सकता है. अगर अंक मेल नहीं खाते हैं तो इसका उपाय करना होता है ताकि अंकों के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित हो सके.
वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) एवं उसके समानांतर चलने वाली ज्योतिष विधाओं में वर वधु के वैवाहिक जीवन का आंकलन करने के लिए जिस प्रकार से कुण्डली से गुण मिलाया जाता ठीक उसी प्रकार अंकशास्त्र में अंकों को मिलाकर (Numerology Marriage compatibility) वर वधू के वैवाहिक जीवन का आंकलन किया जाता है.
अंकशास्त्र से वर वधू का गुण मिलान (Matching for marriage through Numerology)
अंकशास्त्र में वर एवं वधू के वैवाहिक गुण मिलान के लिए, अंकशास्त्र के प्रमुख तीन अंकों में से नामांक ज्ञात किया जाता है. नामांक ज्ञात करने के लिए दोनों के नामों को अंग्रेजी के अलग अलग लिखा जाता है. नाम लिखने के बाद सभी अक्षरों के अंकों को जोड़ा जाता है जिससे नामांक ज्ञात होता है. ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि अगर मूलक 9 से अधिक हो तो योग से प्राप्त संख्या को दो भागों में बांटकर पुन: योग किया जाता है. इस प्रकार जो अंक आता है वह नामांक होता है. उदाहरण से योग 32 आने पर 3+2=5. वर का अंक 5 हो और कन्या का अंक 8 तो दोनों के बीच सहयोगात्मक सम्बन्ध रहेगा, अंकशास्त्र का यह नियम है.
वर वधू के नामांक का फल (Matching by Name Number)
अंकशास्त्र के नियम के अनुसार अगर वर का नामांक 1 है और वधू का नामांक भी एक है तो दोनों में समान भावना एवं प्रतिस्पर्धा रहेगी जिससे पारिवारिक जीवन में कलह की स्थिति होगी. कन्या का नामांक 2 होने पर किसी कारण से दोनों के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है. वर 1 नामांक का हो और कन्या तीन नामांक की तो उत्तम रहता है दोनों के बीच प्रेम और परस्पर सहयोगात्मक सम्बन्ध रहता है. कन्या 4 नामंक की होने पर पति पत्नी के बीच अकारण विवाद होता रहता है और जिससे गृहस्थी में अशांति रहती है. पंचम नामंक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है. सप्तम और नवम नामाक की कन्या भी 1 नामांक के वर के साथ सुखमय वैवाहिक जीवन का आनन्द लेती है जबकि षष्टम और अष्टम नामांक की कन्या और 1 नमांक का वर होने पर वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.
वर का नामांक 2 हो और कन्या 1 व 7 नामांक की हो तब वैवाहिक जीवन के सुख में बाधा आती है. 2 नामांक का वर इन दो नामांक की कन्या के अलावा अन्य नामांक वाली कन्या के साथ विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन आनन्दमय और सुखमय रहता है. तीन नामांक की कन्या हो और वर 2 नामांक का तो जीवन सुखी होता है परंतु सुख दुख धूप छांव की तरह होता है. वर 3 नामांक का हो और कन्या तीन, चार अथवा पांच नामांक की हो तब अंकशास्त्र के अनुसार वैवाहिक जीवन उत्तम नहीं रहता है. नामांक तीन का वर और 7 की कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख लगा रहता है. अन्य नामांक की कन्या का विवाह 3 नामांक के पुरूष से होता है तो पति पत्नी सुखी और आनन्दित रहते हैं.
4 अंक का पुरूष हो और कन्या 2, 4, 5 अंक की हो तब गृहस्थ जीवन उत्तम रहता है. चतुर्थ वर और षष्टम या अष्टम कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में अधिक परेशानी नहीं आती है. 4 अंक के वर की शादी इन अंकों के अलावा अन्य अंक की कन्या से होने पर गृहस्थ जीवन में परेशानी आती है. 5 नामांक के वर के लिए 1, 2, 5, 6, 8 नामांक की कन्या उत्तम रहती है. चतुर्थ और सप्तम नामांक की कन्या से साथ गृहस्थ जीवन मिला जुला रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या होने पर गृहस्थ सुख में कमी आती है. षष्टम नामांक के वर के लिए 1एवं  6 अंक की कन्या से विवाह उत्तम होता है. 3, 5, 7, 8 एवं 9 नामांक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सामान्य रहता है और  2 एवं चार नामांक की कन्या के साथ उत्तम वैवाहिक जीवन नहीं रह पाता.
वर का नामांक 7 होने पर कन्या अगर 1, 3, 6, नामांक की होती है तो पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध होता है. कन्या अगर 5, 8 अथवा 9 नामंक की होती है तब वैवाहिक जीवन में थोड़ी बहुत परेशानियां आती है परंतु सब सामान्य रहता है. अन्य नामांक की कन्या होने पर पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध नहीं रह पाता है. आठ नामांक का वर 5, 6 अथवा 7 नामांक की कन्या के साथ विवाह करता है तो दोनों सुखी होते हैं. 2 अथवा 3 नामांक की कन्या से विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन सामान्य बना रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या से विवाह करता है तो परेशानी आती है. 9 नामांक के वर के लिए 1, 2, 3, 6 एवं 9 नामांक की कन्या उत्तम होती है जबकि 5 एवं 7 नामांक की कन्या सामान्य होती है. 9 नामांक के वर के लिए 4 और 8 नामांक की कन्या से विवाह करना अंकशास्त्र की दृष्टि से शुभ नही होता है

Thursday, March 3, 2011

कुंडली में मंगल के ऐसे दोष नही रहेंगे

मंगल ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रहों का सेनापति माना गया है। इसी वजह से इसका प्रभाव भी काफी अधिक होता है। मंगल किसी भी व्यक्ति का स्वभाव पूरी तरह प्रभावित करता है। अगर यह किसी कुंडली में शुभ होता है तो वह व्यक्ति बहुत अपने जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करता है लेकिन मंगल अशुभ हो या नीच राशि में होता है तो उसका जीवन परेशानियों से भरा रहता है।

कुंडली के किस भाव में मंगल कितना अशुभ-
-कुंडली में मंगल प्रथम भाव में हो तो वह व्यक्ति साहसी, मूढ़, अल्पायु, अभिमानी, शूर, सुंदररूप वाला और चंचल होता है।
- किसी भी व्यक्ति की कुंडली में मंगल चौथे घर में हो तो वह  वस्त्र और भाई-बंधु से
हीन, वाहन रहित और दुखी होता है।
-जन्मकुंडली में सप्तम भाव में मंगल हो तो वह व्यक्ति रोगी, गलत कार्य करने वाला,
दुखी, पापी, निर्धन और पतले शरीर वाला होता है।
- मंगल अष्टम में होता है गरीब, कम उम्र का और दुखी रहने वाला होता है
- कुंडली के बाहरवें भाव में मंगल हो तो वह व्यक्ति आंखों का रोगी और चुगलखोर होता है। ऐसा व्यक्ति के जीवन में जेल भोगने के भी योग बन सकते हैं।



मंगल दोष मिटाने के उपाय-

- हर मंगलवार को शहद खाएं।
- 12 मंगलवार तक गुड़ पानी में बहाएं।
- हर मंगलवार को हनुमान मंन्दिर में लड्डू का प्रसाद चढ़ाए और बांटे।
- कुत्तों को मिठी रोटीयां खिलाएं।
- बताशे पानी में बहाएं।
- 7 मंगलवार तक दूध में चावल धोकर पानी में बहाएं।
- बंदरों को चने खिलाएं।

कुंडली से जानें लड़का होगा या लड़की..

संसार में कोई भी ऐसे दंपति नहीं हैं ,जो संतान सुख नहीं चाहते हैं। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने।

सभी को यह उत्सुकता रहती है कि उनकी पहली संतान लड़का होगी या लड़की? ज्योतिष की सहायता से जाना जा सकता है और यह भी जाना जा सकता है कि आपकी कुंडली में कितनी संतान के योग हैं?



ज्योतिष में पुरुष ग्रह यानी सूर्य, मंगल और गुरु पुत्र देने वाले ग्रह माने जाते है वहीं चन्द्रमा स्त्री ग्रह होने के कारण कन्या देने वाला ग्रह माना गया है। बुध शुक्र और शनि कुन्डली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का अपने बल के अनुसार फल देते हैं।

सूर्य की राशि सिंह को अल्प प्रसव राशि माना गया है। अगर किसी कुंडली में सूर्य जब ग्यारहवें भाव हो कर पांचवें स्थान के सामने होता है, तो एक पुत्र का ही योग बनता है उससे अधिक का योग नही बनता है। कभी कभी अन्य ग्रहों की स्थिति के कारण वंश वृद्धि में परेशानी भी होती है। चन्द्रमा की राशि कर्क, कन्या की अधिकता के लिये मानी जाती है। जब पांचवें स्थान में कर्क राशि हो और पांचवे भाव को अगर ग्यारहवें भाव से शनि देखता हो तो जातक को सात कन्याएं भी हो सकती है और एक पुत्र का योग होता है और वह पुत्र भी अल्पायु यानी कम उम्र वाला होता है।

Thursday, February 24, 2011

गुगल का धुआं करें, घर का वातावरण होगा शुद्ध


वातावरण में हमेशा ही कई प्रकार के कीटाणु रहते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। घर में अच्छी तरह सफाई करने के बाद भी कई ऐसे कीटाणु जो आंखों से दिखाई नहीं देते, मौजूद रहते हैं। इनसे हमारे स्वास्थ्य को नुकसान तो है साथ ही घर का वातावरण भी अपवित्र रहता है।

घर के माहौल को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय कंडे पर थोड़ी सी गुग्गल डालकर रखें। अब गुग्गल से जो धुआं निकले उसे घर के हर कमरे में पहुंचाएं। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होगी और वास्तुदोषों का नाश होगा।

इस धुएं से वातावरण में मौजूद कई हानिकारक कीटाणु स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं और घर का वातावरण एकदम शुद्ध और पवित्र हो जाता है। गुगल के धुएं से और अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए  इस मंत्र का जप करें- ऊं नारायणाय नम:

यह मंत्र भगवान विष्णु का मंत्र है। चूंकि धन की देवी महालक्ष्मी भगवान श्रीहरि की पत्नी है अत: भगवान का मंत्र जप करने वाले व्यक्ति से देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न रहती हैं। देवी महालक्ष्मी की कृपा आपके घर पर होगी तथा धन संबंधी परेशानियां दूर होंगी।

Saturday, February 19, 2011

जानें और कब तक रहेंगे आपके बुरे दिन?

राशियां और ग्रह हमारे जीवन को पूरी तरह से प्रभावित करते है। यदि आपकी कुंडली में कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो वह अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार जब तक उस राशि में रहेगा तब तक आपको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। उसी तरह शुभ ग्रह अच्छा फल प्रदान करते हैं।

जानिए... कौन सा ग्रह, एक राशि में कितने समय तक रहता है और कब तक आपके जीवन को प्रभावित करता है।



जो ग्रह आपकी राशि में रहता है उसी के अनुसार आपको फल प्राप्त होते हैं। अत: ग्रह स्थिति के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए।



सूर्य- अगर आपकी कुंडली में सूर्य अशुभ है तो आपको सूर्य की वर्तमान स्थिति के अनुसार एक माह तक उसका फल मिलेगा।

चंद्र- किसी राशि वाले के लिए यह ग्रह अशुभ होने पर कुछ समय के लिए ही बुरा फल देता है। यानी सवा दो दिन ।

मंगल- एक राशि पर डेढ़ माह तक रहता है इसलिए इसका बुरा फल 45 दिन तक ही रहता है।

बुध- यह ग्रह एक राशि पर 30 तक ही अपना अच्छा या बुरा फल देता है।

गुरु- एक राशि पर गुरु का प्रभाव 12 महीने तक रहता है।

शुक्र- यह ग्रह एक राशि पर 27 दिन तक रहता है। इसलिए इसका शुभ अशुभ प्रभाव 27 दिन तक ही रहता है।

शनि- एक राशि पर शनि का शुभ-अशुभ प्रभाव ढाई साल तक रहता है।

राहु और केतु एक राशि पर डेढ़ साल तक अपना प्रभाव देते हैं। ये दोनो छाया ग्रह है इसलिए इनका शुभ अशुभ प्रभाव बदलता रहता है।

यदि कुंडली का केंद्र स्थान खाली हो...

कुंडली में चार केंद्र स्थान होते हैं। यह प्रथम, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव होते हैं जो कि तन, सुख, दांपत्य एवं कर्म के कारक होते हैं।

यदि केंद्र में शुभ ग्रह हो तो जातक लक्ष्मीपति होता है। वहीं केंद्र में उच्च के पाप ग्रह बैठे हो तो जातक राजा तो होता ही है पर वह धन से हीन होता है।

सूर्य यदि उच्च को हो तथा गुरु केंद्र में चतुर्थ स्थान पर बैठा हो तो जातक आधुनिक केंद्र या राज्य में मंत्री पद को प्राप्त करता है। सूर्य के केंद्र में होने से जातक राजा का सेवक, चंद्रमा केंद्र में हो तो व्यापारी, मंगल केंद्र में हो तो व्यक्ति सेना में कार्य करता है।

बुध के केंद्र में होने से अध्यापक तथा गुरु के केंद्र में होने से विज्ञानी, शुक्र के केंद्र में होने पर धनवान तथा विद्यावान होता है। शनि के केंद्र में होने से नीच जनों की सेवा करने वाला होता है।

यदि केंद्र में कोई भी ग्रह नहीं हो तो जातक समस्या ग्रस्त परेशान रहता है। कोई भी ग्रह केंद्र में न हो तथा आप, ऋण, रोग, दरिद्रता से परेशान हो तो निम्न उपाय करें।

- शिवजी की उपासना करें।

- सोमवार का व्रत करें।

- भगवान शिव पर चांदी का नाग अर्पण करें।

- बिल्व पत्रों से 108 आहूतियां दें।

अलग-अलग रिश्तों के लिए अलग है ग्रह पूजा

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली से व्यक्ति के सभी पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर विचार किया जाता है। कुंडली के ग्रहों की स्थिति से मालूम किया जा सकता है कि उस व्यक्ति के अपने परिवार के लोगों से कैसे रिश्ते हैं और भविष्य में कैसे रहेंगे? मित्र कैसे हैं? इसी तरह अन्य सभी रिश्तों पर विचार किया जा सकता है।

हर रिश्ते को अलग-अलग ग्रह प्रभावित करते हैं-

रिश्ता- रिश्ते को प्रभावित करने वाला ग्रह

राज्य- सूर्य

भाई, मित्र- मंगल

गुरु, पिता, दादा- गुरु

चाचा, ताऊ- शनि

पुत्र- केतु

माता, दादी- चंद्र

पुत्री, बहन, बुआ- बुध

पत्नी या पति- शुक्र

ससुराल, ननिहाल- राहु

हर रिश्ता कैसा रहेगा यह कुंडली में स्थित ग्रहों के शुभ-अशुभ होने पर निर्भर करता है।

- यदि आपको राज्य या समाज में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो आप सूर्य की आराधना करें। प्रतिदिन सूर्य को जल चढ़ाएं, इससे समाज में यश, मान-सम्मान मिलेगा।

- भाई या मित्र से संबंध ठीक नहीं रहते तो मंगलदेव की आराधना करें। प्रति मंगलवार शिवलिंग पर लाल फूल चढ़ाएं।

- यदि पिता, दादा या गुरु से रिश्ता ठीक नहीं है तो गुरु अथवा ब्रहस्पति की पूजा कराएं। प्रतिदिन शिवजी को पीले फूल अर्पित करें।

- यदि चाचा या ताऊजी से संबंधों खटास है तो शनिवार को शनिदेव के निमित्त तेल का दान करें।

- यदि पुत्र आपकी नहीं सुनता, तो केतु का उपचार करें। केतु संबंधी वस्तुओं का दान दें।

- चंद्र की आराधना से माता और दादी से रिश्तों में सुधार आएगा।

- पुत्री, बहन या बुआ से रिश्तों में कड़वाहट आ गई है तो बुध ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करें। बुधवार को श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित करें।

- यदि पति-पत्नी के रिश्तों में किसी तरह की परेशानियां आ रही हैं तो शुक्रदेव को मनाएं। शुक्रवार को शुक्र ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करें।

- ससुराल या ननिहाल वालों को मनाने के लिए राहु जप कराएं।

जल्दी शादी के लिए गुरुवार का व्रत ही क्यों?

कहते हैं जिन लोगों की कुंडली में दोष होता है उनकी शादी में विघ्र आते हैं या तो उनकी शादी या तो बहुत जल्दी होती है या बहुत देर से होती है। लोगों के विवाह में देरी का एक कारण मंगली लड़की या लड़के का ना मिलना भी होता है। समय पर योग्य वर या वधु नहीं मिल पाते हैं। जो मिलते हैं वहां कोई दूसरी समस्या सामने आ जाती है। ऐसे में शीघ्र विवाह के लिए गुरु के उपाय करने को कहा जाता है।



ज्योतिष के अनुसार गृहस्थ जीवन को गुरु प्रभावित करता है। पारिवारिक शांति और सुखमय गृहस्थ जीवन के लिए बृहस्पति यानी गुरु से संबंधित उपाय किए जाते है तो निश्चित ही घर में सुख शांति बनी रहती है। दरअसल गुरु को विवाह का कारक गृह माना जाता है। जब किसी की कुंडली में गुरु अशुभ होता है तो उसकी कुंडली में विवाह विलंब योग बनता है।गुरु को जन्मकुंडली के सप्तम भाव का कारक माना जाता है।





कुंडली का यह भाव पति या पत्नी का माना गया है। इसलिए मंगल होने पर भी मंगल के उपाय के साथ ही ज्योतिषों द्वारा गुरुवार का व्रत रखने की ओर गुरु से जुड़े उपाय करने की सलाह दी जाती है ताकि जन्मकुंडली के दोष का निवारण हो और विवाह योग्य लड़के या लड़की का शीघ्र विवाह हो जाए।

Monday, February 7, 2011

हमारे द्वारा कार्य करने की प्रक्रिया



हमारे द्वारा कार्य करने की प्रक्रिया :-
हमारी इन्द्रियां जो कुछ देखती है ,सुनती है ,स्पर्श करती है ,सूंघती है ,चखती या स्वाद लेती है वो सुचना हमारे मन के पास पहुचती है ! मन फिर वो सूचना बुद्धि को देता है फिर बुद्धि उसके बारे में सोच विचार करती है ! सोच विचार करके बुद्धि मन को जवाब देती है फिर मन इन्द्रियों को जवाब देता है फिर इन्द्रियां जवाब के अनुसार अपना काम करती है ! 

मति में अगर तप है,मति अगर सुमति है ,बुद्धि सात्विक है तो वह उस सुचना का विवेक करती है ।
मति में अगर तप नहीं है , बुद्धि तामसी ,राजसी है तो वह मन इन्द्रियों को जो अच्छा लगे वही निर्णय देती है।

और ऐसा करते करते इन्सान की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है,जब देखने, सुनने, चखने, भोगने की वासना मति ने स्वीकार कर ली तो मति का स्वभाव हो जाता है कि अभी वह चखना है, यह खाना है, यह भोगना है। ऐसा करते-करते जीवन पूरा हो जाता है फिर भी कुछ न कुछ करना-भोगना, खाना-पीना बाकी रह जाता है। 

मनुष्य जन्म में ऐसी मति मिली है कि इससे वह भूत का, भविष्य का चिन्तन-विचार कर सकता है। पशु तो कुछ समय के बाद अपने माँ-बाप को भी भूल जाते हैं, भाई-बहन को भी भूल जाते है और संसार व्यवहार कर लेते हैं। मनुष्य की मति में स्मृति (याददास्त ) रहती है। इसलिए जो भी करो सोच समझकर करो,और फिर जैसा आप करोगे उसका परिणाम भी आपको ही भुगतना पड़ेगा !
हम अपनी बुद्धि को सात्विक बना सकते हैं, अपनी मति को सुमति बना सकते हैं ओर ये जप, तप ,ध्यान और सत्संग से संभव है
♥ हरी ॐ

सत्य धर्म

 
संतों ने ठीक ही कहा हैः

" साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।  
 जाके हिरदे साँच है, ताके हिरदे आप।”

'सत्य के समान कोई तप नहीं है एवं झूठ के समान कोई पाप नहीं है। जिसके हृदय में सच्चाई है, उसके  
हृदय में स्वयं परमात्मा निवास करते हैं।'

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा हैः --"धरम न दूसरा सत्य समाना।"

सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है।

मोहनदास कर्मचन्द गांधी ने अपने विद्यार्थी काल में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र नामक नाटक देखा। उनके जीवन पर इसका इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने दृढ़ निर्णय कर लियाः 'कुछ भी हो जाय, मैं सदैव सत्य ही बोलूँगा।

उन्होंने सत्य को ही अपना जीवनमंत्र बना लिया।

१.►एक बार पाठशाला में खेलकूद का कार्यक्रम चल रहा था। खेलकूद में रूचि न होने के कारण गांधीजी देर से आये ! देर से आया देखकर शिक्षक ने पूछाः "इतनी देर से क्यों आये ?"

मोहनलालः "खेलकूद में मेरी रूचि नहीं है और घर पर थोड़ा काम भी था, इसलिए देर से आया।"

शिक्षकः "तुम्हें एक आने का अर्थदण्ड(जुर्माना ) देना पड़ेगा।"

दण्ड सुनकर मोहनलाल रोने लगे। शिक्षक ने उन्हें रोते देखकर कहाः

"तुम्हारे पिता करमचंद गाँधी तो धनवान आदमी हैं। एक आना दण्ड के लिए क्यों रोते हो ?"

मोहनलालः "में एक आने के लिए नहीं रो रहा , मेने सच बता दिया ,कोई बहाना नहीं बनाया है, फिर भी आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं होता इसीलिए मुझे रोना आ गया।"

मोहनलाल की सच्चाई देखकर शिक्षक ने उन्हें माफ कर दिया। ये ही विद्यार्थी मोहन लाल आगे चलकर महात्मा गाँधी के रूप में करोड़ों-करोड़ों लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गये।

२.►एक बार परीक्षा के समय स्कूल में शिक्षा विभाग के कुछ इन्सपैक्टर आये हुए थे। उन्होंने कक्षा के समस्त विद्यार्थियों को एक-एक कर पाँच शब्द लिखवाये। अचानक कक्षा - अध्यापक ने एक बालक की कापी देखी जिसमें एक शब्द गल्त लिखा था। अध्यापक ने उस बालक को पैर से इशारा किया कि पडोसी की कॉपी से गलत शब्द ठीक कर ले। ऐसे ही उन्होंने दूसरे बालकों को भी इशारा करके समझा दिया और सबने अपने शब्द ठीक कर लिये, पर उस बालक ने कुछ न किया।

इन्सपैक्टरों के चले जाने पर अध्यापक ने भरी कक्षा में उसे डाँटा और झिड़कते हुए कहा कि इशारा करने पर भी अपना शब्द ठीक नहीं किया ? कितना मूर्ख है !

इस पर बालक ने कहाः "अपने अज्ञान पर पर्दा डालकर दूसरे की नकल करना सच्चाई नहीं है।"

अध्यापकः "तुमने सत्य का व्रत कब लिया और कैसे लिया ?"

बालक ने उत्तर दियाः "राजा हरिश्चन्द्र के नाटक को देखकर, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिए अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचकर अपार कष्ट सहते हुए भी सत्य की रक्षा की थी।"

यह बालक कोई ओर नहीं बल्कि मोहनलाल करमचन्द गाँधी ही थे।


► सत्य का आचरण करने वाला निर्भय रहता है। उसका आत्मबल बढ़ता है। असत्य से ,सत्य अनंतगुना बलनान है। 
जो बात - बात में झूठ बोल देते है, उनका विश्वास कोई नहीं करता है। फिर एक झूठ को छिपाने के लिए सौ बार झूठ भी बोलना पड़ता है। अतः इन सब बातों से बचने के लिए पहले से ही सत्य का आचरण करना चाहिए। सत्य का आचरण करने वाला सदैव सबका प्रिय हो जाता है। 
शास्त्रों में भी आता हैः (सत्यं वद। धर्में चर।)

"सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। जीवन की वास्तिवक उन्नति सत्य में ही निहित है।"


जीवन काल की समाप्ति पर, जब हमारे शव को अर्थी पर ले जायेंगे तब भी लोग ये ही कहेंगे कि "राम नाम सत्य है "
उस दिन हमे पता चलता है की ये संसार तो झूठा था !

इसलिए आज से अभी से अपने आप को सत्य की ओर लगा दो , राम की ओर लगा दो !

"जय श्री राम " 

7 का महत्व

 





















* सात फेरे : ►
वैदिक रीति के अनुसार आदर्श विवाह में परिजनों के सामने अग्नि को अपना साक्षी मानते हुए सात फेरे लिए जाते हैं। प्रारंभ में कन्या आगे और वर पीछे चलता है। भले ही माता-पिता कन्या दान कर दें, भाई लाजा होम कर दे किंतु विवाह की पूर्णता सप्तपदी के पश्चात तभी मानी जाती है जब वर के साथ सात कदम चलकर कन्या अपनी स्वीकृति दे देती है। शास्त्रों ने अंतिम अधिकार कन्या को ही दिया है।

*सात वचन :►
वामा बनने से पूर्व कन्या वर से यज्ञ, दान में उसकी सहमति, आजीवन भरण-पोषण, धन की सुरक्षा, संपत्ति ख़रीदने में सम्मति, समयानुकूल व्यवस्था तथा सखी-सहेलियों में अपमानित न करने के सात वचन कन्या द्वारा वर से भराए जाते हैं। इसी प्रकार कन्या भी पत्नी के रूप में अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए सात वचन भरती है। सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पाँचवाँ पशुधन संपदा हेतु, छटा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम सातवें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवन पर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।

*सात दिन :►
वर्ष एवं महीनों के काल खंडों को सात दिनों के सप्ताह में विभाजित किया गया है। 


*सात घोड़े :►
सूर्य के रथ में सात घोड़े होते हैं जो सूर्य के प्रकाश से मिलनेवाले सात रंगों में प्रकट होते हैं।


*सात रंग :►
आकाश में इंद्र धनुष के समय वे सातों रंग स्पष्ट दिखाई देते हैं। दांपत्य जीवन में इंद्रधनुषी रंगों की सतरंगी छटा बिखरती रहे इस कामना से 'सप्तपदी' की प्रक्रिया पूरी की जाती है।


*सात स्वर :►
सर्वविदित है कि भारतीय संगीत में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि अर्थात - षड़ज, ऋषभ, गांधोर, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद ये सात स्वर होते हैं।


*सात तल :►
इसी प्रकार अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल ये सात तल कहे गए हैं।


*सात ऋषि :►
मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एक साथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ सात कदम रखते हैं। हमारे जीवन में कदम-कदम पर मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलह, केतु, पौलस्त्य और वैशिष्ठ ये सात ऋषि हम दोनों को अपना आशीर्वाद प्रदान करें तथा सदैव हमारी रक्षा करें।


*सात लोक :►
भू, भुवः स्वः, महः, जन, तप और सत्य नाम के सातों लोकों में हमारी कीर्ति हो। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवन पर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवन पर्यंत हमारा यह बंधन सात समंदर पार तक अटूट बना रहे तथा हमारा प्यार सात समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो। हमारे प्राचीन मनीषियों ने बहुत सोच-समझकर विवाह में इन परंपराओं की नींव रखी थी। विवाह संस्कार की संपूर्ण प्रक्रिया के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं। दांपत्य के भावी जीवन रूपी भवन का भविष्य 'विवाह संस्कार' निर्भर करता है।


*सात शुभ पदार्थ :►
प्रातःकाल मंगल दर्शन के लिए सात पदार्थ शुभ माने गए हैं। गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि इन सातों या इनमें से किसी एक का दर्शन अवश्य करना चाहिए।


*सात क्रियाएँ : ►
शौच, दंतधावन, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन और शयन सात क्रियाएँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। अतः नित्य कर्म के रूप में इन्हें अवश्य करना चाहिए।

*सात स्नान :►
वेद स्मृति में स्नान भी सात प्रकार के बताए गए हैं। मंत्र स्नान, भौम स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, करुण स्नान तथा मानसिक स्नान जो क्रमशः मंत्र, मिट्टी, भस्म, गौखुर की धूल, सूर्य किरणों में, वर्षाजल, गंगाजल तथा आत्मचिंतन द्वारा किए जाते हैं। 


*सात अभिवादन योग्य :►
शास्त्रों में माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि इन सातों को अभिवादन करना अनिवार्य बताया गया है

*सात आंतरिक अशुद्धियाँ :►
ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार ये सात आंतरिक अशुद्धियाँ बताई गई हैं। अतः इनसे बचने के लिए सदैव सचेष्ट रहना चाहिए,

*सात सदाचार :►
बाह्यशुद्धि, पूजा-पाठ, मंत्र-जप, दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, ध्यान-योग तथा विद्या और ज्ञान !


*सात विशिष्ट लाभ :►
जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि 

*सात दांत साफ़ करने के वृक्ष :►
आयुर्वेद के अनुसार दाँतों की सफ़ाई करने के लिए आम, नीम, बेल, बबूल, गूलर, करंज तथा खैर - इन सात हरे वृक्षों की टहनी से बनी दातौन अच्छी मानी जाती है। लसौढ़ा, पलाश, कपास, नील, धव, कुश और काश - इन सातों से बनी दातौन से दाँत साफ़ करना वर्जित कहा गया है। 

*आयु में सात माह / सात दिन की कटोती :►
शनिवार के दिन बाल या नाखून काटने से उस दिन के अभिमानी देवता सात माह की आयु क्षीण कर देते हैं तथा सोमवार को बाल या नाखून काटने से सात माह की आयु वृद्धि होती हैं।